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मर्दवादी निजाम से टकरातीं लड़कियां

वनस्थली विश्वविद्यालय में छात्राओं के साथ दुर्व्‍यवहार और हंगामे के लिए प्रशासन के अडिय़ल मर्दवादी रवैए को दोषी माना जा रहा है.

वनस्थली विश्वविद्यालय
वनस्थली विश्वविद्यालय
अपडेटेड 17 अक्टूबर , 2012

राजस्थान के टोंक जिले के निवाई में राज्य के पहले मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री द्वारा स्थापित वनस्थली विश्वविद्यालय के 77 साल के प्रतिष्ठित इतिहास में 4 अक्तूबर को एक दाग लग गया. उस दिन हजारों लड़कियां अपने छात्रावासों से प्रदर्शन करते हुए बाहर निकल आईं. उनका आरोप था कि वहां दो लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ है.

जल्द ही अफवाह फैली कि उनमें से एक की अस्पताल में मौत हो गई है. कुछ लड़कियों ने यह खबर एसएमएस के जरिए फैला दी तो कुछ लड़कियों ने इंटरनेट के जरिए इस घटना का प्रचार कर दिया. इनमें एक हॉस्टल की साइट भी थी. जिन माता-पिता ने सबसे सुरक्षित जगह मानते हुए अपनी लड़कियों को यहां पढऩे के लिए भेजा था, वे दूर-दराज से अपनी बच्चियों को वापस लाने के लिए निकल पड़े.

जल्द ही वरिष्ठ सरकारी अफसरों का तांता लग गया. राष्ट्रीय और राज्य महिला आयोग की टीमों ने दौरा कर डाला और जांच का ऐलान कर दिया. सांसद किरोड़ी लाल मीणा जल्दबाजी में धरने पर बैठ गए.

तकरीबन आधी संख्या में छात्राओं के साथ कुछ ही दिन के भीतर कक्षाएं भी दोबारा शुरू हो गईं. अब तक कोई भी सटीक तौर पर यह नहीं बता सका है कि उस दिन आखिर वहां हुआ क्या था. नतीजा यह है कि अब भी छात्राओं और उनके माता-पिता के दिमाग में आशंका और भय के बादल मंडरा रहे हैं.

इंडिया टुडे ने इस घटना की कडिय़ों को जोडऩे की एक कोशिश की है. ऐसा लगता है कि लड़कियां दो अलग-अलग घटनाओं का जिक्र कर रही थीं. पहली घटना में एक लड़की ने परिसर के भीतर स्थित सभागार-सिने स्थल में खुद के साथ बलात्कार होने का या तो आरोप लगाया था या फिर किसी पुरुष कर्मचारी के साथ वह रंगे हाथों पकड़ी गई थी. उसे या तो विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया या फिर उसका अस्थायी निलंबन हुआ है.

एक और लड़की थी जिसे अस्पताल ले जाना पड़ा. उसका आरोप था कि एंबुलेंस के चालक ने उसे गलत जगह हाथ लगाया था, हालांकि आक्रोशित लड़कियां बार-बार कह रही थीं कि उसके साथ भी बलात्कार हुआ है. उन्होंने यह भी दावा किया कि एक महिला वार्डन ललिता ने कुछ लड़कियों को बंधक बना लिया था. एक पीड़ित लड़की ने अपने साथ हुई घटना का ब्योरा भी उन्हीं लड़कियों को दिया था.

पुलिस ने इन आरोपों को आंशिक तौर पर सही पाया है. एंबुलेंस के चालक को गिरफ्तार करके लड़कियों से छेड़छाड़ के आरोप में जेल भेज दिया गया है. वार्डन पर आरोप लगा कि उसने दो लड़कियों को एक कमरे में बंद कर दिया था जिन्हें पुलिस ने छुड़ाया. 

इस विस्फोटक घटना की पूर्वस्थिति को पहले जान लेना जरूरी है. विश्वविद्यालय परिसर बहुत सुरम्य है और बाहरी दुनिया से कटा हुआ है. सरकार ने बस स्टैंड से पर्याप्त बसों की व्यवस्था की हुई है ताकि लड़कियों का वहां आसानी से पहुंचना सुनिश्चित किया जा सके. इसके बावजूद शाम सात बजे के बाद छात्राओं को परिसर तक ले जाने के लिए कोई बस नहीं चलती. उन्हें वहां जीप से जाना पड़ता है.

