गरम तेल में पड़कर इसे फतिंगा फडफ़ड़ावे ला, ओइसे ही नीतीश बौखला गएल बा,” यह कहना है लालू प्रसाद यादव का. बेगूसराय में अपनी परिवर्तन यात्रा के चौथे चरण के समाप्त होने के एक दिन बाद आरजेडी प्रमुख बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उस आरोपों पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे, जिसमें नीतीश ने कहा था कि उनकी अधिकार यात्रा के दौरान शिक्षकों के विरोध प्रदर्शन को उनके विरोधियों (पढ़ें लालू प्रसाद यादव) ने भड़काया था.
बिहार-नेपाल सीमा पर स्थित बेतिया से 12 जून को शुरू हुई लालू की यह यात्रा अब तक बिहार के कुल 37 जिलों में से 15 जिलों से होकर गुजर चुकी है. यात्रा को मिल रहे जनसमर्थन से खुद आरजेडी प्रमुख हैरान हैं. स्थानीय खुफिया सूत्रों का कहना है कि 5 अक्तूबर को खगडिय़ा में संपन्न उनकी सभा में नीतीश कुमार की 26 सितंबर की सभा के मुकाबले कहीं ज्यादा भीड़ थी. 6 अक्तूबर को बेगूसराय के आइटीआइ मैदान में उन्होंने और भी बड़ी रैली को संबोधित किया.
आरजेडी शिविर में उत्साह का माहौल है. इसके विपरीत मुख्यतया संविदा शिक्षकों के विरोध प्रदर्शनों और सभाओं में जगह-जगह काले झंडे दिखाए जाने के कारण नीतीश को अपनी यात्रा में कटौती करनी पड़ी. प्रशासन ने अति उत्साह में आकर विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए जमुई और नवादा के रैली स्थलों से काली टी-शर्ट पहने पुरुषों को लौटा दिया और लड़कियों से अपना काला दुपट्टा उतारने के लिए कहा. प्रशासन की इस कार्रवाई पर हंगामा खड़ा हो गया. जेडी (यू) प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने स्वीकार किया कि ''यह गलत कदम था. अधिकारियों ने कुछ ज्यादा ही तेजी दिखाई थी.”
हालांकि आरजेडी प्रमुख की वापसी की योजनाओं पर चारा घोटाले के मुकदमे के नतीजे से बाधा पहुंच सकती है, जो इस समय रांची में सीबीआइ की विशेष अदालत में महत्वपूर्ण दौर में पहुंच चुका है. 8 अक्तूबर को बचाव पक्ष के गवाहों से जिरह पूरी हो चुकी है. अब केवल बहस ही बाकी रह गई है. बहस समाप्त होने के बाद, जो सीबीआइ के सूत्रों के मुताबिक संक्षिप्त ही होगी, जज अपना फैसला सुरक्षित कर लेंगे.
एक वरिष्ठ सीबीआइ अधिकारी कहते हैं, ''हमें काफी हद तक यकीन है कि लालू दोषी पाए जाएंगे.” वे तर्क देते हैं कि पश्चिम सिंहभूम के चाईबासा कोषागार से 37 करोड़ से अधिक रुपए धोखाधड़ी कर निकाले जाने के मामले में पिछले साल 100 लोग दोषसिद्ध ठहराए गए हैं.
लेकिन लालू बेफिक्र नजर आ रहे हैं. पटना के 10 सर्कुलर रोड स्थित अपने आवास पर उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''आपको पता ही है कि आय से अधिक संपत्ति वाले मामले में क्या हुआ. 18 दिसंबर, 2006 को विशेष सीबीआइ न्यायाधीश मुनि लाल पासवान ने मुझे और राबड़ी देवी को क्लीन चिट दे दिया था. 1 अप्रैल, 2010 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भी हमारे बरी होने पर अपनी मुहर लगा दी. चारा घोटाले के मुकदमे का भी यही हश्र होना है. न्यायपालिका में मेरी पूरी आस्था है.” खादी की सफेद बनियान और कमर पर काफी ऊंची बांधी गई सफेद धोती पहने वे निश्चित दिख रहे थे.
उनका विशाल सरकारी आवास बिहार के मुख्यमंत्री के आवास 1, अणे मार्ग के ठीक सामने स्थित है, जिस पर नवंबर 2005 में नीतीश द्वारा उन्हें हटाए जाने के पहले 15 साल की एक लंबी अवधि तक राबड़ी देवी-लालू की जोड़ी का आधिपत्य रहा है. मई, 2009 में लालू केंद्र में रेल मंत्रालय भी गंवा बैठे. 19 वर्षों में पहली बार आरजेडी के सुप्रीमो केंद्र और राज्य, दोनों जगहों की सत्ता से बाहर हुए. तब से वे राजनैतिक वनवास ही काट रहे हैं.
आरजेडी प्रमुख अब बिहार में अपना राजनैतिक और सामाजिक आधार फिर से हासिल करने के मिशन पर हैं. वे प्रदेश की यात्रा करने और वहां की जनता से जुडऩे में ज्यादा समय बिता रहे हैं. लंबे समय तक सत्ता में रहने के दौरान उनमें और उनकी पार्टी में जो अहंकार और अकड़ पैदा हो गई थी, वह अब जा चुकी है. वे अब काफी विनम्र व्यक्ति हैं और जो एक ऐसे प्रदेश में अपना सियासी वजूद बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसे कभी उनकी सत्ता का पर्याय समझ जाता था.
प्रदेश में अपनी सियासी पकड़ की थाह लेने के लिए 15 अक्तूबर को आरजेडी और उसकी गठबंधन सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी ने 12 अक्तूबर की मधुबनी की पुलिस फायरिंग के खिलाफ राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया. फायरिंग में तीन लोग मारे गए थे.
