scorecardresearch

प्‍लेसमेंट फ्रॉड: कॉलेज से सीधे ठगों के जाल में

भ्रष्ट रिक्रूटर किस तरह से नौकरी की तलाश में जुटे युवाओं, कॉलेजों और कंपनियों को ठग रहे हैं? वे बढ़िया नौकरी की हसरत को भुना रहे हैं.

अपडेटेड 18 अगस्त , 2012

यह कहना मुश्किल है कि आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में इंजीनियरिंग कॉलेज ज्‍यादा हैं या आम के बगीचे. वहां आज भी विप्रो टेक्नोलॉजीज के एक हाइ-फ्लाइंग रिक्रूटर-रसेल पुरुषोत्तमन के बारे में एक कहानी गूंज रही है. शहर से आधे घंटे की दूरी पर नुन्ना गांव में जब कोई पुरुषोत्तमन का नाम लेता है तो प्लेसमेंट अधिकारी अपनी आवाज धीमी करके फुसफुसाहट के स्तर पर ले जाते हैं. गांव में कम-से-कम पांच इंजीनियरिंग कॉलेज हैं. कुछ साल पहले पुरुषोत्तमन यहां एक मसीहा जैसा था. अचानक गायब हो जाने के पहले तक वह किसी भी अन्य रिक्रूटर से अधिक छात्रों को भर्ती करता था और उन्हें ऊंचा वेतन दिलवाता था.
उसके एक पूर्व सहयोगी के अनुसार, वह बहुत 'शातिर' था. कथित तौर पर वह नौकरियां बेचा करता था, कॉलेज विजिट करने के 7.5 लाख रु. और प्रत्येक ऑफर लेटर के 50,000 रुपए उसका खेल तब खत्म हुआ, जब उसके एक सहयोगी ने अखबार में एक कॉलेज के विज्ञापन को देखा और उसने शिकायत कर दी. इस विज्ञापन में उन छात्रों की तस्वीरें थीं, जिन्हें विप्रो ने चुना था. इनमें से एक तस्वीर एक लड़की की थी, जिसे इस शिकायत करने वाले ने रिजेक्ट कर दिया था. जब और गड़े मुर्दे खोदे गए तो विप्रो के अधिकारियों ने पुरुषोत्तमन को बंगलुरू में तलब किया और उससे छह घंटे तक पूछताछ के बाद फटकार लगाकर बाहर निकाल दिया. इसके अलावा, कंपनी ने हैदराबाद के मधापुर पुलिस स्टेशन में धोखाधड़ी का मामला भी दायर कर दिया. यह मामला अदालत के विचाराधीन है.Placement fraud
पुलिस अधिकारी इस बात की पुष्टि करते हैं कि विप्रो ने पुरुषोत्तमन के खिलाफ मामला दर्ज कराया है. जब संवाददाताओं ने एक ईमेल में इस विषय का खुलासा किया, तो विप्रो की मीडिया रिलेशंस टीम की सदस्य सुभाषिनी पट्टाभिरमन ने इसका जवाब रिक्रूटमेंट धोखाधड़ी से बचने के लिए किए गए उपायों, जन जागरूकता लाने के लिए किए गए प्रयासों और एचआर में भ्रष्टाचार के दूसरे संभावित क्षेत्रों को रोकने की रणनीति के विवरणों से दिया. इस दस्तावेज के 603 शब्दों में रसेल या पुरुषोत्तमन का जिक्र नहीं था. संयोगवश, यह मामला 9 अगस्त को 11वें महानगरीय मजिस्ट्रेट की अदालत में पेशी के लिए आया और फिर इसे सुनवाई के लिए इस वर्ष 8 अक्तूबर की तारीख दी गई.

