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"दिल्ली की असली ताकत आज भी उसके पुराने पकवानों में ही है"

सुनील कांत मुंजाल की दिल्ली के रेस्त्रांओं पर अपने करीबी दोस्तों के साथ मिलकर लिखी गई किताब 'टेबल फॉर फोर' इस दिग्गज व्यवसायी के बारे में कई अनसुने पहलू को सामने लाती है.

Q+A
सुनील कांत मुंजाल 
अपडेटेड 9 मार्च , 2026

आपको रेस्तरांओं के बारे में लिखने की प्रेरणा कहां से मिली, क्या आप खाने के शौकीन हैं?

दिल्ली के खानपान पर किताब लिखने की कोई योजना नहीं थी. इसकी शुरुआत चार दोस्तों की नियमित मुलाकातों से हुई. चूंकि हम खाना खाने से साथ-साथ रेटिंग, रैंकिंग और पूरी समीक्षा कर रहे थे, इसलिए समय के साथ यह एक दिलचस्प संग्रह बन गया. लगभग 70 समीक्षाओं के बाद हमने इसे किताब का रूप देने का फैसला किया.

● दिल्ली के खानपान परिदृश्य में किस तरह बदलाव आया है?

मेरी युवावस्था के दौर में अच्छे रेस्त्रां सिर्फ पांच सितारा होटलों तक सीमित थे और वहीं पर नए तरीके आजमाए जा रहे थे. बेशक, हमारे पास एम्बेसी और क्वालिटी  जैसी जगहें थीं, फिर निरूला  ने पश्चिमी भोजन की संस्कृति से परिचय कराया. 2010-2012 के आसपास नई पाक कला का बोलबाला रहा पर धीरे-धीरे घटने लगा. इसका कुछ अंश किताब में दिखाई देता है.

क्या आप मानते हैं कि दिल्ली अब वर्ल्ड फूड सिटी बन चुकी है?

हम अभी उस मुकाम तक नहीं पहुंचे हैं. यहां तक कि गोवा में भी इससे कहीं अधिक विविधता देखने को मिलती है. लेकिन कुछ संकेत जरूर दिख रहे हैं. फूड डिलिवरी ने एक नया बाजार खोला है. लेकिन दिल्ली की असली ताकत आज भी उसके पुराने पकवानों में निहित है, जैसे दाल मखनी बनाने का तरीका, खास तरह का कबाब, और एक लंबे अरसे से जुबान को भा रही दौलत की चाट.

सेरेंडिपिटी आर्ट्स फेस्टिवल  के 10 साल पूरे होने पर कैसा महसूस हो रहा है?

बेहद खुशी हो रही है. मैंने अपनी टीम से कहा था कि हमें कुछ ऐसा करना चाहिए जो बड़े पैमाने पर हो, क्योंकि ऐसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में आप इसके बिना असर डाल भी नहीं सकते. लेकिन सेरेंडिपिटी इतनी जल्दी इतना बड़ा और लोकप्रिय हो जाएगा, इसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी.

—अमित दीक्षित

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