आजमगढ़ जिला मुख्यालय से 24 किमी दूर आजमगढ़-गोरखपुर मुख्य मार्ग से सटी सगड़ी तहसील के धनसुला गांव में 1,200 वर्गफुट जमीन पर कुछ दीवारें खड़ी हैं पर छत नदारद है. एक दीवार पर विद्यालय का नाम ‘एस.डी. इंटरमीडिएट कॉलेज’ लिखा है. इसी दीवार के सहारे एक तिरपाल के नीचे छात्र-छात्राएं बस्ता लिए शिक्षक का इंतजार कर रहे हैं. कक्षा एक से 12 तक के 150 विद्यार्थी इस कॉलेज के कागजों पर शिक्षा पाते हैं, लेकिन शिक्षा विभाग के दस्तावेजों में इसका जिक्र तक नहीं है.
*इसी तरह उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में आजाद पब्लिक इंटर कॉलेज है. यहां एक पेड़ के नीचे एक से बारहवीं तक की कक्षाएं चलती हैं, लेकिन शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में इसका नाम नहीं है.
ये महज दो विद्यालय नहीं, बल्कि सूबे में चल रहे उन फर्जी स्कूलों के प्रतिनिधि हैं, जिनके दम पर शिक्षा लूट का व्यवसाय बन गई है. सूबे के शिक्षा विभाग से मान्यताप्राप्त हाइस्कूल और इंटर कॉलेजों की तीन श्रेणियां हैं: सरकारी, सरकार से सहायताप्राप्त (एडेड) और वित्तविहीन (अनएडेड). विभागीय आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 1,000 राजकीय इंटर कॉलेज, 4,500 सहायताप्राप्त हाइस्कूल, इंटर कॉलेज और 15,500 वित्तविहीन हाइस्कूल और इंटर कॉलेज चल रहे हैं. इसके अलावा सभी गैर-मान्यताप्राप्त विद्यालय फर्जी स्कूलों की श्रेणी में आते हैं.
फर्जी स्कूलों का खुलासा वर्ष 2006 में बोर्ड परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर संगठित नकल के सामने आने के बाद हुआ. तब शासन हरकत में आया और छात्रों के पंजीकरण के नियम कड़े कर दिए गए. मान्यताप्राप्त विद्यालयों को नौवीं और ‘ग्यारहवीं’ में अपने यहां पढऩे वाले छात्रों का जिले के शिक्षा विभाग में पंजीकरण कराना अनिवार्य कर दिया गया, लेकिन यह कदम भी प्रभावी नहीं हुआ. बीते 10 वर्षों के दौरान शिक्षा विभाग ने प्रदेश में ऐसे करीब 50 फर्जी विद्यालयों पर कार्रवाई की है. बावजूद इसके फर्जी विद्यालयों की संख्या कहीं अधिक ठहरती है.
फर्जी स्कूल अपने यहां छात्रों की भर्ती करते हैं, लेकिन इनका पंजीकरण मान्यताप्राप्त स्कूलों में कराते हैं. इसमें पैसे का खुला खेल चलता है. लखनऊ के आजादनगर में बिना मान्यता के हाइस्कूल चलाने वाले एक विद्यालय के संचालक बताते हैं कि उन्होंने इस बार 80 बच्चों को नौवीं कक्षा में दाखिला दिया है. फीस के नाम पर हर छात्र से 400 रु. प्रतिमाह लिए जाते हैं. इनका पंजीकरण समीप के ही मान्यताप्राप्त स्कूल में कराया गया है, जिसके लिए विद्यालय प्रबंधन को प्रति छात्र 1,200 रु. के हिसाब से दिए गए हैं. इसके अलावा हर छात्र के हिसाब से 300 रु. तक जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय को पंजीकरण के लिए देने पड़े हैं.
लखनऊ के गिरधारी सिंह इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य इंद्र प्रकाश श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘फर्जी स्कूलों के छात्रों के पंजीकरण के समय ही बोर्ड परीक्षा में नकल का ठेका हो जाता है. परीक्षा सेंटर कहां पड़ेगा? नकल की क्या व्यवस्था होगी? इसके हिसाब से नकल का रेट तय होता है. हाइस्कूल में नकल से पास कराने के लिए 3,000 से 7,000 रु. और इंटर के छात्रों को पास कराने की एवज में 5,000 से 10,000 रु. अतिरिक्त वसूले जाते हैं.’’ श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘लखनऊ में फर्जी स्कूल बोर्ड परीक्षाओं में नकल कराने के लिए एक वर्ष में कुल मिलाकर 8 से 10 करोड़ रु. का व्यवसाय कर डालते हैं. पूरे प्रदेश में यह नकल व्यवसाय 600-700 करोड़ रु. के बीच ठहरता है.’’
