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‘‘तेज ग्रोथ और कम महंगाई के कारण भारत सही दिशा में बढ़ रहा है’’

रेपो रेट में कटौती करने से मांग में कैसे इजाफा होगा, क्या रिजर्व बैंक के पास कमजोर होते रुपए को संभालने की कोई योजना है? इसी तरह के दूसरे मुद्दों पर इंडिया टुडे एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा से RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा की खास बातचीत

interview: Sanjay Malhotra
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा
अपडेटेड 6 जनवरी , 2026

एक्सक्लूसिव इंटरव्यूः संजय मल्होत्रा

आपके अभी तक के कार्यकाल में असामान्य घटनाएं हुई हैं. डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ, जिन्होंने भारत पर अनुचित तरीके से बोझ डाला, ने वैश्विक व्यापार को हिला दिया है. रुपया तेजी से गिरा है. महंगाई भी कई साल के निचले स्तर पर है. फिर भी भारत ने वित्त वर्ष 26 की दूसरी तिमाही में 8.3 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि दर्ज की. आपने इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गोल्डीलॉक्स फेज (सही दौर) बताया है. आपका मतलब क्या था?

आर्थिक शब्दावली में गोल्डीलॉक्स फेज वृद्धि और महंगाई के बीच संतुलन है. अमूमन, ऊंची वृद्धि होती है तो महंगाई भी ज्यादा होती है और इसका उलट भी होता है. मगर हम इन दोनों स्थितियों का सबसे अच्छा अनुभव कर रहे हैं—कम महंगाई और ऊंची वृद्धि. यह एक अच्छी स्थिति है.

क्या हम वाकई संरचनात्मक रूप से वृद्धि के मजबूत दौर में हैं या यह वैश्विक और घरेलू कारकों के बीच एक खास स्थिति के फलस्वरूप मिला मौका है? 
भू-राजनीतिक घटनाओं, तनाव और व्यापार में टूटन जैसी बाहरी चुनौतियों के बावजूद इस कैलेंडर वर्ष की पहली तीन तिमाहियों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने बहुत अच्छा किया है, महंगाई के मामले में भी जहां हम अभी तक के सबसे निचले स्तर पर हैं और वृद्धि के मोर्चे पर भी जहां हमारा लगभग 8 फीसद का औसत है. आगे चलते हुए वित्त वर्ष 26 के लिए हम 7.3 फीसद की ग्रोथ का अनुमान लगा रहे हैं, और वित्त वर्ष 27 की अगली दो तिमाहियों के लिए यह अनुमान क्रमश: 6.7 और 6.8 फीसद की वृद्धि का है. साफ कहूं तो लंबी अवधि में ये आंकड़े क्या होंगे, इसका ठीक-ठीक अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है. मगर हां, भारत अच्छा करेगा, उस लिहाज से वह पूरी तरह से तैयार है.

दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले भारतीय अर्थव्यवस्था किस जगह है?
भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है. सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यानी अमेरिका दो फीसद से कम की रफ्तार से बढ़ रहा है. चीन दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, उसकी भी रफ्तार 5 फीसद से कम की है. सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में हमारा कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है, चाहे वह यूरो जोन के देश हों, ब्रिटेन हो या जापान, सभी की वृद्धि लगभग एक फीसद या उससे कम है. इंडोनेशिया लगभग 5-5.5 फीसद के साथ सबसे निकट है. इसलिए हमारे मुकाबले कोई नहीं.

भारत का सुनहरा दौर कितना टिकाऊ है? इसमें जोखिम के कौन से कारक हैं?
केवल एक कारण नहीं है. अगर आप पिछले चार वर्षों को देखें, तो कोविड के बाद जीडीपी की औसत वृद्धि लगभग 8 फीसद रही है. अगर आप पिछले दशक को देखें तो हमारी औसत विकास दर 6.6 फीसद थी. ऐसा सरकार और केंद्रीय बैंक दोनों की ओर से उठाए साझा उपायों से हुआ. पहली और सबसे जरूरी बात, नीति की स्थिरता ने निश्चितता दी है. बेशक, हमारे लिए अब कुछ बाहरी अनिश्चितताएं हैं, जिनकी वजह से आपको ग्रोथ में कुछ गिरावट दिखती होगी मगर नीतिगत स्थायित्व, वित्तीय स्थायित्व, कीमतों में स्थिरता के अलावा हाल के सुधारों के जरिए सरकार का ग्रोथ पर लगातार फोकस रहा है.

