ग्रेट निकोबार द्वीप के नाजुक और अछूते इकोसिस्टम की भारी बर्बादी के अंदेशे के बावजूद ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को बढ़ाने की रणनीतिक और आर्थिक वजह क्या है?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कुल क्षेत्रफल के लगभग 1.8 फीसद हिस्से में एक एकीकृत विकास योजना है. इसका मकसद ग्रेट निकोबार द्वीप को हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री और हवाई कनेक्टिविटी का बड़ा केंद्र बनाना है. यह प्रोजेक्ट रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है. इससे अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की मौजूदगी मजबूत होगी. साथ ही एक बड़े ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल के साथ आर्थिक हब तैयार होगा. इससे भारत की वैश्विक व्यापार में स्थिति मजबूत करने के बड़े मौके बनेंगे.
खासकर ग्रेट निकोबार में एक प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट विकसित करने से, जिसे बंगाल की खाड़ी के दूसरे बंदरगाहों के मुकाबले बेहतर भौगोलिक स्थिति का फायदा है. हवाई अड्डे को सैन्य-असैन्य उपयोग के लिए योजना में शामिल किया गया है और इसका संचालन भारतीय नौसेना के नियंत्रण में होगा, जिसका मतलब है कि यह भी रक्षा तैयारी का ही हिस्सा होगा. लिहाजा, भारत समुद्री मार्गों की बेहतर निगरानी कर सकेगा और हिंद महासागर में विदेशी शक्तियों की बढ़ती मौजूदगी का बेहतर जवाब दे पाएगा.
● हाल के राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के फैसले को देखते हुए कौन-सी जरूरी शर्तें और सुरक्षा उपाय किए गए हैं?
न्यायाधिकरण ने माना कि पर्यावरण मंजूरी में कई खास शर्तें जोड़ी गई हैं. इनमें लेदरबैक समुद्री कछुआ, निकोबार मेगापोड, खारे पानी के मगरमच्छ, निकोबार मकाक, रॉबर क्रैब और अन्य स्थानीय पक्षी प्रजातियों की सुरक्षा शामिल है. साथ ही आक्रामक प्रजातियों का स्थानीय वनस्पति पर असर, ज्वारीय क्षेत्र की वनस्पति और जीव-जंतुओं की सुरक्षा, मैंग्रोव पुनर्स्थापन, कोरल ट्रांसलोकेशन और शोंपेन तथा निकोबारी समुदाय के कल्याण से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं.
न्यायाधिकरण ने संबंधित एजेंसियों को इन शर्तों का सख्ती से पालन तय करने का निर्देश दिया है. पर्यावरण मंजूरी में यह भी अनिवार्य किया गया है कि कैंपबेल बे और कमोर्टा में दो ऑल-वेदर रिसर्च स्टेशन बनाए जाएं. उनका उपयोग विशेष रूप से वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जैसी संस्थाएं करेंगी. इन स्टेशनों का रखरखाव पूरे प्रोजेक्ट की अवधि तक प्रोजेक्ट प्रपोनेंट करेगा.
● प्रोजेक्ट प्रपोनेंट को और क्या-क्या करना होगा?
प्रोजेक्ट प्रपोनेंट को अंडमान और निकोबार वन विभाग को अलग से फंड देना होगा, ताकि संरक्षण और शामक कार्यों की निगरानी, बुनियादी ढांचे और संचालन लागत का खर्च पूरा हो सके. यह फंड लेदरबैक समुद्री कछुआ, निकोबार मेगापोड, खारे पानी के मगरमच्छ और अन्य स्थानीय वनस्पति तथा जीव-जंतुओं के संरक्षण योजनाओं को लागू करने के लिए होगा.
