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मोदी के दरवाजे पर कानून की दस्‍तक

अहमदाबाद की अदालत ने न सिर्फ मोदी सरकार की पूर्व मंत्री को दंगों का दोषी ठहराया, बल्कि पहली बार यह भी साबित हुआ कि आरएसएस और दंगों के बीच सीधा रिश्ता था.

नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी
अपडेटेड 5 सितंबर , 2012

बदनाम गुजरात दंगों का जिन्न एक बार फिर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर पर मंडराने लगा है. 29 अगस्त को अहमदाबाद की एक विशेष अदालत ने नरोदा पाटिया जनसंहार मामले में बीजेपी की विधायक और पूर्व महिला एवं बाल विकास मंत्री मायाबेन कोडनानी और बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी समेत कुल 32 लोगों को दोषी ठहराया है. कोडनानी को 28 साल जेल में बिताने होंगे जबकि बाबू बजरंगी जीवन पर्यंत जेल में रहेंगे.

इस हत्याकांड में 97 लोगों को मार दिया गया था और 33 लोग जख्मी हुए थे. गुजरात दंगों में दोषी ठहराई जाने वाली कोडनानी संघ परिवार का पहला प्रमुख चेहरा हैं. कोडनानी के दोषी साबित होने से पीड़ित पक्ष के वकील मुकुल सिन्हा की यह दलील सच साबित हुई कि "दंगों को भड़काने में संघ परिवार और सरकारी तत्वों की सीधी भूमिका थी." मामले में 30 अन्य लोगों को दोषी ठहराया गया है जबकि बाकी 29 को बरी कर दिया गया. यह जनसंहार 28 फरवरी, 2002 को हुआ था जब 15,000 से 20,000 हिंदू दंगाइयों की भीड़ ने पूर्वी अहमदाबाद के बाहरी इलाके में कर्नाटकी मुसलमानों की बस्ती पर हमला किया था. इससे ठीक एक दिन पहले गोधरा कांड में 59 हिंदू मारे गए थे.

न्यायाधीश ज्योत्सना याज्ञिक ने जब फैसला पढ़कर सुनाया, तो अदालत में मौजूद पेशे से डॉक्टर कोडनानी और उनके पति रो पड़े. यह फैसला विधानसभा चुनाव की दौड़ में मोदी के लिए रणनीतिक तौर पर दिक्कतें खड़ी कर सकता है. यह फैसला मोदी सरकार के लिए निश्चित ही आफत बन कर आया है.

यह फैसला उस वक्त आया है जब कांग्रेस गुजरात और बाहर यह प्रचार करने में लगी थी कि हिंदू दंगाइयों को मोदी की सरकार और संघ परिवार ने अपने राजनैतिक हितों के लिए उकसाया था. राज्य में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की इकाई का भी एक बड़ा धड़ा यह मानता है कि मोदी ने हिंदुओं के साथ छल किया है. संघ परिवार की भीतरी दरार का यह एक चेहरा भर है क्योंकि गुजरात के भीतर विहिप को मोदी विरोधी के रूप में देखा जाता है.

उम्मीद के मुताबिक कोडनानी के वकील और बीजेपी नेता यतिन ओझ ने फैसले पर सवाल उठाए हैं, "एक जूनियर वकील तक इस बात को जानता है कि उन्हें कुछ एक्टिविस्टों द्वारा गढ़े गए सबूतों के आधार पर दोषी ठहराया गया है. इस मामले में इससे असामान्य बात यह है कि दोषी ठहराए गए लोगों की 50 फीसदी से भी ज्यादा संख्या देश में भीड़ द्वारा की गई किसी भी हिंसा के मामले में दिए गए फैसले के मुकाबले सबसे ज्यादा है. गुजरात के मामले में इंसाफ दिलाने में जल्दबाजी हुई है, जबकि 1984 के सिख विरोधी दंगों और 1992-93 के मुंबई दंगों के पीड़ितों को अब तक इंसाफ का इंतजार है."

बहरहाल, मोदी के विरोधियों में उत्साह की लहर है, जिनका नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ कर रही हैं. उन्होंने इस फैसले को "सच को पटरी से उतारने की कोशिशों" के खिलाफ सच की जीत करार दिया है. इस्तीफे के सवाल पर राज्य सरकार ने कहा है कि इस्तीफा देने की कोई वजह नहीं दिखती.

स्वास्थ्य मंत्री जयनारायण व्यास ने कहा, "सरकार में होने के नाते हम आम तौर पर अदालती फैसलों पर प्रतिक्रिया नहीं देते, लेकिन तथ्य यह है कि जब दंगे हुए उस वक्त कोडनानी मंत्री नहीं थीं." व्यास ने कहा, "और यदि ऐसा ही होना है, तो भंवरी देवी मामले में राजस्थान के एक मंत्री की गिरफ्तारी के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी इस्तीफा दे देना चाहिए था."

नरोदा पाटिया जनसंहार के ज्यादातर पीड़ित इस बात से संतुष्ट थे कि आखिरकार इंसाफ मिला, लेकिन सलीम शेख जैसे लोगों की राय दूसरी थी. दंगों में अपने चार परिजनों को गंवा चुके शेख ने कहा, "सबूत के आधार पर छोड़े गए 29 और लोगों को भी दोषी बनाया जाना चाहिए था." अब तक गुजरात दंगों से जुड़े मुकदमों में पांच फैसले सुनाए जा चुके हैं. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआइटी) की टीम ने दंगों की फाइल को दोबारा खुलवाया था.

एक्टिविस्टों ने गुजरात पुलिस की जांच को घटिया बताकर एसआइटी का गठन करवाया था. लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं के आरोप तथ्यों की रोशनी में काफी दिलचस्प मोड़ ले रहे हैं. मसलन, चार मामलों में दोषी ठहराए गए अधिकतर लोगों को 2008 में शुरू हुई एसआइटी की जांच से पहले ही गुजरात पुलिस ने गिरफ्तार किया था. नरोदा पाटिया मामले में एसआइटी ने 32 दोषियों में से सिर्फ 11 को गिरफ्तार किया जबकि बाकी पहले से ही गिरफ्तार थे. सरदारपुरा मामले में एसआइटी द्वारा गिरफ्तार 21 में से सिर्फ  दो को दोषी करार दिया गया है. दूसरे शब्दों में कहें तो इस मामले में दोषी ठहराए गए 31 लोगों में एसआइटी ने सिर्फ दो को गिरफ्तार किया है.

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