आप किन सुधारों की बात कर रहे हैं?
एक था, जीएसटी को तर्कसंगत बनाना, उसके बाद श्रम सुधार और पीएलआइ जैसी योजनाएं जिनका जोर मैन्युफैक्चरिंग, रोजगार, नौकरियां पैदा करने पर था तथा सरकार और निजी क्षेत्र, और घरों की बहुत मजबूत बैलेंस शीट, जिससे क्षमता का अच्छा इस्तेमाल हुआ. तो कुल मिलाकर अगर आप हर सेक्टर और अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को देखें तो हम बहुत ही अच्छे दौर में हैं. इससे हमें आगे भी अपनी गति बरकरार रखने में मदद मिलेगी.

जीडीपी वृद्धि तो बहुत अच्छी लग रही है लेकिन आम लोगों को इससे मतलब होता है कि क्या इससे नौकरियां पैदा होंगी. क्या भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी नौकरियों से ज्यादा तेजी से बढ़ रही है?
बैंक में हमारा मुख्य उद्देश्य कीमत स्थिरता और वृद्धि बनाए रखना है, मगर रोजगार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो, मेरा मानना है कि, पिछले कुछ वर्षों में काफी अच्छा कर रहा है. अगर आप नवीनतम मासिक पीएलएफएस (पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे) देखें, तो बेरोजगारी मई के आखिर तक 5.6 फीसद थी जो घटकर 4.8 फीसद रह गई है.

असल में यह 2017-18 या उसके आसपास से लगातार कम होती गई है, तब सालाना पीएलएफएस डेटा के अनुसार श्रम बल की भागीदारी दर लगभग 50 फीसद के इर्द-गिर्द हुआ करती थी. यह 2023-24 में सुधरकर 60 फीसद हो गई. इसका मतलब यह नहीं कि हमें और नौकरियां नहीं सृजित करनी हैं—हमें अधिक तेजी से और ज्यादा वेतन वाली नौकरियां पैदा करनी होंगी. मुझे लगता है कि अर्थव्यवस्था ऐसा करने के लिहाज से अच्छी स्थिति में है.

महंगाई का क्या? क्या आपको भरोसा है कि मौजूदा कम दर बरकरार रहेगी?
हां. पिछले दो वर्षों में महंगाई काफी नरम रही है, (लक्षित दायरे) 4 फीसद से नीचे. बेशक, इस कमतर संख्या का कारण मुख्य रूप से आधार प्रभाव, उतार चढ़ाव और एक साल पहले हमारे यहां खाने-पीने की चीजों की ज्यादा महंगाई होना है. संरचना के लिहाज से देखें तो 2016 में जब महंगाई को लक्षित करने की व्यवस्था शुरू हुई, उसके बाद से नौ वर्षों में हम औसतन 4.9 फीसद की कम महंगाई देख रहे हैं. उससे पहले यह लगभग 7 फीसद होती थी. अब, सरकार और आरबीआइ ने जो कदम उठाए हैं, जिन पर उम्मीदें टिकी हैं, उनसे सप्लाइ साइड के झटकों को छोड़ दें तो, महंगाई में लंबे समय तक नरमी बनी रहेगी.

फरवरी 2025 से रिजर्व बैंक ने नीति दर में 125 आधार अंक (बीपीएस) की कटौती की है. अब यह दर 5.25 फीसद रह गई है. यह चौंकाने वाली बात है क्योंकि पिछली बार इसी तरह की कमी 2019 के आसपास या फिर जब वृद्धि में भारी गिरावट आई थी, तब हुई थी. इस बार जीडीपी की अच्छी ग्रोथ के बावजूद दर में कमी की गई है. रिजर्व बैंक के आकलन में क्या बदलाव आया?
पिछली बार जब हम दर को 5.25 फीसद और फिर उससे भी कम करके 4 फीसद पर लाए थे, तो हम बिल्कुल विपरीत स्थिति में थे—ग्रोथ कम थी और महंगाई ज्यादा, 2021 में शीर्ष महंगाई यानी कि हेडलाइन इनफ्लेशन 4 फीसद से ज्यादा थी. इस बार वृद्धि अच्छी है और महंगाई कम है. मौद्रिक नीति हमेशा आगे के अनुमान के हिसाब से होती है और महंगाई 3.5 फीसद या आस-पास होने के कारण दरों को थोड़ा कम करने की जरूरत है, इसलिए हमने उन्हें कम कर दिया.

