वक्फ यानी वह संपत्ति, जिसे धर्म-कर्म से जुड़े कार्यों के लिए दान किया गया हो. जिन लोगों ने यह संपत्ति यतीमों, बेवाओं और गरीबों की मदद करने की मंशा से दान की, उन्हें यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि यही संपत्ति कुछ लोगों के बीच वर्चस्व और सियासत की जंग का पर्याय बन जाएंगी. वक्फ से जुड़ा शायद ही कोई इमामबाड़ा, कर्बला ऐसी हो, जिस पर अवैध कब्जों का दाग न हो. इनकी जमीन पर नजर गड़ाए लोगों ने कब्रिस्तान को भी नहीं बख्शा है.
उत्तर प्रदेश में 10,000 से अधिक शिया वक्फ हैं, जिनमें इमामबाड़ा, कर्बला, कब्रिस्तान आदि शामिल हैं. इनकी देख-रेख का जिम्मा शिया वक्फ बोर्ड संभालता है. बोर्ड के अध्यक्ष सैयद वसीम रिजवी बीते दिनों तब चर्चा में आए, जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उन पर कार्रवाई की मांग को लेकर शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद ने 17 अगस्त को अलविदा की नमाज के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के 5, कालिदास मार्ग स्थित सरकारी आवास का घेराव करने का ऐलान किया.
मौलाना जव्वाद के इस ऐलान के 24 घंटे के भीतर ही समाजवादी पार्टी (सपा) ने रिजवी को अनुशासनहीनता के आरोप में छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया. रिजवी कहते हैं, ‘’पार्टी ने मौलाना जव्वाद के दबाव में मुझे पार्टी से निकाला है. मैंने अनुशासनहीनता नहीं की है.’’
शिया वक्फ संपत्ति में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ मौलाना जव्वाद की जंग 10 साल पहले शुरू हुई थी. 2003 में जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तो वक्फ मंत्री आजम खां की सिफारिश पर पूर्व सपा सांसद मुख्तार अनीस को शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया. अनीस के कार्यकाल में लखनऊ के हजरतगंज में एक वक्फ संपत्ति को बेचे जाने का मौलाना जव्वाद ने विरोध किया, जिस पर अनीस को बोर्ड के चेयरमैन पद से हटना पड़ा.
इसके बाद 2004 में मौलाना जव्वाद के करीबी सपा के पूर्व पार्षद वसीम रिजवी बोर्ड के चेयरमैन बने. 2007 में मायावती की सरकार बनने के बाद रिजवी बीएसपी में शामिल हो गए. 2009 में शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया.
चुनाव के बाद जब नए बोर्ड का गठन हुआ तो मौलाना जव्वाद की सहमति से उनके बहनोई कमालुद्दीन अकबर चेयरमैन बने और इस बोर्ड में वसीम रिजवी सदस्य चुने गए और यहीं से रिजवी और मौलाना जव्वाद के बीच राजनैतिक जंग का आगाज हुआ. एक साल बाद 2010 में बोर्ड में भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर अकबर ने इस्तीफा दे दिया और रिजवी फिर चेयरमैन बन गए.
असल में शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड पूरे प्रदेश में जिन 10,000 संपत्तियों की देखरेख अपने मुतवल्ली (ट्रस्टी) के माध्यम से करता है, उनकी अनुमानित कीमत 50 लाख करोड़ रु. से भी अधिक है. यही कारण है कि इन पर सबकी बुरी नजर है. सिर्फ लखनऊ में ही आजादी के समय कुल 46 शिया कब्रिस्तान थे, लेकिन इस वक्त 15 ही बचे हैं. बाकी 31 पर अवैध कॉलोनियां बस गई हैं.
