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"मैं थोड़ा अलग हूं, इसका अंदाजा मुझे 3 साल की उम्र में हो गया था"

संस्मरणात्मक किताब "टेल माइ मदर, आइ लाइक बॉयज़" में शेफ सुवीर सरन समलैंगिकता और शर्म से छुपकर जीने से लेकर अपनी पहचान के साथ खुलकर जीने के लंबे सफर के बारे में बात कर रहे हैं

Q+A
शेफ सुवीर सरन
अपडेटेड 23 जनवरी , 2026

सवाल+जवाब

● किस बात ने अब आपको अपनी कहानी कहने के लिए विवश किया?

यह कहानी तो खुद को सुने जाने की गुहार के साथ दशकों से मेरे साथ चली आ रही थी. इसे एक कुबूलनामे की बजाए सीने में प्रेम दबाए छिपते-भटकते लोगों से एक बिरादराना रिश्ते के लिए मैंने भावनात्मक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से अब जाकर खुद को तैयार पाया.

अपनी सेक्सुअलिटी  को स्वीकार पाना क्या आपके लिए कठिन था? 

मैं थोड़ा अलग हूं, इसका पता मुझे बहुत शुरू में ही चल गया था. तीन साल की उम्र में मुझे इसका अंदाजा हुआ और पांच तक आते-आते तो पूरी तरह समझ चुका था कि मैं पारंपरिक खांचे में फिट नहीं हूं. इसकी भाषा किशोरावस्था में जाकर फूटी लेकिन इससे जुड़े एहसास, असहजता और शर्म वाले पहलू हमेशा से भीतर कहीं मौजूद थे.

आपके इस आंतरिक जागरण में भोजन का क्या रोल रहा भला? 

शब्दों में बयान किए जाने की कुव्वत आने से बहुत पहले भोजन मेरी पहली सुरक्षित भाषा बना. इसने मुझे ऐसे परिवेश में भी प्रेम देने, स्वीकार्यता पाने और अपनी गरिमा की अनुभूति कराई जहां मैं तब तक अपना सच बयान करने की स्थिति में नहीं था.

शेफ, लेखक, एंकर, एजुकेटर...आपके कई चेहरे हैं. किसके साथ आप अपनी पहचान सबसे ज्यादा जोड़ते हैं? 

मैं अपनी सबसे अहम पहचान किस्सागो के रूप में पाता हूं—कभी खाने के जरिए, कभी शब्दों के तो कभी अपनी मौजूदगी के जरिए. भूमिकाएं बदलती रहती हैं पर मंशा वही रहती है: सलीके से चुपचाप एक रिश्ता कायम करते हुए सच को बयान करना.

—अमित दीक्षित

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