और आगे क्या होगा?
मौद्रिक नीति पहले से तय नहीं होती, यह बदल रही है. हम आंकड़ों पर निर्भर हैं. हम एक तटस्थ दौर में हैं. यह एमपीसी (मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी) को तय करना है और देखना है कि आंकड़े किस तरह के हैं और हमें क्या करना चाहिए. जैसा कि मैंने बताया, मुझे लगता है कि महंगाई लंबे समय तक नरम रहेगी. और अगर ऐसा है तो सप्लाइ साइड, मौसम, भू-राजनीति या ऐसे ही कुछ झटकों को छोड़ दें तो, हमारे यहां लंबे समय तक कम नीति दरों का दौर रहेगा.

रेपो रेट में कई कटौतियों के जरिए आपने अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की क्या उम्मीद की थी?
हमारा मकसद मांग बढ़ाना था, और अब आप इसे देख सकते हैं. पिछली 2-3 तिमाही में खपत खर्च में अच्छी बढ़ोतरी दिख रही है. ऋण वृद्धि और उठान अच्छा है, खासकर छोटे-मझोले उद्यमों के लिए और होम लोन जैसे पर्सनल लोन में. मैं इनकी मिसाल क्यों दे रहा हूं? क्योंकि ये बाहरी बेंचमार्क दरों से जुड़े हैं और दूसरे सेक्टरों के मुकाबले इनमें मौद्रिक नीति का लाभ तेजी से पहुंचता है. इसलिए, इससे अर्थव्यवस्था में मांग और बढ़नी चाहिए, जिससे वृद्धि और रोजगारों में मदद मिलेगी.

भारतीय रुपया अब डॉलर के मुकाबले 91 पर है और फिर भी रिजर्व बैंक पहले के उलट, अपनी मुद्रा के लिए किसी खास स्तर का आक्रामक बचाव करने की जल्दी में नहीं दिखता. क्या केंद्रीय बैंक जान-बूझकर एक्सचेंज रेट में लचीलापन होने दे रहा?
मुद्रा के मामले में हमारी एक बहुत ही स्थिर और तय पॉलिसी है कि हम किसी स्तर या कीमत दायरे को टारगेट नहीं करते, बल्कि बाजार की ताकतों को यह तय करने देते हैं कि रुपए का सही स्तर क्या होना चाहिए, चाहे वह डॉलर हो या पाउंड या यूरो या कोई और विदेशी मुद्रा. हमारा मकसद मुख्य रूप से कीमतों में किसी भी तरह की बेवजह या बहुत ज्यादा या असामान्य उतार-चढ़ाव या किसी भी तरह की गैर-जरूरी सट्टेबाजी को रोकना है. यहीं पर हम दखल देते हैं. नहीं तो हम बाजार की ताकतों को कीमतें तय करने देते हैं, जो लंबे समय में, हमें लगता है कि काफी असरदार हैं. इसलिए ऐसा नहीं है कि हमने रुपए को कमजोर होने देने की कोई जान-बूझकर कोशिश की है.

पिछले चार साल में रिजर्व बैंक ने रुपए को संभालने के लिए जीडीपी का करीब 2 फीसद खर्च किया है. तो क्या आगे भी यही नीति रहेगी कि रिजर्व बैंक तब तक दखल नहीं देगा, जैसा कि आपने कहा, जब तक कोई बड़ा उतार-चढ़ाव न हो?
सबसे पहले, मुझे नहीं लगता कि रिजर्व बैंक की हस्तक्षेप नीति में कोई बड़ा बदलाव हुआ है. जैसा मैंने पहले बताया, बीते कुछ साल में नीति खासी स्थायित्व वाली रही है और हम सिर्फ बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव कम करने की कोशिश करते हैं. दूसरा, कुछ उतार-चढ़ाव तो बना रहेगा, जिसे कारोबारियों ने ध्यान में रखा है और जिसके लिए वे तैयार हैं.

