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बिजली संकट: भारत बना चौपट राजाओं की अंधेर नगरी

पूर्व केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने अपने छह साल के कार्यकाल को बर्बाद किया. गैर-जिम्मेदार राज्‍यों ने बिजली संकट को और बढ़ाया.

अपडेटेड 5 अगस्त , 2012

यह सिर्फ यूपीए में ही हो सकता है. भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी विद्युत अंधेरगर्दी का नेतृत्व करने के कुछ ही घंटों बाद केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे को प्रमोशन देकर गृह मंत्रालय जैसा नितांत अहम विभाग दे दिया गया. इस गंभीर बिजली संकट से जुलाई के अंतिम दो दिनों में समूचे उत्तर और पूर्वी भारत में 16 घंटे तक घुप्प अंधेरा छाया रहा और इससे करीब 67 करोड़ लोग प्रभावित हुए.

शिंदे की तरक्की देश के लिए गंभीर चिंता की बात है. एक गृह मंत्री के रूप में उन्हें आधी-अधूरी खुफिया सूचनाओं के आधार पर ही भारत के खिलाफ रची जा रही जटिल आतंकी साजिशों का पूर्वानुमान कर उन्हें रोकना होगा.

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री के रूप में शिंदे देश के 5 में से 3 राष्ट्रीय पावर ग्रिड के पूरी तरह बैठ जाने का कोई पूर्वानुमान नहीं लगा पाए, न उसे रोक पाए, जबकि उन्हें इस तरह के संकट के बारे में साफ जानकारी थी. शिंदे के सामने चेतावनी की लालबत्ती लगातार जल रही थी. पर या तो पद पर रहते हुए वे सो रहे थे या उन्होंने बेहद गलत कदम उठाए.

करीब छह साल तक ऊर्जा मंत्री रहे शिंदे जानते थे कि देश हमेशा से ही बिजली संकट से जूझ्ता रहा है. मार्च, 2012 में पेश आर्थिक सर्वे में सरकार के अपने अनुमानों के मुताबिक ही बिजली की मांग और आपूर्ति में करीब 8 फीसदी का अंतर है जो कि पीक टाइम में बढ़कर 10 फीसदी तक हो जाता है.

शिंदे यह भी जानते थे कि मानसून की बारिश कम होने पर बिजली की मांग तेजी से बढ़ जाती है. जून-जुलाई में मानसून की बारिश काफी कम हुई है, यह जानकारी मंत्री को होनी ही चाहिए. उन्हें यह भी पता होगा कि आम तौर पर जब मानसून विफल रहता है तो पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश केंद्रीय पूल से ज्‍यादा बिजली खींचते हैं क्योंकि वहां के किसानों को सिंचाई के लिए पंप सेट चलाने होते हैं.Power Crisis

केंद्र सरकार इन्हीं राज्‍यों पर बिजली संकट का ठीकरा फोड़ रही है. केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (सीईआरसी) के जुलाई के आंकड़ों से पता चलता है कि राजस्थान के साथ ही ये तीनों राज्‍य जुलाई मध्य यानी ग्रिड के बैठ जाने से कम-से-कम दो हफ्ते पहले से ही निर्धारित कोटे से ज्‍यादा बिजली खींच रहे हैं.

गलती करने वाले राज्‍यों को रास्ते पर लाने के लिए काफी समय था. लेकिन शिंदे के ऊर्जा मंत्रालय ने 12 जुलाई को एक चेतावनी-पत्र जारी करने के अलावा कुछ खास नहीं किया. मंत्रालय से इस्तीफा देने के बाद जब शिंदे से इस बारे में सफाई मांगी गई तो इसमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं दिखी.

वे बोले, ''मैंने पीएमओ को जानकारी दे दी है. अमेरिका में तो बिजली चार दिन तक कटी रही थी, यहां हमने तो कुछ ही घंटों में बहाल कर दिया. ग्रिड में जिस तरह से काम किया गया, लोगों को उसकी तारीफ करनी चाहिए.'' शिंदे के इंजीनियर शायद बिजली आपूर्ति बहाल रखने में सक्षम होंगे लेकिन शिंदे ने ही इस तरह की घटना को होने दिया.

शिंदे की बनाई जांच समिति संकट की वजहों का पता लगाएगी, जिसकी वजह से 2001 के बाद पहली बार इतना बड़ा संकट आया. ऊर्जा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि दिल्ली से आगरा और आगरा से ग्वालियर के बीच ही कहीं ट्रांसमिशन लाइन में ओवरलोडिंग हुई थी. इससे शक की सुई पूरी तरह से यूपी पर जाती है, हालांकि जब ग्रिड फेल हुआ तब पंजाब, हरियाणा और राजस्थान भी कोटे से ज्‍यादा बिजली ले रहे थे.