100 पर्सेंट प्लेसमेंट की भूख
आम तौर पर ठग रिक्रूटर्स और प्लेसमेंट सलाहकारों के जाल में वे कॉलेज फंसते हैं, जो मान्यता प्राप्त नहीं होते हैं, और ऐसे क्षेत्रों में स्थित होते हैं, जहां जाने माने रिक्रूटर्स की आवाजाही कम होती है. छात्रों को आकर्षित करने के लिए उन्हें रिक्रूटर्स की जरूरत होती है और छात्र सिर्फ तब आएंगे, जब रिक्रूटर्स आएंगे. ऐसे में आते हैं कुछ मददगार, बिचौलिए, भ्रष्ट कर्मचारी, कॉलेज के अधिकारी जो रिश्वत देने के लिए तैयार होते हैं. वे कॉलेजों को दुनिया के सामने '100 पर्सेंट प्लेसमेंट' और गारंटिड वेतन का ऐलान करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.Placement fraud
शोध रिपोर्टों के मुताबिक, प्रोफेशनल कॉलेजों के पास आउट्स में से चंद ही सीधे रोजगार के लायक होते हैं. परीक्षण और मूल्यांकन करने वाली कंपनी मैरिटट्रैक द्वारा कराए गए एक ताजा अध्ययन में कहा गया है कि टॉप 25 को छोड़ दें, तो 100 संस्थाओं से निकले 2,264 एमबीए में से रिक्रूटिंग कंपनियों को केवल 21 फीसदी ही रोजगार के लायक नजर आए. एक और एसेसमेंट कंपनी एस्पायरिंग माइंड्स के अनुसार, इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स के 17.5 फीसदी से भी कम को आइटी में रोजगार दिया जा सकता है.
ऐसे में ''100 पर्सेंट प्लेसमेंट '' के किसी भी दावे को संदेह की नजर से देखा जाना चाहिए. लेकिन आप यह बात ऐसे उत्सुक माता-पिता से कह कर तो देखिए, जो एमबीए या इंजीनियरिंग की डिग्री को अपने बच्चे के लिए बेपनाह धन-दौलत तक पहुंचने की सीढ़ी मानते हैं. ऐसे में बिचौलिए खुश हैं. उनके आने-जाने, ठहरने और अन्य आवश्यकताओं का भुगतान कॉलेज करते हैं. एक मामले में तो एक रिक्रूटर ने एक छोटे शहर के होटल में विदेशी शराब पर एक ही रात में 25,000 रु. उड़ा दिए. बदले में कॉलेज को अपनी डींग हांकने का अधिकार मिल जाता है. लेकिन छात्र इस खाई में गिर जाते हैं, जो इन दोनों के बीच में होती है. एचआर प्रोफेशनल्स का कहना है कि इस गर्त में गिरे छात्रों की संख्या हर साल हजारों में होती है. विजयवाड़ा के प्रसाद वी. पोटलुरी सिद्धार्थ इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रशिक्षण और प्लेसमेंट अधिकारी साई कृष्ण कोटा कहते हैं, ''मुझे माता-पिता के दबाव का सामना करना पड़ता है. वे पूछते हैं कि कुछ कंपनियां जब पड़ोसी कॉलेज का दौरा कर रही हैं, तो वे मेरे कॉलेज में क्यों नहीं आ रही हैं. वे कहते हैं, 'उन्हें पैसे दे दो, किसी भी कीमत पर कंपनी लेकर आओ.'' कॉलेज कहते हैं कि माता-पिता के दबाव में प्लेसमेंट में अनैतिक व्यवहार शुरू होता है.