यही नहीं, मान्यताप्राप्त विद्यालयों में भी यह खेल जारी है. ऐसे भी विद्यालय हैं, जिनकी केवल एक ही शाखा के पास मान्यता है लेकिन इसके बूते वे कई और शाखाओं का संचालन कर रहे हैं. लखनऊ के आजादनगर में चल रहा सेंट क्राइस्ट पब्लिक कॉलेज मान्यताप्राप्त है लेकिन इसके आधार पर फर्जी ढंग से गीतापल्ली इलाके में भी इसी नाम से कॉलेज चल रहा है. माध्यमिक शिक्षक संघ के अनुमान के मुताबिक लखनऊ में करीब दो दर्जन कई शाखाओं वाले ऐसे विद्यालय संचालित हो रहे हैं, जिनकी केवल एक ही शाखा को मान्यता मिली हुई है.
ऐसा नहीं है कि फर्जी स्कूलों का गठजोड़ केवल वित्तविहीन (अनएडेड) मान्यताप्राप्त स्कूलों से है. ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें सरकारी सहायता पाने वाले मान्यताप्राप्त विद्यालयों ने भी फर्जी स्कूलों के साथ एक गठबंधन बना कमाई की. 2 सितंबर को शिक्षा विभाग के जांच दल को लखनऊ पब्लिक मांटेसरी इंटर कॉलेज, काकोरी का सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालय सुन्नी इंटर कॉलेज, नक्खास में पंजीकृत मिला. जब सरकारी अधिकारी काकोरी के इस फर्जी विद्यालय की जांच करने पहुंचे तो मौके पर मौजूद शिक्षकों ने बताया कि वहां पढ़ रहे छात्र असल में सुन्नी इंटर कॉलेज, नक्खास के हैं, जो काकोरी में कोचिंग करने आए हैं.
यहीं पर फर्जीवाड़ा पकड़ में आ गया क्योंकि बीच शहर में मौजूद नक्खास इलाके से कोई छात्र 25 किमी दूर ग्रामीण क्षेत्र में कोचिंग करने क्यों जाएगा. इसी तरह का एक मामला नन्हे सिंह स्मारक इंटर कॉलेज, माल में भी मिला. अधिकारियों ने इन विद्यालयों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराकर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली.
सितंबर के दूसरे हफ्ते में जब ‘उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ्य ने ऐसे फर्जीवाड़े के खिलाफ आंदोलन शुरू किया तो लखनऊ में शिक्षा अधिकारियों ने कुछ हरकत दिखाई. मान्यताप्राप्त विद्यालयों की जांच शुरू होते ही धांधली की बू आने लगी है. लखनऊ के सीतापुर रोड स्थित इंद्रा पब्लिक इंटर कॉलेज की इंटर कक्षा में कुल पंजीकृत 187 छात्रों में से महज 40 ही पढ़ते मिले.
इसी प्रकार ठाकुरगंज के गोविंद नारायण इंटर कॉलेज की इंटर कक्षा में 63 और हाइस्कूल में 25 छात्र पंजीकृत हैं, लेकिन मौके पर एक भी छात्र इस कॉलेज में पढ़ते हुए नहीं मिला. इसी प्रकार चार दर्जन से अधिक मान्यताप्राप्त कॉलेजों में छात्र संख्या में गड़बड़ी मिली. साफ है, इन कॉलेजों ने तमाम ऐसे छात्रों का पंजीकरण करा रखा था जो इनके यहां नहीं, बल्कि दूसरे फर्जी कॉलेजों के छात्र हैं.
शिक्षा अधिकारियों को यह भी फिक्र नहीं कि जिन कॉलेजों को उन्होंने मान्यता दे रखी है, वह अस्तित्व में हैं भी कि नहीं. ऐसा ही एक विद्यालय लखनऊ के हिंदनगर का ‘स्टर्लिन पब्लिक इंटर कॉलेज’ है, जिसे अधिकारियों ने मान्यता दी है लेकिन इसकी जगह विद्यालय नहीं बल्कि बारात घर चल रहा है. शिक्षा विभाग के दस्तावेजों में रानी अवंतीबाई इंटरमीडियट कॉलेज, माहिबुल्लापुर को मान्यता मिली हुई है, लेकिन हकीकत में यह कॉलेज अस्तित्व में है ही नहीं.