वक्फ कर्बला बाग ठाकुरगंज, वक्फ मकबरा राजिया बेगम गोलागंज, वक्फ कब्रिस्तान व मस्जिद सितारा बेगम, कब्रिस्तान बाग मसीते खां सआदतगंज, कब्रिस्तान निजामुद्दौला ठाकुरगंज, कब्रिस्तान नेशादुरी नूरबाड़ी आलमरोड आदि उन शिया कब्रिस्तानों में शुमार हैं, जिनका अस्तित्व मिट चुका है.
लखनऊ में कैंपवेल रोड स्थित वक्फ मलकागेती की 110 बीघा जमीन बाकायदा प्लॉटिंग करके बेची गई और शिया वक्फ बोर्ड चुपचाप बैठा रहा. इसी तरह बालागंज इलाके में वक्फ हुसैनी बेगम की साढ़े चार बीघा जमीन, तालकटोरा में वक्फ अजीमुल्ला खां की 27 बीघा जमीन को धंधेबाजों ने बेच डाला और अब यहां पक्के मकान बन चुके हैं. कानपुर में वक्फ फिरदौसी बेगम की 25 करोड़ रु. की कीमत वाली वक्फ संपत्ति समाप्त की जा चुकी है. मुजफ्फरनगर में नजमुन निसा वक्फ की 10 करोड़ रु. की संपत्ति के अलावा आगरा, रामपुर में भी कई संपत्ति भू-माफियाओं की भेंट चढ़ चुकी हैं.
शिया वक्फ बोर्ड की संपत्ति में भ्रष्टाचार की शिकायत लोकायुक्त तक पहुंच चुकी है. शिया वक्फ बोर्ड में अनियमितताओं के आरोपों पर जब सरकार नहीं चेती तो पिछले साल मौलाना जव्वाद ने अपना आंदोलन तेज कर दिया. विधानसभा चुनाव के दौरान यह थमा और फिर सपा सरकार बनते ही 30 मार्च को मौलाना जव्वाद ने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव से पहली मुलाकात में ही शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड को भंग करने की मांग कर दी. इसके बाद रिजवी ने भी उन सभी वक्फ की जांच का आदेश दे दिया, जिसके मुतवल्ली मौलाना जव्वाद हैं.
सरकार को भेजी गई जांच रिपोर्ट में सीधे मौलाना जव्वाद पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने बड़ी संख्या में इमामबाड़ा गुफरान मआब में कब्रों को बेचा है. जांच रिपोर्ट में उन लोगों का हवाला भी दिया गया, जिनके रिश्तेदारों को इमामबाड़ा गुफरान मआब की कब्र में दफन करने के एवज में ‘डोनेशन’ के रूप में 50,000 रु. की मांग की गई थी, जिसे चुकता करने के बाद ही मृत शरीर को कब्र नसीब हुई. यही नहीं, इसी इमामबाड़े में कब्र की जमीन के ऊपर बने सामरा अस्पताल को भी अवैध ठहराया गया है.
इस जांच रिपोर्ट को तैयार करने वाले बोर्ड के एक अधिकारी बताते हैं कि कब्रिस्तान की 7,000 वर्गफुट जमीन पर सामरा अस्पताल का निर्माण पूरी तरह अवैध है. हालांकि सामरा अस्पताल के मालिक डॉ. समर अब्बास इन आरोपों को खारिज करते हैं, ‘’इमामबाड़ा प्रशासन ने ही उन्हें अस्पताल बनाकर दिया है. हर महीने इसका किराया दिया जाता है.’’
रिजवी ने पूरे मामले में सीबीआइ जांच की सिफारिश कर दी. हालांकि मौलाना जव्वाद इन आरोपों को खारिज करते हैं. वे कहते हैं, ‘’सरकारी नीतियों के चलते रिजवी को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट मिली और अब सरकार ही इन्हें बचा रही है. मैंने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों की सीबीआइ जांच कराने की मांग की है. मेरे अलावा वसीम रिजवी की भी सीबीआइ जांच हो जाए तो सब साफ हो जाएगा.’’