प्लेसमेंट के बदले रिश्वत
हालांकि अपनी तरफ से कॉलेज भी माता-पिता की बात मानने के लिए तैयार रहते हैं और अगर रिश्वत देने से प्लेसमेंट मिलता हो, तो रिश्वत देने के लिए जरूरत से ज्‍यादा तैयार रहते हैं. आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इंजीनियरिंग कॉलेजों के 15 से भी अधिक प्लेसमेंट अधिकारियों ने बताया कि किसी अच्छे साल में उनके प्लेसमेंट 20 से 60 फीसदी के बीच हो जाते हैं. ग्रामीण कॉलेज, विशेष रूप से वे जो पिछले पांच-छह वर्षों में बने हैं, बड़े रिक्रूटर्स को अपने कैंपस में लाने के लिए जूझ्ते हैं. वे एचआर कर्मियों को रिश्वत देते हैं, बिचौलियों की मदद लेते हैं, और नतीजा फर्जी कंपनियों को निमंत्रित करने में निकलता है. भारत के एक सबसे गरीब जिले-ओडीसा के गजपति में कॉलेज चलाने वाले सेंचुरियन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ऐंड मैनेजमेंट के सह-संस्थापक मुक्ति मिश्र कहते हैं, ''विप्रो तक सीधे पहुंचने में सभी प्रयासों के बावजूद असफल होने के बाद, मुझे बिचौलियों का रास्ता पकड़ना पड़ा.''Placement fraud
पिछले वर्ष के अंत में लगाया गया बिचौलिया अब तक विप्रो को या उस स्तर की किसी अन्य कंपनी को सेंचुरियन तक लाने में विफल रहा है. पुरुषोत्तमन प्रकरण के बाद विप्रो ने एचआर प्रक्रिया सख्त बना दी है. वह रिक्रूटमेंट के लिए तभी आती है, जब कॉलेज मान्यता प्राप्त हो या शीर्ष स्तर की कंपनियों के पैनल में हो.
एक ग्रामीण कॉलेज और बंगलुरू स्थित एक बिचौलिए के बीच हुआ समझैता आंखें खोल देने वाला है. इन दोनों में से किसी का भी नाम नहीं लिया जा सकता है, क्योंकि बिचौलिए ने कॉलेज को परिणाम भुगतने की और आत्महत्या कर लेने की धमकी दी है. इस समझैते के तहत कहा गया है कि विप्रो और टीसीएस में मान्यता शुरू करवाने के लिए कॉलेज 10 लाख रु. एडवांस के तौर पर देगा. जब यह बात टीसीएस को बताई गई, तो कंपनी ने कहा कि उसने ''उसके जैसे किसी व्यक्ति के बारे में कभी नहीं सुना है.'' विप्रो का कहना है कि उसका इस बिचौलिए के साथ कोई संबंध नहीं है, जबकि इस बिचौलिए का दावा है कि वह पिछले एक दशक में कम-से-कम 30,000 ग्रेजुएट्स को नौकरी दिलवा चुका है.
कॉलेजों के लिए इस तरह के बिचौलियों के जाल को खारिज कर देना इतना आसान नहीं है. वास्तव में वे इसे पालने के लिए मजबूर हो रहे हैं. प्लेसमेंट अधिकारी कहते हैं कि पैसा या भेंट दिए बगैर कोई काम नहीं होता है. जब कंपनियों की एचआर टीमें दूरदराज के कैंपसों में जाती हैं, तो उनके टिकटों और ठहरने का भुगतान कॉलेज करते हैं. जब ऑफर लेटर्स मिलते हैं, तो वे मोबाइल फोन, टैबलेट्स और यहां तक कि सोना देकर एहसान चुकाते हैं. यह सब इस उम्मीद में किया जाता है कि वे अगले वर्ष फिर आएंगे और बड़ी संख्या में भर्तियां करेंगे.
पिछले साल सितंबर में एक मझेली आइटी कंपनी माइंडट्री ने तिरूपति में एक कॉलेज से भर्तियां कीं. इस साल मई में जब दो एचआर एक्जीक्यूटिव ने एम्प्लाई इंगेजमेंट यात्रा पर उसी कॉलेज का दौरा किया, तो दोनों को 75,000 रु. का एक सोने का ब्रेशलेट स्वीकार करने के लिए 'मजबूर' किया गया. मुख्यालय पहुंचकर उन्होंने इस भेंट का खुलासा कर दिया और ब्रेशलेट वापस भेज दिए गए. माइंडट्री के चेयरमैन सुब्रोतो बागची कहते हैं कि ''हम इस मामले की जांच बहुत गंभीरता से कर रहे हैं.'' जो हो रहा है वह एचआर एक्जीक्यूटिव्ज की 'मेहमाननवाजी' की मांग से कहीं आगे है. इसमें फर्जी चीजें भी शामिल हैं: नकली ऑफर लेटर्स और नकली कंपनियां.Placement fraud

रिक्रूट किया और कंपनी बंद
'100 पर्सेंट प्लेसमेंट' के लक्ष्य को पूरा करने का दबाव प्लेसमेंट अधिकारियों को सभी प्रकार की कंपनियों को आमंत्रित करने के लिए मजबूर कर रहा है. पिछले तीन वर्ष में ऐसी फर्जी कंपनियां पनप आई हैं, जो केवल एक वर्ष काम करती हैं. वे अगस्त-सितंबर में छात्रों की भर्ती  शुरू कर देती हैं, पैसे या तो कॉलेज से या सीधे छात्रों से वसूलती हैं, जिसे प्रशिक्षण का खर्च या रिफंडेबल सुरक्षा जमा कहा जाता है, और अगले वर्ष मई तक गायब हो जाती हैं. एचीवर्स बिजनेस कॉर्पोरेट (एबीसी) की वेबसाइट को गूगल पर खोजकर देखिए. कल तक यह कंपनी भर्तियां कर रही थी. अच्छे से अच्छा सर्च इंजन भी अब इसे नहीं खोज सकता. इंटरनेट के जिन कुछ स्थानों पर एबीसी का उल्लेख मिलता है, वहीं आपको यह आरोप लगाते हुई लोगों की नाराज टिप्पणियां भी मिल जाएंगी कि यह कंपनी 'नकली' थी और यह ऑफर देने के बाद गायब हो गई. कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने अपनी नौकरी की 'पुष्टि' करने के लिए दस्तावेजों के साथ 5,000 रु. भेजे थे, लेकिन बाद में पता चला कि कंपनी का ऑफिस बंद है, फोन कटे हुए हैं और ईमेल बाउंस हो रहे हैं. खुद को इंदौर स्थित बताने वाली एबीसी ने कर्नाटक के बेल्लारी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ऐंड मैनेजमेंट (बीआइटीएम) में कम-से-कम 20 छात्रों को नौकरी ऑफर की थी.
कुमार गोरासा और के. राम किशोर ने आइटी कंपनी होने का दावा करने वाली प्रोडिजी सॉल्यूशंस को क्रमशः 50,000 और 1 लाख रु. का भुगतान किया. दुनिया में ऐसी कई कंपनियां हैं, जो खुद को 'प्रोडिजी सॉल्यूशंस' कहती हैं, लेकिन इस मामले में प्रोडिजी सॉल्यूशंस हैदराबाद की साइबर टावर के छठीं और नौवीं मंजिलों पर स्थित थी. पुलिस के अनुसार, कंपनी ने बोरिया-बिस्तर और सीईओ समेत गायब होने के पहले की गई कोई 660 भर्तियों से 4.15 करोड़ रु. जुटा लिए.
बीवीसी इंजीनियरिंग कॉलेज, ओडालारेवु में प्लेसमेंट अधिकारी वी.एस. रामकृष्ण कहते हैं, ''खुद को मार्च एंड कंसल्टेंसी कहने वाली एक कंपनी ने पिछले साल आंध्र प्रदेश में 20 से 30 कॉलेजों से संपर्क किया और आइबीएम और इन्फोसिस की ओर से जारी किए गए ऑफर के लिए 8,000 से 15,000 रु. चार्ज किए. ऑफर लेटर नकली निकले. कंपनी ने पिछले साल फरवरी में मेरे कॉलेज से 140 छात्रों की भर्ती की और प्रत्येक से पंजीकरण शुल्क के तौर पर 500 रु. लिए. उन्होंने अपनी पहचान आइबीएम की ओर से रिक्रूटिंग वेंडर्स के तौर पर बताई. कंपनी अपने साथ तीन व्यक्तियों को लाई जो खुद को आइबीएम के अधिकारी बताते हुए पेश हुए. उनके पास आइबीएम के बिजनेस कार्ड और  और आइडेंटिटी कार्ड थे. कॉलेज को एक फर्जी आइबीएम डोमेन से एक ईमेल भी मिला.'' आइबीएम के एक प्रवक्ता ने कहा कि इस मामले की जांच चल रही है और कंपनी अधिकारियों की सहायता कर रही है.