उत्तर प्रदेश के बिजली महकमे के अफसर जानते थे कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा क्योंकि इस तरह की अनुशासनहीनता के लिए शिंदे के मंत्रालय ने कभी भी सख्ती से कोई दंड नहीं लगाया था. बदकिस्मती से वित्तीय दंड लगाए जाने पर भी कोई राज्‍य उससे डरने वाला नहीं क्योंकि मौजूदा नियमों के मुताबिक राज्‍यों को कोटे से ज्‍यादा बिजली खींचने के लिए प्रति किलोवाट-घंटा 1.65 रु. का जुर्माना देना होगा. जबकि खुले एक्सचेंजों पर बिजली करीब 9 रु. प्रति यूनिट बिकती है. यानी राज्‍यों को ग्रिड का अनुशासन तोड़ जुर्माना भरने में भी नुकसान नहीं होता.Power crisis

सीईआरसी ने मार्च, 2012 में ही सुझया था कि ग्रिड में अनुशासनहीनता के लिए वित्तीय दंड को बढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन ऊर्जा मंत्रालय अभी तक इन सुझावों पर निर्णय नहीं ले पाया है. समझ्दारी भरा समाधान तो यही होगा कि जुर्माना बढ़ा दिया जाए और ऐसी व्यवस्था अपनाई जाए जिसमें केंद्रीय पूल से बिजली खरीदने वाले राज्‍यों से पैसा एडवांस लिया जाए. एक और मजबूत समाधान है जिसे शिंदे लागू कर सकते थे-वे यह आदेश दे सकते थे कि जिन राज्‍यों ने गलती की आदत बना ली है, उनका पत्ता केंद्रीय ग्रिड से काट दिया जाए.

लेकिन राजनैतिक कमजोरी ऐसा कभी नहीं होने देगी. ऊर्जा मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, ''क्या आप सच में ऐसी कल्पना कर सकते हैं कि शिंदे मुलायम सिंह के उत्तर प्रदेश की बिजली काट दें?'' कांग्रेस अपने सहयोगी दलों के सामने तो अकसर कायर बन जाती है. खासकर इस समय, जब वह अपनी सत्ता बचाने के लिए मुलायम सिंह पर निर्भर है.

बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच की बढ़ती खाई को पाटने के लिए शिंदे को 6 साल का कार्यकाल मिला, पर इस मामले में उनकी उपलब्धि बेहद खराब है. उनके कार्यकाल के दौरान बिजली उत्पादन क्षमता कहने को तो 50 फीसदी बढ़ गई लेकिन वास्तविक उत्पादन सिर्फ 17 फीसदी बढ़ा. सबसे बड़ी समस्या देश के थर्मल पावर स्टेशनों को कोयले की समुचित उपलब्धता न हो पाना है. देश के कुल बिजली उत्पादन का करीब 65 फीसदी हिस्सा कोयले पर निर्भर है. जब मानसून की बारिश कम होती है तो कोयले पर यह निर्भरता और बढ़ जाती है.

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में स्थित अनपरा थर्मल पावर प्रोजेक्ट का ही उदाहरण लें. इस प्रोजेक्ट में स्थित दो संयंत्रों की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 1,630 मेगावाट है. जून और जुलाई में अनपरा से रोज औसतन 1,300 मेगावाट बिजली का उत्पादन हुआ जो उसकी कुल क्षमता से करीब 20 फीसदी कम है. इस प्लांट से जुड़े उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया ''अनपरा को रोज 25,000 टन कोयले की जरूरत है पर इन गर्मियों में उसे रोज 20,000 से 21,000 टन कोयला मिला.''

भारत में फिलहाल 8.5 करोड़ टन कोयले की कमी है. कोल इंडिया लिमिटेड का लगातार यह तर्क रहा है कि जंगलों के बड़े इलाकों को कोयला खनन के लिए नो-गो एरिया निर्धारित करने के पर्यावरण मंत्रालय के निर्णय से वह उत्पादन बढ़ाने में नाकाम हो रही है. पर्यावरण मंत्री के तौर पर जयराम रमेश इन्फ्रास्ट्रक्चर और उद्योगों के हित में किसी तरह की रियायत देने से इनकार करते रहे.

लेकिन यूपीए के अपने स्टाइल के मुताबिक ही प्रधानमंत्री ने उन्हें पदोन्नति देकर जुलाई 2011 में ग्रामीण विकास का कैबिनेट मंत्री बना दिया ताकि उन्हें सहजता से पर्यावरण मंत्रालय से बाहर किया जा सके. तब तक रमेश ने एक तरह से नई कोयला खदानों पर ताला ही लगवा दिया, जिसे उनके बाद पर्यावरण मंत्री बनने वाली जयंती नटराजन भी नहीं पलट पाई हैं.

कोल इंडिया और उसके बॉस कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल भी कम दोषी नहीं हैं. कुछ जानकारों का कहना है कि कोल इंडिया उन इलाकों में तो खनन कर सकती है जो 'नो-गो' के अंतर्गत नहीं आते हैं, लेकिन नकदी से लबालब एकाधिकार वाली इस कंपनी को ऐसा करने की जरूरत बहुत कम लगती है. जायसवाल ने कोल इंडिया के प्रबंधन की चूलें कसने के लिए कुछ खास नहीं किया और ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे इसको कुछ प्रतिस्पर्धा मिले. आयातित कोयला काफी महंगा होता है.