बीते 10 साल में रुपए का लगभग 3 फीसद और पिछले 20 वर्षों में लगभग 3.4 फीसद अवमूल्यन हुआ है. तो औसत अवमूल्यन नीचे आया है और आगे भी अवमूल्यन के स्तर में कोई बड़ा अंतर नहीं आना चाहिए. हमें एक्सटर्नल सेक्टर के बहुत मजबूत और दमदार होने का पक्का भरोसा है. हमारे पास 11 महीने का आयात कवर है, और हमारे बाह्य ऋण के मुकाबले हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 92 फीसद है. हमारा बाह्य ऋण लगभग 750 अरब डॉलर है, और हमारे पास लगभग 690 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है. इसलिए, हम अपनी बाह्य सेक्टर की देनदारियों को पूरा करने में सहज स्थिति में हैं, चाहे वह चालू खाता हो या पूंजी खाता. 

ऐसे क्या अहम कारण हैं कि रुपया इस तरह नहीं गिरेगा जिससे अर्थव्यवस्था को नुक्सान हो?
रुपया इसलिए कमजोर होगा क्योंकि हमारे यहां महंगाई दूसरे देशों से ज्यादा है. इसलिए, मान लीजिए, 2.5 फीसद की संभावित गिरावट है. मगर यह कोई एकतरफा गिरावट नहीं होगी. इसमें उतार-चढ़ाव होंगे, इनकी उम्मीद भी है क्योंकि बाजार, चाहे विदेशी मुद्रा हो या कुछ और, शॉर्ट टर्म में बैलेट वाली वोटिंग मशीन की तरह होते हैं. बहुत कुछ भावनाओं और घटनाओं से चलते हैं. लंबे समय में वे संतुलित हो जाते हैं. दीर्घावधि के लिहाज से हमारे देश के फंडामेंटल मजबूत हैं. हम अपनी सभी बाहरी जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से अच्छी स्थिति में हैं. इसलिए रुपया उस स्तर पर होना चाहिए जो हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मददगार हो और भारतीय आयातकों और निर्यातकों को नुक्सान न पहुंचाए.

एफपीआइ या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने पिछले साल शेयरों से करीब 1.6 लाख करोड़ रुपए निकाले हैं; सितंबर में शुद्ध एफडीआइ भी ऋणात्मक था. क्या यह रिजर्व बैंक के लिए चिंता की बात है?
इसके बजाय मैं चालू खाते के घाटे पर ध्यान देना चाहूंगा, जो पहले ज्यादा था मगर बीते कुछ वर्षों में तेजी से कम होकर सहज स्तर पर आ गया है. इसलिए पूंजी खाते में हमारे पास जो विदेशी मुद्रा की आवक है, उसे देखते हुए हम इस तरह के चालू खाते के घाटे को आसानी से पूरा कर लेंगे. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में उतार-चढ़ाव है. बल्कि इक्विटी के मामले में हम काफी कम हैं.

ऋण के मामले में हमारे पास एफपीआइ का अच्छा प्रवाह रहा है और उम्मीद है कि यह जारी रहेगा. इसी तरह, सकल एफडीआइ बढ़ा है, वैसे पिछले साल शुद्ध एफडीआइ लगभग शून्य रहा होगा. सकल एफडीआइ वह आंकड़ा है जिसे हमें अर्थव्यवस्था के नजरिए से सभी बाह्य भुगतान संतुलन की स्थिति के लिए देखना चाहिए. भारत से बाहर होने वाले निवेश और धन वापस ले जाने के कारण यह अभी भी सकारात्मक है, जो एक मजबूत और भरोसेमंद अर्थव्यवस्था का अच्छा संकेत है, जिससे निवेशक जब चाहें तब निवेश वापस ले जा सकते हैं.

