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जन सत्याग्रह: जमीन के लिए दिल्ली चलो

हजारों आदिवासियों ने अपने अधिकारों की मांग के लिए दिल्ली कूच किया.

अपडेटेड 13 अक्टूबर , 2012

अपनी आजीविका के लिए जमीन का एक टुकड़ा मांगने वाले करीब 50,000 लोगों ने बुधवार, 3 अक्तूबर को ग्वालियर से दिल्ली के लिए कूच किया. इससे एक रोज पहले उन्होंने शहर के मेला मैदान में केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश और ज्योतिरादित्य सिंधिया के भूमि सुधार के मौखिक आश्वासनों पर भरोसा करने से इनकार कर दिया.

देश के 26 राज्यों से भूमिहीन आदिवासी करीब 340 किमी पैदल यात्रा करते हुए 27 दिन बाद राजधानी दिल्ली पहुंचेंगे और संसद के पास धरना देंगे. एकता परिषद के इस जन सत्याग्रह में रास्ते में दूसरे लोग भी जुड़ते जाएंगे और आयोजकों को उम्मीद है कि दिल्ली पहुंचते-पहुंचते उनकी तादाद करीब एक लाख हो जाएगी.

पिछले पांच वर्ष से भूमि सुधार के मुद्दे पर एकता परिषद के पी.वी. राजगोपालन बात करते आ रहे हैं, लेकिन उनके मुताबिक, ''केंद्र सरकार इसे समझने के लिए तैयार ही नहीं है.”

इसी कारण 2007 में जनादेश आंदोलन की तरह 25,000 लोगों ने ग्वालियर से दिल्ली तक पदयात्रा की थी, तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद का गठन करके कहा था कि जल्दी ही भूमि संबंधी विवाद निपटाए जाएंगे. उसके बाद पांच वर्ष हो गए, लेकिन इस समिति की एक बैठक तक नहीं की गई. इसी की वजह से एक लाख लोगों के दिल्ली कूच करने की तैयारी होने लगी.

हाल में अण्णा हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलनों के ठंडा पडऩे से राहत की सांस ले रही केंद्र सरकार इतनी बड़ी संख्या में लोगों के दिल्ली कूच करने की बात सुनकर परेशान हो गई. एकता परिषद के लोगों को मनाने के लिए ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री सिंधिया के साथ गांधी जयंती के दिन 2 अक्तूबर को ग्वालियर भेजा गया. यहां आए रमेश ने हजारों लोगों को यह कहकर निराश कर दिया कि जमीन तो राज्यों का विषय है. यदि केंद्र सरकार इसमें हस्तक्षेप करेगी तो इसे संघीय ढांचे पर प्रहार माना जाएगा.

वैसे, उन्होंने यह स्वीकार किया कि जिस प्रकार शिक्षा, वन, स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय नीति है, उसी प्रकार भूमि पर भी नीति होनी चाहिए. इसके लिए राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति का मसौदा अगले छह महीने में बनकर तैयार हो जाएगा. उन्होंने नए भूमि अधिग्रहण कानून का हवाला दिया और कहा कि सरकार ने इसमें पुनर्वास और पुर्नस्थापन जैसे मुद्दे डाले हैं. यही नहीं, आदिवासी इलाकों की जमीन बिना ग्राम सभा की अनुमति के नहीं ली जाएगी. इसलिए ग्वालियर आए लोगों को अपने घरों को लौट जाना चाहिए और सरकार जल्दी ही मामले को हल करेगी, लेकिन ये बातें केवल पत्रों तक सीमित रहीं और ग्वालियर में किसी प्रकार का समझौता न हो सका.

दिल्ली कूच के लिए जन सत्याग्र्रह कोर कमेटी की बैठक में भी यही निर्णय लिया गया कि सरकार के वादों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. उनके सामने अण्णा और रामदेव के साथ केंद्र की बातचीत के विफल होने की नजीर थी. अंत में जनसत्याग्रह के प्रमुख राजगोपालन ने मंच से ऐलान कर दिया कि भले ही कितने ही अवरोध आएं, वे लोग दिल्ली जाएंगे और हुआ भी यही.

3 अक्तूबर को सुबह साढ़े आठ बजे हजारों लोगों ने दिल्ली की ओर कूच कर दिया. वे हर रोज 12 किमी पैदल चलेंगे और दिल्ली पहुंचने तक दिन में सिर्फ एक वक्त खाना खाएंगे. इस मार्च में विभिन्न एनजीओ के 2,000 प्रतिनिधि शामिल हैं. राजगोपालन कहते हैं कि वे संवाद के साथ संघर्ष का रास्ता बनाकर चल रहे हैं और सरकार यदि खेती या झोंपड़ी बनाने के लिए जमीन देने का कानून भी बनाने को तैयार हो जाती है तो दिल्ली मार्च रुक सकता है, नहीं तो अब आर-पार की लड़ाई होगी.

गरीबी, भुखमरी और पिछड़ेपन का पर्याय बन चुके आदिवासी अपने जायज हक की मांग कर रहे हैं. एकता परिषद के नेताओं ने केंद्र सरकार से संवाद का रास्ता खुला रखा है. अब क्या दिल्ली पहुंचने से पहले सरकार उनकी मांगें मान लेगी?

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