असल में जरूरत के हिसाब से नए विद्यालय न खुलने से भी फर्जी स्कूलों को पनपने का मौका मिला है. बीते 10 वर्षों के दौरान यूपी बोर्ड की हाइस्कूल और इंटर की परीक्षाओं में शामिल होने वाले छात्रों का आंकड़ा 45 लाख से बढ़कर 62 लाख तक पहुंच गया है लेकिन मान्यताप्राप्त हाइस्कूल और इंटर कॉलेजों की संख्या 18,000 से बढ़कर 21,000 तक ही पहुंची है.
माहिबुल्लापुर के योगिता मांटेसरी स्कूल के प्रधानाचार्य वाई.पी. सिंह बताते हैं कि प्रदेश के जितने भी शहरों में नई कॉलोनियां बसी हैं, वहां पर सरकार ने जरूरत के हिसाब से काफी कम सरकारी विद्यालयों की व्यवस्था की है. ऐसे में इलाके की शिक्षा की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नए प्राइवेट विद्यालय खुले. जिनमें से कइयों के पास तो मान्यता ही नहीं है.
शिक्षा विभाग के एक विशेष सचिव बताते हैं कि प्रदेश में जिन नई कॉलोनियों का नियोजित ढंग से विकास किया गया है वहां सरकारी हाइस्कूल और इंटर कॉलेजों की व्यवस्था की गई है. बीते दस वर्षों के दौरान प्रदेश में 1,000 से अधिक ऐसे विद्यालय खोले गए हैं. विशेष सचिव के मुताबिक समस्या अनियोजित कॉलोनियों से जुड़ी हैं. ऐसी जगहों का सर्वे कराया जा रहा है और जल्द ही यहां जरूरत के हिसाब से मान्यताप्राप्त सरकारी व सहायताप्राप्त विद्यालय खोल दिए जाएंगे.
खेल स्कूलों की जमीन को लेकर भी चल रहा है. मान्यताप्राप्त विद्यालयों ने कमाई का नया जरिया निकाला है. लखनऊ के बाबूगंज स्थित रामाधीन सिंह इंटर कॉलेज प्रबंधन ने कॉलेज के खेल के मैदान में मैरिज हॉल खोल दिया है. स्कूल के प्रबंधन से जुड़े एक सदस्य बताते हैं कि विद्यालय को सरकार से वेतन के अलावा कोई और ग्रांट नहीं मिलती है. ऐसे में स्कूल के रखरखाव का खर्च निकालने के लिए यह व्यवस्था की गई है.
यही तर्क उन 90 फीसदी मान्यताप्राप्त विद्यालयों के प्रबंधन तंत्र का भी है जो स्कूलों की जमीन से अपनी जेबें गर्म कर रहे हैं. ‘उत्तर प्रदेश शैक्षिक संस्थाएं (अस्तियों का निवारण) अधिनियम, 1974’ के मुताबिक विद्यालय भूमि का व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा सकता. बावजूद इसके कानून तोडऩे वालों पर शिक्षा अधिकारियों की चुप्पी उनकी मिलीभगत की पोल खोल देती है. विभाग के पास विद्यालयों की जमीन का दुरुपयोग करने वालों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है, जबकि शिक्षक संघ के अनुमान के मुताबिक सूबे में ऐसे विद्यालयों की संख्या 2,000 से अधिक है.
लखनऊ के जिला विद्यालय निरीक्षक उमेश त्रिपाठी कुछ विभागीय दबाव की बात स्वीकार करते हैं जिसकी वजह से फर्जी स्कूलों पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी. शिक्षक संघ के सख्त रवैये के बाद शिक्षा विभाग ने सितंबर के दूसरे हफ्ते से तेजी दिखाते हुए राजधानी में 250 से अधिक फर्जी विद्यालयों पर एफआइआर दर्ज करा दी है. त्रिपाठी बताते हैं, ‘‘उन मान्यताप्राप्त विद्यालयों पर भी कार्रवाई की जा रही है जिन्होंने क्षमता से कई गुना ज्यादा छात्रों का बोर्ड परीक्षा के लिए पंजीकरण कराया है. इनके बोर्ड परीक्षा के पंजीकरण फार्म में कटौती भी की गई है.’’
-साथ में सुधीर सिंह, हरिशंकर शाही और सिराज कुरैशी