ऊर्जा मंत्री के रूप में शिंदे अपने सहयोगियों को इस बात के लिए मनाने में नाकाम रहे कि कोयला आपूर्ति बढ़ाने की तत्काल जरूरत है. शिंदे, जायसवाल और नटराजन की उपस्थिति वाली एक अंतर-मंत्रालयी बैठक में मौजूद रहे एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार शिंदे का कोई असर नहीं था. अधिकारी ने बताया, ''वे पूरी तरह चुप बैठे रहे, जबकि दूसरे मंत्री अपनी बात रख रहे थे.''

बिजली संकट की मुख्य खलनायक केंद्र सरकार ही है, लेकिन राज्‍यों ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई. दिवालिया हो चुके राज्‍य बिजली बोर्ड बिजली संकट के केंद्र में हैं. सभी राज्‍य बिजली बोर्डों का कुल घाटा करीब एक लाख करोड़ रु. तक पहुंच चुका है जो कि देश के जीडीपी के एक फीसदी के बराबर है. इनके दिवालिया होने की वजह सबको अच्छी तरह मालूम है. पहली बात तो यह है कि राज्‍य बिजली बोर्डों से होने वाली आपूर्ति का औसतन 30 फीसदी तो नष्ट हो जाता है.

यह बिजली या तो चोरी हो जाती है या खराब इन्फ्रास्ट्रख्चर की वजह से लीक होकर बर्बाद हो जाती है. जिन बिजली बोर्डों का निजीकरण हो चुका है, उनमें इस तरह से होने वाले नुकसान को कम किया जा सका है. मसलन कोलकाता के सीईएससी ने इस तरह के नुकसान को घटाकर 10 फीसदी के नीचे कर लिया है. मुफ्त और सब्सिडी वाली बिजली देने की राजनीति बोझ को और बढ़ाती है.

उत्तर प्रदेश में बिजली आपूर्ति की लागत 6 रु. प्रति यूनिट पड़ती है, लेकिन इसके लिए उपभोक्ताओं से 3.5 रु. प्रति यूनिट ही लिये जाते है. मायावती के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने 5 साल के कार्यकाल में बिजली की दरें दो बार बढ़ाई थीं. लेकिन लोकलुभावन रास्ते पर चलने वाले अखिलेश ने अब बिजली कीमतों में किसी तरह की बढ़त से इनकार किया है. हमेशा बिजली संकट का सामना करने वाले एक और राज्‍य तमिलनाडु में 2011 में जयललिता के सत्ता में आने से पहले नौ साल तक बिजली दरों में कोई बढ़त नहीं की गई थी.

बिजली दरों में संशोधन न कर पाने की विफलता स्वतंत्र बिजली नियामकों की असहायता को भी दर्शाती है. एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ''उनसे सरकार से स्वतंत्र कार्य करने की उम्मीद की जाती है, लेकिन ज्‍यादातर मामलों में वे ऐसा नहीं करते.'' अकेले राजस्थान के राज्‍य बिजली बोर्ड को 46,000 करोड़ रु. का घाटा हो चुका है. भारी घाटे का मतलब है कि राज्‍य के पास अब बिजली के नेटवर्क विस्तार पर खर्च के लिए कोई पैसा नहीं है और वह बस किसी तरह से बिजली उत्पादन को बरकरार रख पा रहा है.

बिहार राज्‍य बिजली बोर्ड को 2011 में 1,600 करोड़ रु. का घाटा हुआ जो 2007 में हुए घाटे का दोगुना है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात साल के कार्यकाल में बिहार सरकार ने बिजली उत्पादन के क्षेत्र में कुछ नहीं किया है. वह बिजली उत्पादन में एक मेगावाट की भी बढ़त नहीं कर पाई है.

बिजली बोर्डों की वित्तीय हालत ऐसी नहीं है कि वे किसी निजी उत्पादकों से बिजली खरीद सकें. नए बिजली उत्पादन यूनिट तैयार करने के लिए राज्‍य सरकारों के पास पैसा नहीं है. निजी बिजली उत्पादकों को भी इन राज्‍यों में बिजली यूनिट लगाने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिल रहा. इसलिए राज्‍यों के बिजली बोर्ड के पास अपने केंद्रीय आवंटन से ज्‍यादा बिजली खींचने का रास्ता ही बचता है. यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसे ज्‍यादातर राज्‍य नहीं तोड़ पा रहे. शिंदे को बिजली क्षेत्र की सभी समस्याओं को दूर करने के लिए 6 साल मिले. लेकिन वे पद छोड़ने पर खुद ही बेहतरीन प्रदर्शन के लिए पीठ थपथपाते दिखे, जबकि जनता यूपीए-1 और यूपीए-2 में उनके कार्यकाल में उनके नेतृत्व से तबाह रही है.

-साथ में अमिताभ श्रीवास्तव, आशीष मिश्र, रोहित परिहार और देवेश कुमार

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