यह इस बात की मिसाल हो सकती है कि बेहतर शिक्षा का अवसर कैसे कई तरह के कारोबार के अवसर पैदा कर सकता है. कोटा शहर में एक नया कोटा और बस गया है, जिसने राजस्थान के दम तोड़ चुके इस औद्योगिक नगर को न केवल शिक्षा नगरी के रूप में पहचान दी है बल्कि जिले की अर्थव्यवस्था में भी नई जान फूंक दी है. इस नए कोटा ने पहले से ही बड़े कोटा को महानगर-सी सूरत दे दी है. जमीन-जायदाद की बढ़ती कीमतों के कारण स्थानीय व्यवसायियों के अलावा नेता और आप्रवासी भारतीय (एनआरआइ) भी रियल एस्टेट में निवेश कर रहे हैं. नतीजतन, नए शहर में नए निर्माण की झड़ी लग गई है.
लगभग तीन दशक पहले कोटा में एक दौर ऐसा आया था जब जे.के. इंडस्ट्रीज के कई प्लांट्स सहित दूसरे उद्योग के एक एक कर बंद होने से पूरे शहर की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी थी. बेकार हुए फैक्टरी कर्मचारियों ने आत्महत्या तक करना शुरू कर दिया था. लेकिन अब कई लोग मकान किराए पर देकर ही मजे में घर चला रहे हैं. देशभर के कोने-कोने से छात्रों को आकर्षित करने वाले कोचिंग व्यवसाय की शुरुआत दो दशक पहले हुई थी. लेकिन पिछले एक दशक के दौरान आए उफान ने कोचिंग क्षेत्रों के इर्दगिर्द के इलाकों की काया ही पलट कर रख दी. कोटा के दूसरे इलाकों को भी इसका लाभ मिल रहा है.
कोटा में अनेक कोचिंग इंस्टीट्यूट हैं, जो आइआइटी, पीएमटी, पीईटी की कोचिंग कराते हैं. इनमें देशभर से हर साल तकरीबन 80,000 से 1,00,000 तक छात्र कोचिंग के लिए आते हैं. अब इनसे होने वाली कमाई का मोटा आकलन भी किया जाए तो प्रत्येक छात्र कोचिंग में फीस के 50,000 से 60,000 रु. के अलावा प्रति माह 7,000 से 13,000 रु. तक हॉस्टल (खाने सहित) के लिए खर्च करता है. दूसरे खर्च अलग. प्रति छात्र तकरीबन डेढ़ लाख रु. खर्च के हिसाब से 80,000 छात्रों से सालभर में तकरीबन 12 अरब रु. की न्यूनतम कमाई होती है.
प्रोपर्टी डीलर अरविंद गुप्ता कहते हैं, फायदा बड़े धन्ना सेठों से लेकर हमारे सरीखे मध्यम वर्गीय व्यवसायियों और चाय का स्टॉल लगाने वाले से लेकर जूते-चप्पल की मरम्मत करने वालों तक सभी को हुआ है.’’ महावीर नगर तृतीय में रहने वाले गुप्ता बताते हैं, ‘’इस इलाके में पाव भाजी वाला भी 4 से 5,000 रु. कमा लेता है.’’
कोटा में बढ़ते कारोबार को देखकर न केवल महानगरों बल्कि विदेशों मे रहने वाले एनआरआइ भी यहां रियल एस्टेट में खूब निवेश कर रहे हैं. कोचिंगों के शुरुआती दौर में विज्ञान नगर, जवाहर नगर और तलवंडी इलाकों को छात्रों का गढ़ माना जाता था. यहां अब भी काफी छात्र रहते है. लेकिन अब छात्रों के कई अन्य केंद्र बन गए हैं. बीते एक दशक में तेजी से विकसित हुए राजीव नगर, इंदिरा विहार, रीको इलेक्ट्रॉनिक्स कॉम्प्लेक्स, महावीर नगर प्रथम, द्वितीय और तृतीय, रंगबाड़ी योजना, सुभाषनगर इसका सबूत है.