यह राशि वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, सालिम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी ऐंड नेचुरल हिस्ट्री, जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया और अंडमान-निकोबार के वन तथा जनजातीय कल्याण विभाग के लिए सुझाई गई लागत से अलग होगी. पर्यावरण मंजूरी में तीन स्वतंत्र मॉनिटरिंग कमेटियों का भी प्रावधान है. ये कमेटियां पर्यावरण प्रबंधन योजना के पालन की निगरानी करेंगी. वे प्रदूषण, जैव विविधता और शोंपेन तथा निकोबारी समुदाय से जुड़े मुद्दों की देखरेख करेंगी.
● आदिवासी समुदायों के साथ क्या सलाह-मशविरा हुआ और विस्थापित या प्रभावित शोंपेन और निकोबारी लोगों के लिए क्या आश्वासन दिए गए?
आदिवासी समुदायों पर असर का आकलन अंडमान और निकोबार (प्रोटेक्शन ऑफ एबोरिजिनल ट्राइब्स) रेगुलेशन, 1956 के तहत गठित एक सशन्न्त समिति ने किया. इस समिति में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, जनजातीय मामलों के मंत्रालय के संयुक्त सचिव, एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि और जाने-माने मानवविज्ञानी शामिल थे. इसका मकसद जनजातीय हितों की सुरक्षा आश्वस्त करना था. समिति ने ट्राइबल रिजर्व क्षेत्र के डीनोटिफिकेशन के प्रस्ताव पर विस्तार से विचार किया और सिफारिश की कि जनजातीय लोगों, खासकर शोंपेन समुदाय, जो अत्यंत संवेदनशील जनजातीय समूह है, के हितों को किसी भी तरह से नुक्सान न पहुंचे.
● क्या इस समिति ने कोई खास शर्तें भी तय की थीं?
समिति ने साफ कहा कि किसी भी जनजातीय समुदाय के विस्थापन की इजाजत नहीं होगी. प्रोजेक्ट क्षेत्र के भीतर शोंपेन या निकोबारी समुदाय की जो बस्तियां हैं, वे न्यू ङ्क्षचगेन और राजीव नगर में हैं. प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि किसी भी जनजातीय बस्ती को हटाने का प्रस्ताव नहीं है. मंजूरी की शर्तों में जियो-फेंसिंग और निगरानी प्रणाली अनिवार्य की गई है. इसमें ऑप्टिकल और थर्मल कैमरे, सैटेलाइट फोन, ड्रोन और वायरलेस सिस्टम शामिल होंगे, ताकि जनजातीय इलाकों को अतिक्रमण और शिकारियों से सुरक्षित रखा जा सके.
निकोबार के डिप्टी कमिशनर की अध्यक्षता में एक मॉनिटरिंग कमेटी बनाई जाएगी, जो शोंपेन और निकोबारी समुदाय से जुड़े मुद्दों और उनके कल्याण की निगरानी करेगी. पर्यावरण और सीआरजेड (तटीय विनियमन क्षेत्र) की मंजूरी के तहत 50 साल की जनजातीय कल्याण योजना अनिवार्य की गई है, जिसके लिए अलग से वित्तीय प्रावधान होगा. इसमें कल्याणकारी कदम, बुनियादी ढांचा विकास और आधुनिक सुविधाओं, दवाओं और प्रशिक्षित स्टाफ से लैस एक विशेष चिकित्सा इकाई की स्थापना शामिल है. इसका मकसद संभावित आबादी बढ़ने के कारण मानव जनित बीमारियों की निगरानी करना है. प्रशासन ने भरोसा दिया है कि यह जनजातीय कल्याण योजना प्रोजेक्ट अवधि के दौरान और उसके बाद भी लागू रहेगी. भूमि अधिग्रहण के कलेक्टर को पुनर्वास और पुनर्स्थापन योजना तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है.
● क्या जनजातीय समुदाय इन योजनाओं से सहमत है?