दिग्गजों के नाम पर ठगी
पुणे स्थित परसिस्टेंट सिस्टम को पिछले वर्ष नवंबर में पता चला कि खुद को  हैदराबाद स्थित ऑरेंज सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी कहने वाली एक कंपनी उसकी ओर से भर्तियां कर रही है और उम्मीदवारों से पैसे भी वसूल रही है. परसिस्टेंट के चीफ पीपल ऑफिसर समीर बेंद्रे कहते हैं कि एक कानूनी नोटिस ने इस खेल को खत्म कर दिया. हर साल देश में किसी भी अन्य निजी कंपनी से अधिक भर्तियां करने वाली टीसीएस फर्जीवाड़ा करने वालों को हमेशा बहुत रास आती है और वह अखबारों में विज्ञापन देकर कॉलेजों और छात्रों को सावधान रहने के लिए कह चुकी है. आइबीएम और विप्रो समेत कई कंपनियों ने भी यही किया है.
जन जागरूकता अभियान हालांकि आवश्यक हैं, लेकिन ये पर्याप्त नहीं हो सकते. कई लोगों का सुझाव है कि तमाम उद्योगों के लिए एक एकल परीक्षा हो, जिससे किसी भी कॉलेज के किसी भी छात्र को बाहर न रखा जाए. कंपनियां छात्रों के स्कोर के आधार पर उनका चुनाव कर सकती हैं. अच्छी तरह से आयोजित कई कैंपसों का समागम, जिसमें एक स्थान पर एक कंपनी की परीक्षा देने के लिए कई कॉलेजों के छात्रों को इकट्ठा किया जाए. आइटी उद्योग की लॉबी नैस्कॉम के प्रमुख सोम मित्तल कहते हैं, ''हमें अपनी प्रक्रियाओं की समीक्षा करने की जरूरत है. मुझे यकीन है कि उद्योग जगत जरूरी कदम उठाएगा.''
विप्रो से सबक सीखे जा सकते हैं, जिसने अपनी एचआर प्रक्रिया को कड़ा कर दिया है. टैलेंट एक्यूजीशन के पूर्व उपाध्यक्ष प्रदीप बहिरवानी कहते हैं, ''मैंने और मेरी टीम ने विप्रो में टैलेंट क्वालिटी बनाया. विप्रो ने भर्ती की कुछ अभिनव प्रक्रियाओं के लिए पेटेंट प्राप्त किया है, जिन्हें उसने लागू किया है.'' प्रदीप उपन्यास लिखने के लिए कंपनी छोड़ चुके हैं. वे अगर तथ्य लिखें, तो एक असली क्राइम सस्पेंस थ्रिलर लिख सकते हैं.

Advertisement
Advertisement