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"नियमों को तोड़ने से पहले उसकी तकनीक में माहिर होना पड़ता है"

अपनी नई पुस्तक "द आर्ट ऑफ बीइंग फैबुलस" में शालिनी पासी ग्लैमर से आगे निकल अनुशासन और सार्थक उद्देश्य से जुड़े जीवन के फलसफे पर.

Q+A
शालिनी पासी
अपडेटेड 27 अप्रैल , 2026

सवाल+जवाब

शालिनी पासीआर्ट ऑफ बीइंग फैबुलस में आप खूबसूरती को बाहर के सतही ग्लैमर की बजाए एक अनुशासन के रूप में परिभाषित करती हैं. आपको कब इसका एहसास हुआ?

बीस की उम्र में शादी के बाद मैंने दिल्ली के उस सामाजिक दायरे में कदम रखा जहां दिखावा ही पहचान थी. वहां खुद को बचाए रखने के लिए मुझे पर्सोना तैयार करना पड़ा लेकिन अंदर से मैं जो थी, वही रही. फिर मुझे एहसास हुआ कि पहचान भीतर से शुरू होती है. कला में भी नियमों को तोड़ने से पहले उसकी तकनीक में माहिर होना पड़ता है. मैंने बाहरी प्रदर्शन में महारत हासिल की और अब उसी को ध्वस्त कर रही हूं.

यह किताब सीमाओं की बात करती है और विशेषाधिकारों के सायास प्रयोग की भी. क्या ऐसे परिवेश में यह सब कठिन था जहां हर चीज की अति को ही सफलता की निशानी माना जाता है.

विशेषाधिकार का मतलब दरअसल जवाबदेही है. मैं लोगों को कला सहेजने और कुछ सार्थक ढंग से देने के लिए प्रोत्साहित करती हूं. जब मैं देशभर की महिलाओं से बात करती हूं तो वे कहती हैं कि मैं उन्हें प्रेरित करती हूं. सच तो यह है कि मुझे उनसे ऊर्जा मिलती है. सायास कुछ करने से आप थकते-चुकते नहीं बल्कि मजबूत होते हैं.

एक समय था जब आपको कैमरे से डर लगता था. कैसे बदला नजरिया?

2018 से पहले मैं तस्वीरें खिंचवाने और पब्लिक स्पीकिंग से बचती थी. कैमरे देखते ही जैसे नसें जम जातीं. मेरे लिए आगे बढ़ने का मतलब ही है डर का सीधे से सामना करना. सो मैं फिर अपने से कैमरे के सामने आई. यह चुनौतीपूर्ण था पर रोमांचक भी.

कला की दुनिया में आप विजिबिलिटी बनाम वैल्यू को कैसे देखती हैं?
इकोसिस्टम बना रहे, इसके लिए कलाकारों का बने रहना जरूरी है. भारतीय कला में हम निवेश करते हैं और उभरती प्रतिभाओं को सहारा देते हैं. विजिबिलिटी की अपनी अहमियत है लेकिन वैल्यू तो लंबे समय तकप्रतिबद्धता से आती है.

—निखिल सरदाना

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