(ग्रेट निकोबार और लिटिल निकोबार के) ट्राइबल काउंसिल के चेयरमैन ने 27 जनवरी, 2022 को पर्यावरण मंजूरी और ईआइए (एन्वायरनमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट) के लिए हुई जनसुनवाई में जनजातीय समुदाय की ओर से हिस्सा लिया था. उसके बाद ट्राइबल काउंसिल ने 11 अगस्त, 2025 और 27 अगस्त, 2025 को एसआइए (सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट) रिपोर्ट पर अपने विचार और टिप्पणियां पत्र के माध्यम से दीं. अंडमान और निकोबार प्रशासन ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को भी सूचित किया है कि कानून, नियम और नीतियों के तहत अनिवार्य सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है.
● ड्रेजिंग, पोर्ट गतिविधियों और जहाजों की बढ़ती आवाजाही से समुद्री जैव विविधता पर लंबे समय में असर न पड़े, इसके लिए सरकार क्या करेगी?
इसके लिए हमने कई स्तर पर नियामक, तकनीकी और वैज्ञानिक सुरक्षा उपाय शामिल किए हैं. ड्रेजिंग और भूमि सुधार के लिए विस्तृत ड्रेज मैनेजमेंट प्लान का पालन अनिवार्य किया गया है. पर्यावरण मंजूरी (ईसी) में यह शर्त है कि पानी के भीतर सिल्ट और सेडिमेंट रोकने के लिए खास पर्दे लगाए जाएं, ताकि रेत वाले तट और कोरल इलाकों पर गाद न जमे. पथरीले इलाकों में ड्रेजिंग पर साफ रोक है, ताकि पारिस्थितिकी और आपदा से जुड़े जोखिम न बढ़ें.
साथ ही ड्रेजिंग और रिक्लेमेशन गतिविधियों में समुद्री कछुओं के अंडे देने और उनमें से बच्चे निकलने के मौसम का ध्यान रखना अनिवार्य है. आइयूसीएन (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर) और मरीन टर्टल विशेषज्ञ समूह के अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा. पोर्ट और रिक्लेमेशन क्षेत्रों में ऑटोमैटिक मॉनिटरिंग सेंसर लगाए जाएंगे. ड्रेजिंग की निगरानी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी या नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी जैसे राष्ट्रीय संस्थान करेंगे. समुद्र तट के बदलाव और तटीय भू-आकृति का नियमित अध्ययन अनिवार्य है. जहां जरूरत होगी, वहां लिविंग शोरलाइन जैसी तकनीकों से शामक उपाय किए जाएंगे.
● कोरल इकोसिस्टम और समुद्री कछुओं की सुरक्षा के लिए क्या कदम हैं?
जेडएसआइ (जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) ने कोरल संरक्षण और ट्रांसलोकेशन की विस्तृत योजना तैयार की है. हर ट्रांसलोकेट किए गए कोरल कॉलोनी की जीपीएस-आधारित निगरानी की जाएगी, ताकि उसके जीवित रहने और दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय सुधार का आकलन हो सके. समुद्री कछुओं की सुरक्षा और जहाजों की आवाजाही के लिए पर्यावरण मंजूरी में साफ निर्देश है कि गैलाथिया बे में जहाजों की गतिविधि डब्ल्यूआइआइ (वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) के रियल-टाइम सैटेलाइट टेलीमेट्री डेटा को ध्यान में रखकर हो. कछुओं के अंडे देने वाले क्षेत्रों को चिन्हित करने के लिए इकोलॉजिकल मार्कर बॉय और एक्सक्लूजन जोन बनाए जाएंगे, ताकि जहाज उस क्षेत्र में न घुसें. ड्रेजिंग के दौरान कछुओं को नुक्सान से बचाने के लिए सक्शन उपकरणों पर टर्टल डिफ्लेक्टर लगाना अनिवार्य है.
संस्थागत स्तर पर प्रदूषण से जुड़े मामलों की निगरानी के लिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई है. इसमें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधि और वायु, जल, ध्वनि, मिट्टी और ठोस कचरा प्रबंधन के विशेषज्ञ शामिल हैं. समुद्री और तटीय जैव विविधता की निगरानी के लिए एक अलग समिति बनाई गई है, जिसकी अध्यक्षता प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) करते हैं. दोनों समितियों को साल में दो बार बैठक करनी होगी, साइट विजिट करनी होगी और अपनी कार्यवाही सार्वजनिक करनी होगी. इससे पारदर्शिता और जरूरत के अनुसार रणनीति में बदलाव सुनिश्चित होगा.
