scorecardresearch

यूपी में बढ़ रही है शिक्षा में हिंसा की राजनीति

छात्र हितों की रक्षा के लिए बहाल किए गए छात्रसंघ हिंसक वारदातों की चपेट में. जिससे विश्वविद्यालयों में शिक्षा के माहौल के बिगड़ने की आशंका.

अपडेटेड 5 सितंबर , 2012

लखनऊ के कान्यकुब्ज कॉलेज में 1 अगस्त को बगैर पहचान पत्र प्रवेश न दिए जाने से गुस्साए छात्र नेताओं ने कॉलेज में तोडफ़ोड़ की. 13 अगस्त को कानपुर के डीएवी कॉलेज में पूर्व छात्रनेता विपिन शुक्ल को गनर को साथ लेकर कॉलेज में घुसने से रोकने पर समर्थकों ने बवाल कर दिया. 15 अगस्त को छात्र राजनीति में वर्चस्व के चलते गोरखपुर में छात्र नेता सतपाल सिंह और 7 अगस्त को छात्र नेता प्रदीप सिंह की हत्या के बाद विवि समेत कई हिस्सों में हिंसक वारदातों का दौर चला.

प्रदेश के विवि व कॉलेजों से जुड़ी ये घटनाएं यही इशारा करती हैं कि छात्रसंघ बहाली की मंशा भले ही छात्रों के हितों से जुड़ी हो लेकिन इनका चरित्र अभी भी चुनावों को दबंगई और बाहुबल की दुनिया की ओर ले जाता है. जुलाई में नए सत्र के लिए विवि व कॉलेजों के खुलते ही परिसर छात्र नेताओं की चहलकदमी से गुलजार हो गए.

प्रवेश प्रक्रिया के साथ नए छात्रों को लपकने की होड़ ने छात्र नेताओं को आमने-सामने ला खड़ा किया. इसी वजह से कानपुर, लखनऊ, गोरखपुर, झांसी, आगरा में भी विवि व कॉलेजों की प्रवेश प्रक्रिया के दौरान छात्रनेताओं ने उत्पात मचाया. इससे तंग आकर लखनऊ और कानपुर में टीचर्स एसोसिएशन्य ने छात्रसंघ चुनाव का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है.

विवि व कॉलेजों में छात्रनेता महंगी एसयूवी में घूम-घूमकर प्रचार कर रहे हैं. लिंगदोह समिति ने भले ही छात्रसंघ चुनाव में प्रति उम्मीदवार खर्च सीमा 5,000 रु. निर्धारित कर रखी हो पर इसे ताक पर रख छात्र नेता छात्रों को हर तरीके से लुभाने में जुटे हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव लडऩे की तैयारी में जुटे अमिताभ सिंह बताते हैं, ‘’छात्रों को केवल प्रदर्शनों व छात्रहित की बातें कहकर नहीं लुभाया जा सकता. इसलिए पार्टियां व गिफ्ट्स जरूरी हैं.’’

छात्रसंघ चुनाव की घोषणा के बाद व्यापारियों की समस्याएं भी बढ़ गई हैं. चुनाव लडऩे के लिए चंदे के तौर पर व्यापारियों से धन वसूली के मामले भी सामने आने लगे हैं. बीएसपी के राज्यसभा सांसद और लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष बृजेश पाठक कहते हैं कि जब सपा सरकार के कार्यकाल में छात्रसंघ चुनाव होते हैं तो इनमें बड़ी संख्या में असामाजिक तत्व प्रवेश कर जाते हैं.

नए छात्रनेताओं के बीच दबंगई और वर्चस्व की भावना कैसे आ गई? डीएवी कॉलेज, कानपुर में भौतिक विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. मनोज मिश्र बताते हैं, ‘’छात्रसंघ चुनाव लडऩे वाले ज्यादातर नेता पुराने छात्रनेताओं की कठपुतली हैं. यही वजह है कि पुराने छात्रनेताओं के बीच वर्चस्व की होड़ नए नेताओं में भी दिख रही है.’’ लिंगदोह समिति के अनुसार वही छात्र चुनाव लड़ पाएंगे जिनकी उपस्थिति 75 फीसदी होगी. लेकिन प्रदेश के किसी भी विवि या कॉलेज में ऐसा कोई कारगर सिस्टम नहीं है जिससे छात्र-छात्राओं की उपस्थिति को आंका जा सके.

चुनाव के नजदीक आते ही छात्र नेताओं ने शहर को पोस्टरों, होर्डिंगों व वॉलराइटिंग से पाट दिया है. छात्रों के बढ़ते उत्पात पर लगाम लगाने के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हस्तक्षेप किया. उन्होंने 23 अगस्त को एक आदेश जारी कर विवि, कॉलेज व जिला प्रशासन को अवैध बैरन व होर्डिंग हटवाने तथा परिसर का माहौल खराब करने वाले नेताओं पर कार्रवाई करने को कहा.

बावजूद इसके लखनऊ विवि में अखिलेश के आदेश के 24 घंटे के भीतर छात्रनेताओं के बीच संघर्ष हुआ और एक दूसरे पर रिवॉल्वर तानी गई. हालांकि नगर निगम व प्रशासनिक अधिकारियों ने कुछ सख्ती दिखाते हुए शहर भर में टंगी होर्डिंग व पोस्टर हटवाने के साथ छात्र नेताओं पर जुर्माना भी ठोका है.

बहरहाल छात्रसंघ बहाली के बाद जो तस्वीर उभरी है उसमें ताकत व दबंगई दिखाने के लिए छात्र नेताओं की नई जमात एक-दूसरे पर आस्तीनें चढ़ाए शिक्षा के मंदिरों में पढ़ाई के माहौल को बनने से पहले ही बिगाडऩे पर आमादा हैं.

-साथ में कुमार हर्ष और सिराज कुरैशी

Advertisement
Advertisement