छत्तीसगढ़ के बस्तर में 2008 के पिछले विधानसभा चुनाव के दिन 14 नवंबर को नक्सलियों और सुरक्षाबलों के बीच 24 जगहों पर मुठभेड़. चुनाव के दौरान 150 से अधिक माओवादी हमलों में सुरक्षाकर्मियों समेत 42 लोगों की मौत. 32 मतदान केंद्रों पर ईवीएम की लूट और दर्जन भर केंद्रों पर सिर्फ 5 से 10 वोट पडऩा.
सिर्फ बस्तर के ये कुछ ऐसे आंकड़े हैं जो प्रदेश के चुनाव पर माओवादी खौफ को बयान करने के लिए काफी हैं. रही-सही कसर इस साल मई में हुए जीरम घाटी नक्सली हमले ने पूरी कर दी जिसमें कांग्रेस के कई दिग्गज नेता मारे गए. हाल ही में पखवाड़े भर में 50 से ज्यादा बारूदी सुरंगें बरामद की गई हैं.
लेकिन ऐसी तमाम चिंताओं का खौफ प्रदेश में चुनाव के उत्साह को कम नहीं कर पाया है. कम-से-कम नारायणपुर के कुकड़ाझोर गांव में तो बिल्कुल नहीं. नारायणपुर की सीमा महाराष्ट्र के माओवादी प्रभावित गढ़चिरौली जिले से भी मिलती है. नक्सलियों के प्रभाव वाले कुख्यात अबूझमाड़ जंगल के घेरे में बसे होने के बावजूद यहां के बाशिंदों में उत्साह है.
पिछले विधानसभा चुनाव में यहां 61 फीसदी वोट पड़े थे, जिसकी प्रदेश में उम्मीद नहीं की जाती. कंक्रीट की सड़क, व्यवस्थित मकान, सोलर स्ट्रीट लाइट, ज्यादातर लोगों के पास मोटरसाइकिल और साइकिल की मौजूदगी बताती है कि गांव में संसाधनों की कमी नहीं है. यहां के बाशिंदे वोट देना चाहते हैं ताकि उनके गांव में विकास की और बयार बहे.
गांव में 600 लोग रहते हैं जो यहां स्थित छत्तीसगढ़ आर्म्ड फोर्सेज के कैंप की वजह से खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. गांव के बाहर निकलते ही अबूझमाड़ जंगल उनके लिए अबूझ जंगल हो जाता है, जिस ओर सुरक्षाबल कभी-कभी ही दिखाई पड़ते हैं.
अमूमन ग्रामीण इलाकों में सुरक्षाबलों के प्रति नकारात्मक रवैया होता है लेकिन यहां के बाशिंदे और सुरक्षाबल घुल-मिल गए हैं. एक ग्रामीण युवा ओमप्रकाश मंकर इसकी तस्दीक करते हैं, ''यहां सुरक्षाबलों के और कैंप होने चाहिए ताकि हम और सुरक्षित महसूस करें.

कुछ समय पहले नक्सलियों ने यहां गोलीबारी की थी, हम ये सब पूरी तरह से रोकना चाहते हैं.” उनके पड़ोसी ज्ञानराम कहते हैं, ''कम-से-कम एक कैंप और होना चाहिए.” छह साल से ज्यादा समय से मौजूद कैंप पर कई बार हमले हो चुके हैं.
लेकिन यहां के लोग इन चीजों के आगे देख रहे हैं.
यहां 50 साल से ज्यादा समय बिता चुके रामदयाल की मांग है, ''हमें काफी सुविधाएं मिली हैं लेकिन सड़क अब खराब हो गई है. सड़क बननी चाहिए.” पड़ोसी गांव बोरन के केजुराम कुमारिया कहते हैं, ''हमें जानवरों का अस्पताल, ज्यादा तालाब और सिंचाई की सुविधाएं चाहिए.” कुछ लोग कहते हैं कि इंदिरा आवास योजना के तहत और घर बनाए जाने चाहिए.
दूसरी ओर बिहार में नरेंद्र मोदी की रैली में हुए बम विस्फोटों ने नेताओं समेत सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है. मोदी बस्तर में भी चुनाव प्रचार कर रहे हैं. खौफ का साया सिर्फ उन पर ही नहीं है बल्कि कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी पर भी मंडरा रहा है. वे भी यहां चुनाव प्रचार में शामिल हो रही हैं.
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी कहते हैं,''हमें सूचनाएं मिली हैं कि नक्सली नेताओं की रैलियों को टारगेट कर सकते हैं. हमने राज्य सरकार को जरूरी कदम उठाने को कहा है.”
नक्सलियों ने चुनाव बहिष्कार करने की अपील की है. हालांकि गृह मंत्रालय राज्य सरकार की तैयारियों से संतुष्ट है. प्रदेश में अर्द्धसैनिक बल के 70,000 से ज्यादा जवान तैनात किए गए हैं, जो यहां पहले से तैनात रहने वाले सुरक्षाबलों का तीन गुना हैं.