बीते पांच-छह वर्षों के दौरान यहां अनगिनत बहुमंजिला इमारतें (जी-4) खड़ी हो गई हैं. गौरतलब है कि सारे मकान हॉस्टल में तब्दील हो गए हैं. एक अनुमान के मुताबिक, नए शहर और उसके आसपास 1,000 से ज्यादा मकान हॉस्टलों में तब्दील हो चुके हैं.
कोटा के एकमात्र सिटी माल के मालिक और गुरुकुल नाम से इलाके में चार हॉस्टल चला रहे वीरेंद्र पंड्या बताते हैं, ‘’मैंने पहला सुव्यवस्थित हॉस्टल गुरुकुल सन् 2000 में शुरू किया था. कोटा में हॉस्टल मुनाफे का सौदा होने के कारण अब तो इनकी बाढ़-सी आ गई है. यह सब सन् 2005 के बाद तेजी से हुआ है.’’
शहर में नगर विकास न्यास द्वारा रिहाइशी इलाके के रूप में विकसित किए गए राजीव नगर में तकरीबन अस्सी फीसदी मकान हॉस्टल बन गए हैं. यहां 40-50 हॉस्टल डिजाइन कर चुके आर्किटेक्ट विकास जैन बताते हैं, ‘’अकेली इस कॉलोनी में करीब तीन सौ से ज्यादा हॉस्टल हैं, जिनमें 300-400 की क्षमता वाले 15 हॉस्टल हैं और बाकी 50-60 छात्र क्षमता वाले हैं. वैसे पूरे इलाके में हॉस्टल्स की भरमार है. ये हॉस्टल अपने स्तर के मुताबिक प्रति छात्र 7,000 से 13,000 रु. प्रति माह वसूल करते हैं. इस पैसे में भोजन भी शामिल है.’’
विज्ञान नगर और राजीव नगर में नौ वर्ष से समृद्वि और विजयदीप हॉस्टल का संचालन कर रहे दीपक कोहली कहते हैं, ‘’ऐसा बूम बीते 10 वर्षों में कभी नहीं आया. अगस्त में भी खूब एन्क्वायरी आई. आने वाले एक-दो बरसों में सारे रिकॉर्ड टूट सकते हैं.’’
कोहली बताते हैं, ‘’बंगलुरू निवासी और आइआइटियन विजय आनंद पहले तो आइआइटी के लिए कोचिंग की जरूरत से ही इनकार करते थे. यहां आकर वे इतने प्रभावित हुए कि न केवल कोचिंग के महत्व को स्वीकार किया बल्कि पांच साल पहले अपना हॉस्टल शुरू कर दिया. उनके हॉस्टल में तमिलनाडु, केरल से लेकर गुजरात और पंजाब तक के छात्र हैं.’’
नए शहर में जमीन की कीमतें कोटा की पॉश कॉलोनी बल्लभ नगर की कीमतों को लांघ चुकी हैं. सन् 2000 में यहां कीमत 400-450 रु. प्रति वर्ग फुट थी, जो 2004 में 900 से 1,000 रु. तक पहुंची. आज राजीव नगर में जमीन की कीमत 4,500-5,000 रु. प्रति वर्ग फुट पहुंच चुकी है.
अरविंद गुप्ता बताते हैं कि बूंदी रोड, बारां रोड पर मल्टीस्टोरी बिल्डिंगों में फ्लैट की कीमत 15 से 20 लाख रु. तक है. वहीं राजीव नगर में यह कीमत 35-60 लाख रु. तक है. मुनाफे का सौदा होने के कारण बाहर के उद्यमी यहां मकानों और जमीन में खूब निवेश कर रहे हैं, जिनमें महानगरों, विदेशों के व्यापारी और बड़ी फर्मों के कर्मचारी शामिल हैं.