फिर से जीडीपी वृद्धि दर पर लौटते हैं, वित्त वर्ष 26 के लिए रिजर्व बैंक का अनुमान 7.3 फीसद का है. हालांकि बाजार में लोग पहले से ही इससे ज्यादा का अनुमान लगा रहे हैं. इस रफ्तार को बढ़ाने वाले मुख्य कारक क्या हैं?
निजी अंतिम उपभोग खर्च और दूसरा सकल स्थायी पूंजी निर्माण, दोनों में बहुत अच्छी वृद्धि हुई है. निर्यात के मोर्चे पर कुछ दिक्कतें आई हैं मगर यह हमारे लिए अवसर होगा. निर्यात में हम कुछ शुरुआती संकेत देख रहे हैं, टैरिफ से प्रभावित सेक्टर दूसरे बाजारों में जा रहे. इसलिए, जीडीपी के इन दोनों हिस्सों को अच्छा करना चाहिए तथा उपभोग से निवेश को और बढ़ावा मिलना चाहिए. भारत ने कई स्तर पर जो काम किए हैं, उनसे बनी रफ्तार हमें आने वाले वर्षों में आगे ले जाएगी.

केंद्र सरकार की हमेशा से शिकायत रही है कि कॉर्पोरेट टैक्स की दर में भारी कटौती के बावजूद उम्मीद के मुताबिक निजी निवेश नहीं हुआ. क्या अब आपको इसमें बदलाव दिखता है और क्या यह वृद्धि को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त है?
वैसे, सकल स्थायी पूंजी निर्माण में 8 फीसद की बढ़ोतरी हुई है और यह उतनी ही है जितनी जीडीपी में हुई है, मगर निजी क्षेत्र का निवेश और ज्यादा हो सकता था, और इसने वृद्धि में बाधा डाली. मगर मांग ही निवेश को बढ़ावा देती है. और खपत के तेजी से बढ़ने के कारण मुझे भरोसा है कि निजी निवेश और बढ़ेगा.

हमें निजी निवेश के बारे में कुछ बातें भी ध्यान में रखनी चाहिए. एक, हमारी अर्थव्यवस्था में पूंजी की सघनता कम हो रही है क्योंकि पूंजी ज्यादा उत्पादक और सक्षम होती जा रही है. दूसरा, हमारी अर्थव्यवस्था की संरचना में सेवा क्षेत्र का हिस्सा बढ़ रहा है, सेवा क्षेत्र बढ़ रहा है और इसमें कम पूंजी की जरूरत है. इसलिए, निजी निवेश में बढ़ोतरी पहले जितनी नहीं होगी. इसके अलावा, जो सेक्टर पहले पूंजीगत खर्च को आकर्षित करते थे, वे बदल रहे हैं.

क्या आप हमें इन बदलावों के कुछ उदाहरण दे सकते हैं?
मसलन, अगर आप पावर सेक्टर को देखें तो हम पहले घाटे की स्थिति में थे. उस कमी को पूरा करने के लिए पूंजी की जरूरत बहुत ज्यादा थी. अब हम कमोबेश आत्मनिर्भर स्थिति में हैं क्योंकि हमने सारा घाटा पूरा कर लिया है. इसलिए इन सेक्टरों में निवेश में बढ़ोतरी उतनी ज्यादा नहीं होगी. दूसरी ओर, आप अक्षय ऊर्जा, रक्षा उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और मोबाइल फोन जैसे नए क्षेत्रों में निवेश में ज्यादा वृद्धि देख रहे हैं.

इसलिए, उन सेक्टरों में बदलाव आया है जिन्हें आप आमतौर पर निजी निवेश के लिए ट्रैक करते थे. आगे चलकर, क्षमता का बेहतर इस्तेमाल और कंपनियों तता बैंकों की मजबूत बैलेंस शीट, जो वास्तविक अर्थव्यवस्था को ज्यादा ऋण देने को उत्सुक हैं, निजी निवेश के लिए बहुत मददगार रहेंगे. पूंजी बाजार में उछाल आ रहा है. मुझे पूरा यकीन है कि निजी क्षेत्र का निवेश हमारी अर्थव्यवस्था की आगे की वृद्धि में मदद करता रहेगा.