साथ में जुगल आर. पुरोहित और वीरेंद्र मिश्र
सिर्फ बस्तर के ये कुछ ऐसे आंकड़े हैं जो प्रदेश के चुनाव पर माओवादी खौफ को बयान करने के लिए काफी हैं. रही-सही कसर इस साल मई में हुए जीरम घाटी नक्सली हमले ने पूरी कर दी जिसमें कांग्रेस के कई दिग्गज नेता मारे गए. हाल ही में पखवाड़े भर में 50 से ज्यादा बारूदी सुरंगें बरामद की गई हैं.
लेकिन ऐसी तमाम चिंताओं का खौफ प्रदेश में चुनाव के उत्साह को कम नहीं कर पाया है. कम-से-कम नारायणपुर के कुकड़ाझोर गांव में तो बिल्कुल नहीं. नारायणपुर की सीमा महाराष्ट्र के माओवादी प्रभावित गढ़चिरौली जिले से भी मिलती है. नक्सलियों के प्रभाव वाले कुख्यात अबूझमाड़ जंगल के घेरे में बसे होने के बावजूद यहां के बाशिंदों में उत्साह है.
पिछले विधानसभा चुनाव में यहां 61 फीसदी वोट पड़े थे, जिसकी प्रदेश में उम्मीद नहीं की जाती. कंक्रीट की सड़क, व्यवस्थित मकान, सोलर स्ट्रीट लाइट, ज्यादातर लोगों के पास मोटरसाइकिल और साइकिल की मौजूदगी बताती है कि गांव में संसाधनों की कमी नहीं है. यहां के बाशिंदे वोट देना चाहते हैं ताकि उनके गांव में विकास की और बयार बहे.
गांव में 600 लोग रहते हैं जो यहां स्थित छत्तीसगढ़ आर्म्ड फोर्सेज के कैंप की वजह से खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. गांव के बाहर निकलते ही अबूझमाड़ जंगल उनके लिए अबूझ जंगल हो जाता है, जिस ओर सुरक्षाबल कभी-कभी ही दिखाई पड़ते हैं.
अमूमन ग्रामीण इलाकों में सुरक्षाबलों के प्रति नकारात्मक रवैया होता है लेकिन यहां के बाशिंदे और सुरक्षाबल घुल-मिल गए हैं. एक ग्रामीण युवा ओमप्रकाश मंकर इसकी तस्दीक करते हैं, ''यहां सुरक्षाबलों के और कैंप होने चाहिए ताकि हम और सुरक्षित महसूस करें.

कुछ समय पहले नक्सलियों ने यहां गोलीबारी की थी, हम ये सब पूरी तरह से रोकना चाहते हैं.” उनके पड़ोसी ज्ञानराम कहते हैं, ''कम-से-कम एक कैंप और होना चाहिए.” छह साल से ज्यादा समय से मौजूद कैंप पर कई बार हमले हो चुके हैं.
लेकिन यहां के लोग इन चीजों के आगे देख रहे हैं.
यहां 50 साल से ज्यादा समय बिता चुके रामदयाल की मांग है, ''हमें काफी सुविधाएं मिली हैं लेकिन सड़क अब खराब हो गई है. सड़क बननी चाहिए.” पड़ोसी गांव बोरन के केजुराम कुमारिया कहते हैं, ''हमें जानवरों का अस्पताल, ज्यादा तालाब और सिंचाई की सुविधाएं चाहिए.” कुछ लोग कहते हैं कि इंदिरा आवास योजना के तहत और घर बनाए जाने चाहिए.
दूसरी ओर बिहार में नरेंद्र मोदी की रैली में हुए बम विस्फोटों ने नेताओं समेत सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है. मोदी बस्तर में भी चुनाव प्रचार कर रहे हैं. खौफ का साया सिर्फ उन पर ही नहीं है बल्कि कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी पर भी मंडरा रहा है. वे भी यहां चुनाव प्रचार में शामिल हो रही हैं.
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी कहते हैं,''हमें सूचनाएं मिली हैं कि नक्सली नेताओं की रैलियों को टारगेट कर सकते हैं. हमने राज्य सरकार को जरूरी कदम उठाने को कहा है.”
नक्सलियों ने चुनाव बहिष्कार करने की अपील की है. हालांकि गृह मंत्रालय राज्य सरकार की तैयारियों से संतुष्ट है. प्रदेश में अर्द्धसैनिक बल के 70,000 से ज्यादा जवान तैनात किए गए हैं, जो यहां पहले से तैनात रहने वाले सुरक्षाबलों का तीन गुना हैं.
साथ में जुगल आर. पुरोहित और वीरेंद्र मिश्र