मुंबई के बॉबी दत्ता ने यहां महालक्ष्मी एन्क्लेव में दो वर्ष पहले 2 बीएचके का फ्लैट 13 लाख रु. में खरीदकर उसे किराए पर लगा दिया. वे बताते हैं, ‘’आज फ्लैट की कीमत 18 लाख रु. है.’’ कोटा के नेताओं ने भी इन हॉस्टलों में निवेश करके दूसरे लोगों को लीज पर दे रखा है. जोधपुर के जगदीश चौधरी एक ऐसे ही नेताजी के भवन को लीज पर लेकर गर्ल्स हॉस्टल चलाकर पर्याप्त कमा रहे हैं.
अब रमेश चंद नामा की भी सुनते हैं. जे.के. फैक्टरी बंद होने के बाद बरसों तंगी और संघर्ष झेलने वाले इस शख्स ने महावीर नगर स्थित घर में जैसे-तैसे पांच-छह कमरे बनवा लिए. किराए के 30,000 रु. और टिफिन सेंटर से होने वाली आय से उनके दिन फिर गए हैं.
हॉस्टल से होने वाली कमाई में एनआरआइ भी अपना हिस्सा चाहते हैं. इसी वजह से अमेरिका में रह रहे चतर जी ने भी यहां दो हॉस्टल बनवाए हैं. हॉस्टल का कारोबार इतना मुनाफे वाला है कि दूसरे जिलों के लोग भी इसमें कूद पड़े हैं. भीलवाड़ा के रतन दरगढ़ छह साल पहले अपने बच्चों को आइआइटी की कोचिंग कराने कोटा आए थे. फिर हॉस्टल का धंधा उन्हें इतना भाया कि यहीं निवेश करके प्रखर हॉस्टल चलाने लगे. कई कंपनियों ने भी यहां विभिन्न मल्टीफ्लेक्स में अरबों रु. निवेश किए हैं. इस नए कोटा के साथ राजपुर क्षेत्र में रीको द्वारा एजुकेशन हब विकसित किया जा रहा है.
लेकिन इस अंधाधुंध विकास के कुछ अनचाहे पहलू भी हैं. दूसरे धंधों में नुकसान झेलने के बाद हॉस्टल चलाकर आर्थिक संबल पाने वाले अरुण केजरीवाल की चिंता वाजिब है. वे कहते हैं कि कोचिंगों का केंद्र बनकर मोटी कमाई कराने वाले राजीव नगर में हॉस्टल सीवेज के निकास की कोई व्यवस्था नहीं है. जहां मनमर्जी कूड़ा छोड़ दिया, पूरी नालियां ब्लॉक हैं. यहां रहने वाले 20,000 छात्रों पर हर पल महामारी का खतरा मंडरा रहा है. लेकिन इस पर न हॉस्टल संचालकों का ध्यान है, न कोचिंग सेंटरों का और न ही न्यास या प्रशासन का. यह प्रदूषण कभी भी विकराल रूप ले सकता है.
नगर विकास न्यास के टाउन प्लानर संदीप दंडवते बताते हैं, ‘’न्यास ने 2003 में राजीव नगर को रिहाइशी क्षेत्र के रूप में विकसित किया था. यहां मात्र एक-दो हॉस्टल ही रजिस्टर्ड हैं. बाकी सारे अवैध तौर पर ही चलाए जा रहे हैं, जिन्हें नोटिस जारी किए जा चुके हैं. इन्हें व्यावसायिक करने पर सरकार को खासी आय हो सकती है.’’ न्यास अध्यक्ष रवींद्र त्यागी कहते हैं, ‘’छोटे हॉस्टलों को कॉमर्शियल करने के बारे में सरकार से गाइडलाइन मांगी है.’’ वे मानते हैं कि ये हॉस्टल पूरे शहर में घरेलू भवनों में ही चल रहे हैं. इस संबंध में कार्रवाई जारी है.
बहरहाल कोटा के कोचिंग कारोबार में आए उफान से रियल एस्टेट का कारोबार भी फल-फूल रहा है और व्यवसायियों समेत नेता भी मौके का फायदा उठाने में लगे हैं.