● इतने बड़े पैमाने पर वन भूमि डायवर्जन, खासकर प्राथमिक उष्णकटिबंधीय जंगलों के संदर्भ में, क्या मुख्यभूमि भारत में प्रस्तावित वनीकरण इस अनोखे द्वीपीय इकोसिस्टम के नुक्सान की भरपाई कर सकता है?
कुल 166.10 वर्ग किलोमीटर प्रोजेक्ट क्षेत्र में से 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि के डायवर्जन का प्रस्ताव है. यह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82 फीसद और केंद्र शासित प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब 2 फीसद है. प्रस्तावित डायवर्जन के बाद भी कुल वन आच्छादन राष्ट्रीय वन नीति, 1988 में तय दो-तिहाई मानक से ऊपर रहेगा. वन संरक्षण ढांचे के तहत मंजूरी देते समय संवेदनशील इकोसिस्टम और संबंधित प्रजातियों की सुरक्षा उपायों की जांच की गई है.
यह डायवर्जन चरणबद्ध और कानूनी जांच के बाद होगा, न कि अंधाधुंध तरीके से. इस प्रोजेक्ट को 2047 तक तीन चरणों में लागू करने की योजना है. अभी सिर्फ पहले चरण में 48.65 वर्ग किलोमीटर वन भूमि पर काम हो रहा है. पेड़ों की कटाई भी चरणबद्ध तरीके से होगी, ताकि अचानक पारिस्थितिकीय झटका न लगे. महत्वपूर्ण बात यह है कि 65.99 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को ग्रीन एरिया के रूप में चिह्नित किया गया है, जहां पेड़ों की कटाई नहीं होगी. मास्टर प्लान में खुले क्षेत्र और 'नो ट्री फेलिंग जोन’ भी शामिल हैं, जिससे द्वीप के भीतर ही पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश की गई है.
● और क्षतिपूर्ति के तौर पर किए जाने वाले वनीकरण के बारे में क्या कहेंगे?
क्षतिपूरक वनीकरण को लेकर जो प्रस्ताव है, वह लागू वन दिशानिर्देशों के अनुसार है. जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में 75 फीसद से ज्यादा वन आच्छादन है, वहां अपने क्षेत्र में गैर-वन भूमि पहचानना जरूरी नहीं होता. अंडमान और निकोबार में 75 फीसद से ज्यादा वन आच्छादन है, इसलिए क्षतिपूरक वनीकरण मुख्यभूमि के उन राज्यों में प्रस्तावित है जहां जमीन उपलब्ध है.
इसी के तहत हरियाणा और मध्य प्रदेश में लगभग 24,750 हेक्टेयर भूमि चिन्हित की गई है. क्षतिपूरक वनीकरण और नेट प्रेजेंट वैल्यू के लिए कई हजार करोड़ रुपए का वित्तीय प्रावधान है. विस्तृत योजनाएं बनाई गई हैं, जिनमें 10 साल का रखरखाव प्लान भी शामिल है. चिन्हित जमीनों का निरीक्षण किया जा चुका है. सिफारिशों में मृदा और नमी संरक्षण कार्य, फेंसिंग, जल उपलब्धता और नियमित निगरानी शामिल है.
प्रोजेक्ट क्षेत्र में निकोबारी और शोंपेन समुदाय की बस्तियां केवल न्यू चिंगेन और राजीव नगर में हैं. प्रशासन ने साफ कहा है कि उन्हें हटाने का कोई प्रस्ताव नहीं है.
ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंट पोर्ट को बंगाल की खाड़ी के दूसरे बंदरगाहों पर भौगोलिक बढ़त मिलेगी. नागरिक-सैन्य उपयोग वाला साझा हवाई अड्डा भारत की रक्षा तैयारियों को भी मजबूती देगा.

