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पाकिस्तानी नेता की भारतीय धरोहर

पड़ोसी देश के पहले प्रधानमंत्री के बंगले को राज्य सरकार पर्यटन स्थल बनाना चाहती है लेकिन उस पर किसी और का कब्जा है.

अपडेटेड 17 अक्टूबर , 2012

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के कंपनी बाग इलाके के सजे-संवरे लॉन, पेड़ों की कतारों और लोहे के ग्रिल वाला ‘कहकशां’ नाम का सफेद बंगला कोई साधारण इमारत नहीं है. अंग्रेजों के जमाने की इस इमारत के मालिक कभी पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान हुआ करते थे. लियाकत अली पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिन्ना के लिए वैसे ही थे जैसे भारत में महात्मा गांधी के लिए जवाहरलाल नेहरू. उनके खानदान से जुड़े लोग मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील में रहा करते थे.Liyakat Ali

इस बंगले के ऐतिहासिक महत्व और प्रासंगिकता को देखते हुए समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री आजम खान की जिले के अधिकारियों के साथ हाल ही में एक बैठक हुई. उसमें सुझाव दिया गया कि सरकार इस बंगले का अधिग्रहण कर ले और इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करे. फिलहाल यह बंगला मुजफ्फरनगर के पुरकाज़ी इलाके में रहने वाले एक परिवार के कब्जे में है जिसका दावा है कि उनके पूर्वजों ने इस बंगले को लियाकत अली खान के परिवार से खरीदा है. यह इमारत सामान्य लोगों की जद से बाहर है.

यह परिवार इमारत के एक हिस्से में शारदीन स्कूल चलाता है, जो सीबीएसई से मान्यताप्राप्त है. इस तरह इस इमारत में छात्र और कभी-कभी उनके अभिभावक ही आ-जा पाते हैं. बंगले पर काबिज इस परिवार ने कोशिश करने पर बात करने से इनकार कर दिया और सुरक्षा गार्डों ने इस ऐतिहासिक इमारत की तस्वीरें लेने पर भी आपत्ति जताई.

1947 से पहले यानी भारत विभाजन के पूर्व लियाकत अली के परिवार की मेजबानी में यहां आने वाले कई नवाब इस शानदार बंगले में ठहरते थे. मुजफ्फरनगर के कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि लियाकत अली अपने परिवार के साथ इससे कुछ सौ मीटर की दूरी पर स्थित एक दूसरे बंगले में रहते थे. अब उस बंगले को एक सरकारी ऑफिस और आवासीय क्वार्टरों में तब्दील कर दिया गया है. 80 वर्षीय मुहम्मद सलीम बताते हैं, ‘‘कंपनी बाग वाला बंगला मुख्य रूप से परिवार के लोगों के शौक को पूरा करने के लिए था. वहां सालभर उनकी मेजबानी में कोई न कोई नवाब या कोई खास शख्स ठहरा करता था.”

मुजफ्फरनगर से लियाकत अली का जुड़ाव 1926 के समय शुरू हुआ था, जब उन्होंने इस ग्रामीण क्षेत्र से प्रांतीय विधायी परिषद का चुनाव लड़ा था. वे भारी मतों से विजयी हुए थे क्योंकि उन्हें चुनौती देने वाला कोई सामने नहीं आया. 1932 में उन्हें निर्विरोध रूप से संयुक्त प्रांत की विधान परिषद का उपाध्यक्ष चुन लिया गया. लियाकत अली 1940 तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के निर्वाचित सदस्य बने रहे और उन्हें इसी साल केंद्रीय विधानसभा का सदस्य चुन लिया गया. सलीम ने बताया, ‘‘वे एक प्रभावशाली परिवार से थे जिनके ब्रिटिश सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से मजबूत रिश्ते थे. ऐसे कई अधिकारी उनके इस बड़े बंगले में अकसर आकर ठहरते थे.”

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