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"मेरा मानना है जो जब मिलना होता है, तभी मिलता है"

मशहूर अभिनेता राकेश बेदी ने कॉमेडी से धुरंधर की गंभीर दुनिया तक के अपने सफर के बारे में इंडिया टुडे से बातचीत की है

Q+A
राकेश बेदी
अपडेटेड 22 अप्रैल , 2026

सवाल+जवाब

आप कॉमेडी के लिए ख्यात हैं जबकि धुरंधर में जमील जमाली का किरदार बिल्कुल अलग है. यह रोल आपको कैसे मिला और इसकी तैयारी कैसे की?

यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी. मैंने आदित्य धर के साथ उरी  में काम किया था. उन्हें पसंद आया. वहीं से बात आगे बढ़ी. जहां तक तैयारी का सवाल है, मेरा तरीका बहुत आंतरिक है. मैं बाहर से बहुत तैयारी करता नहीं दिखता पर शूटिंग से पहले पूरा दृश्य मेरे दिमाग में चलता रहता है.

आपको लगता है कि 'कॉमिक अभिनेता’ की छवि ने आपके भीतर के गंभीर अभिनेता को कहीं ढंक दिया था?

बिल्कुल नहीं. मैंने कभी प्रयोग करने नहीं छोड़े. मैं लगातार थिएटर कर रहा हूं. अगाथा क्रिस्टी का प्रसिद्ध नाटक थ्री ब्लाइंड माइस 1955 से लंदन में लगातार खेला जा रहा है. हमने उसका हिंदी रूपांतरण अंधे चूहे नाम से किया, जिसमें मैंने हत्यारे की मुख्य भूमिका निभाई और उसके लगभग 150 शो कर चुका हूं.

चश्मे बद्दूर जैसी फिल्मों के दौर में चरित्र अभिनेताओं का एक अलग महत्व था. क्या आज उन्हें वैसा ही सम्मान और महत्व मिल रहा है?

चश्मे बद्दूर  एक आइकॉनिक फिल्म थी, जो आज भी युवाओं के बीच प्रासंगिक है. हालांकि उस समय न तो मुझे और न ही फिल्म को कोई बड़ा अवॉर्ड मिला. आज समय बदल गया है. अब अच्छे किरदारों को तुरंत पहचाना और सराहा जाता है.


आज जो चारों ओर आपको पहचान मिल रही है, आपको नहीं लगता कि यह बहुत पहले मिल जानी चाहिए थी?

अक्सर लोग अनदेखा किए जाने पर कुंठित हो जाते हैं. मेरा मानना है जो जब मिलना होता है, तभी मिलता है. अगर उस समय लोगों ने नहीं पहचाना तो वह उनकी कमी थी, मेरी नहीं. आज जब सबको काम दिख रहा और भरपूर प्यार मिल रहा है तो अफसोस की कोई जगह नहीं.

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