एक पोस्टग्रेजुएट छात्रा ने इंडिया टुडे  को बताया, ‘‘पिछले हफ्ते मैं जीप में अकेली पुरुषों के बीच बैठी थी. उनमें से एक बियर पी रहा था. मैं रास्तेभर सुरक्षा के लिहाज से अपनी मां से फोन पर बात करती रही.” मोबाइल फोन अधिकतर लड़कियों के लिए सुरक्षा का पर्याय है जबकि यूनिवर्सिटी के कुलपति आदित्य शास्त्री का मानना है कि यह खुराफाती चीज है, जिसके कारण लड़कियां अकसर लड़कों के प्रेम जाल में फंस जाती हैं. इसीलिए उन्होंने मोबाइल सिग्नल रोकने के लिए परिसर में जैमर लगवा रखे हैं. कुछ साल पहले एक लड़की की हॉस्टल की छत से गिरने से मौत हो गई थी. प्रशासन का कहना है कि वह सेलफोन पर बात कर रही थी जबकि लड़कियां कहती हैं कि उसने खुदकुशी की थी.

शास्त्री दावा करते हैं कि हाल के वर्षों में सिर्फ दो लड़कियों ने परिसर के भीतर खुदकुशी की है जबकि राष्ट्रीय औसत को देखें तो यह संख्या दस होनी चाहिए थी. यह बात उन्होंने गुस्साए सांसद किरोड़ी लाल मीणा के सामने कह दी थी, जो यह सुनने के बाद इतना गरमाए कि बैठक से ही उठकर चले गए.

परिसर में इंटरनेट की सुविधा है. वहां की लड़कियों के प्रेम प्रसंग भी होते हैं और वे प्रेम विवाह भी करती रही हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि चूंकि अधिकतर लड़कियां ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों से आती हैं, इसलिए उनके माता-पिता भी वहां लगाई जाने वाली बंदिशों के पक्ष में होते हैं. फैकल्टी के एक वरिष्ठ सदस्य ने इंडिया टुडे को बताया, ‘‘इनकी सुरक्षा की जानी जरूरी है. कोई भी मां-बाप नहीं चाहेगा कि उसकी लड़की नौजवानों के चक्कर में फंस जाए.”

राजस्थान सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि सारी समस्या की जड़ में विश्वविद्यालय प्रशासन की यह सोच है. वे कहते हैं, ‘‘उन्हें लड़कियों को इस तरह तैयार करना चाहिए कि वे आधुनिक दुनिया का सामना कर सकें. यहां लड़कियों को इतना अलग-थलग रखा जाता है कि मुझे लगता है कि बाद में वे सामान्य जीवन जी पाती हैं भी या नहीं.”

सरकारी अधिकारियों का मानना है कि चीजों को ढक कर रखने और ऐसे मामलों में लड़कियों की किसी भी शिकायत को कान न देने का रवैया ही हालिया स्थिति के लिए जिम्मेदार है. अजमेर रेंज की आयुक्त किरन सोनी गुप्ता ने अपनी रिपोर्ट में हालात से सही ढंग से न निपटने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को और वहां संचार व्यवस्था की कमी को दोषी ठहराया है. इसी तरह महिला आयोग की टीमों ने भी विश्वविद्यालय प्रशासन के अडिय़ल रवैए को आड़े हाथों लिया है.

घटना की सूचना मिलने पर न सिर्फ  मीडिया बल्कि वहां सबसे पहले पहुंचे वरिष्ठ अधिकारियों को भी प्रवेश करने से रोका गया था. जिन लड़कियों ने शिकायत की है या जिन्होंने घटना के बारे में एसएमएस किए थे, उनकी पहचान प्रशासन ने कर ली है और उन्हें अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी दी जा रही है. शायद उन्हें निलंबित भी कर दिया जाए.

परिसर में मौजूद एक वरिष्ठ शिक्षिका ने इंडिया टुडे को बताया कि मौजूदा प्रशासन में उन आदर्शों का अभाव है जिन पर यह संस्थान बरसों से चलता रहा है. इसके संचालन का ढांचा अब व्यावसायिक हो चला है. वे कहती हैं, ‘‘वीसी से मिलने के लिए हमें घंटों क्लास छोड़कर इंतजार करना पड़ता है. उनसे पहले वाले वीसी हमें तुरंत बुला लेते थे और बात होने के बाद तुरंत काम पर जाने को कहते थे.”

सरकार अब इस विश्वविद्यालय में गठित यौन प्रताडऩा पर कमेटी में अपना एक प्रतिनिधि नियुक्त करने पर विचार कर रही है. पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि यौन प्रताडऩा या रंगे हाथों पकड़े जाने के मामले में क्या किसी लड़की को यहां से वास्तव में निकाला गया है. सच सामने आने में थोड़ा वक्त लगेगा, लेकिन इससे कहीं अहम यह है कि वनस्थली की खोई प्रतिष्ठा को लौटने में उससे कहीं ज्यादा वक्त लगेगा.

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