उनका मजाकिया अंदाज अब भी बरकरार है. वे जनता को एक और मौका देने की खातिर राजी करने के लिए अपने जमीनी और गंवई अंदाज का भरपूर उपयोग कर रहे हैं. इस प्रचलित धारणा को खंडित करने के लिए कि आरजेडी एक जाति की पार्टी होकर रह गई है, वे समावेशी भाषा में बात करते हैं. इन आरोपों का जवाब देते हुए कि ऊंची जातियों के लिए उनके पास सिर्फ नफरत ही है, वे कहते हैं, ''यह मेरे विरोधियों द्वारा फैलाया गया प्रचार है. मैं हमेशा सभी जातियों और समुदायों को साथ लेकर चला हूं. लेकिन वंचितों और अल्पसंख्यकों की स्थितियों में सुधार की तरफ मेरा अधिक ध्यान रहा है. मैंने ऊंची जातियों के खिलाफ कभी कुछ किया या कहा नहीं है.”
वे बताते हैं, ''मैंने कभी यह नारा नहीं दिया: भूरा बाल काट दो.” भूरा बाल बिहार की चार ऊंची जातियों: भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला (कायस्थ) नामों के पहले अक्षर से बना शब्द है. नब्बे के दशक की शुरुआत में और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद के दिनों में उनके नाम के साथ यह नारा जोड़ दिया गया था.
आरजेडी प्रमुख बिहार को 'विशेष राज्य’ का दर्जा देने की खातिर दिल्ली पर दबाव बनाने के लिए नीतीश और उनकी यात्रा का मजाक भी उड़ाते हैं. लालू कहते हैं कि यह मांग सबसे पहले 2000 में उन्होंने और तत्कालीन मुख्यमंत्री उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने बिहार के विभाजन के समय थी. सबूत के तौर पर वे एक स्थानीय दैनिक के 4 फरवरी, 2002 के अंक के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित एक समाचार का हवाला देते हैं.
लालू आरोप लगाते हैं, ''तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पटना यात्रा के दौरान राबड़ी देवी ने बिहार को विशेष राज्य के रूप में मान्यता प्रदान किए जाने की तगड़ी पैरवी की थी. शुरू में अटल जी ने कहा भी था कि वे इस मांग पर विचार करेंगे, लेकिन नीतीश के दबाव में उन्होंने इसकी बजाए विशेष वित्तीय पैकेज की पेशकश कर दी थी.”
लालू कहते हैं, ''नीतीश कुख्यात बिहारी ठग नटवरलाल की भूमिका में हैं. वे जनता को धोखा देते हैं. विकास के नाम पर दिखाने के लिए उनके पास कुछ नहीं है. कानून एवं व्यवस्था पर उनके लंबे-चौड़े दावे पिछले साल ही धूल-धूसरित हो चुके हैं. सात साल के उनके शासन में प्रदेश में एक पैसे का भी निवेश नहीं हुआ है. भ्रष्टाचार का बोलबाला है. नौकरशाहों का राज हो गया है.”
उन्होंने जेडी(यू)-बीजेपी की जुदाई की अफवाहों पर भी चुटकी ली. एक लोकप्रिय भोजपुरी मुहावरे का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कहा, ''इतने वर्षों तक नीतीश कुमार आरएसएस की गोद में बैठकर सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत करते रहे और अब वे तलाक की बात कर रहे हैं: सौ चूहा खाकर बिलैया बनीं भक्तिन.”
लालू के नए अवतार में मुख्य राजनैतिक मुहावरे के रूप में जाति की जगह विकास ने ले ली है. इस अवतार में उन्होंने अपने दो सालों साधु और सुभाष यादव तथा अपने पतन का कारण बने अन्य विवादास्पद तत्वों से दूरी बनाए रखने का सचेत प्रयास किया है. एक ऐसे इंसान के रूप में अपनी छवि प्रदर्शित करने के लिए, जो सिर्फ काम से मतलब रखता है, वे रेल मंत्री के रूप में अपने रिकॉर्ड का हवाला देते हैं और बिहार को एक नए रास्ते पर ले जाने का वादा करते हैं.
नीतीश से मुकाबला करने के लिए लालू कांग्रेस के साथ गठबंधन करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अभी तक अपने इन प्रयासों में उन्हें कोई सफलता नहीं मिली है. वे कहते हैं, ''सांप्रदायिक ताकतों को दूर रखने के लिए यह बहुत जरूरी है कि सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतें एक साथ आएं.”
लेकिन मतदाताओं के एक बड़े तबके में उनके कार्यकाल की यादें अब भी ताजा हैं. पटना के एक राष्ट्रीयकृत बैंक के मैनेजर कहते हैं, ''मैं कभी आरजेडी को वोट नहीं देने वाला. आरजेडी के शासनकाल में पटना इतना असुरक्षित हो गया था कि बलात्कार और अपहरण ही इसकी पहचान बन गई थी. लड़कियां बाहर नहीं निकल सकती थीं और शाम 7 बजे के बाद लोग बाहर कदम रखने से डरते थे. हम उन दिनों को कैसे भूल सकते हैं.” शहरी इलाकों के मतदाता ही नहीं बल्कि ग्रामीण इलाकों में हालात बदल गए हैं. सीतामढ़ी के हरदिया गांव की एक ईबीसी (अति पिछड़े वर्ग की) महिला राजो देवी कहती हैं, ''नीतीश बेहतर काम कर रहे हैं. सड़कों में सुधार हुआ है. गांव के कई गरीब लोगों के पास घर हो गए हैं. लड़कियों को मुफ्त में साइकिल मिली है.” ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री के लिए वापसी अब भी दूर की कौड़ी है.