क्या आप उन भारतीय निर्यातकों की जरूरतों का भी ध्यान रख रहे हैं जो अमेरिकी शुल्कों के दबाव का सामना कर रहे हैं?
रिजर्व बैंक उन सभी सेक्टरों को मदद देने में आगे रहा है जिन पर बुरा असर पड़ा. अगर आप खासकर शुल्क से प्रभावित सेक्टरों की बात कर रहे हैं तो हमने ऋण और ब्याज पर रोक लगाने समेत कई उपाय किए हैं.

● क्या आप मौजूदा दर कटौती का लाभ ग्राहकों तक पहुंचने से खुश हैं या फिर दर कटौती के बाद ऋणदाताओं के पास दरें घटाने की गुंजाइश अभी भी है?
मैं आपको 100 आधार अंक की कटौती की तुलना में कुछ आंकड़े देता हूं, जिसके बाद हाल ही 25 आधार अंक की कमी और की गई. 100 आधार अंक के मामले में हमारे पास अक्तूबर तक के आंकड़े हैं जो दिखाते हैं कि ब्याज दर के मामले में औसतन फायदा 79 आधार अंक तक का पहुंचा है, जो बहुत अच्छा है. उसके बाद, एमएसएमई को 100 आधार अंक के मुकाबले 98 आधार अंक का लाभ मिला है क्योंकि इनमें से ज्यादातर बाहरी बेंचमार्क से जुड़े हैं, जिनमें रेपो रेट भी शामिल है. इसी तरह, होम लोन में लगभग 123 आधार अंक की कमी आई है. बेशक, हमारी 25 आधार अंक की ताजा कमी के बाद कटौती के लिए और गुंजाइश है.

 एमएसएमई सेक्टर में छोटे बिजनेसों तक औपचारिक क्रेडिट जिस तरह से पहुंच रहा है, क्या रिजर्व बैंक उससे संतुष्ट है?
कृषि के अलावा, एमएसएमई हमारे फोकस एरिया में से एक है. एमएसएमई को क्रेडिट 40 फीसद के प्राथमिकता क्षेत्र के ऋण दायरे में आता है. और उसमें भी सूक्ष्म और लघु उद्योगों के लिए 7.5 फीसद का अनिवार्य लक्ष्य है. एमएसएमई सेक्टर को क्रेडिट में लगभग 11.5 फीसद की अच्छी बढ़ोतरी हुई है. सूक्ष्म और लघु उद्योगों में वृद्धि 26 फीसद और मझोले उद्योगों में यह 18 फीसद रही है. दरों का लाभ पहुंचाना अच्छा रहा है और हम काफी संतुष्ट हैं.

क्या सुधार की और गुंजाइश है?
हां है क्योंकि संभावनाएं बहुत हैं. हमारे पास एमएसएमई के लिए कई प्रोग्राम हैं. यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस सबसे नया है जिसे हम लागू करने जा रहे. अकाउंट एग्रीगेटर ढांचे में आसान और सहमति-आधारित डेटा शेयर करने की सुविधा है, यह एक और ऐसी पहल है जिससे आगे वृद्धि को बढ़ावा मिलना चाहिए क्योंकि अब बहुत सारी जानकारी डिजिटल रूप में उपलब्ध है. जीएसटी और यूपीआइ डेटा के जरिए अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने के साथ-साथ इन सबसे एमएसएमई के लिए बेहतर क्रेडिट अप्रेजल में मदद मिली है, जिससे उन्हें ज्यादा ऋण मिला है.

दूसरी चिंता घरेलू बचत को लेकर है जो वित्त वर्ष 24 में गिरकर लगभग 18 फीसद रह गई है. यह स्वस्थ बदलाव है या फिर चिंता की बात?
बिना किसी शक के यह पिछले 12 या लगभग इतने ही वर्षों में हुआ स्वस्थ बदलाव है. इस विविधता को और बढ़ावा दिया जाना चाहिए. इससे बचत करने वालों को मदद मिलती है क्योंकि उन्हें ज्यादा ब्याज दर मिलती है और उधार लेने वालों को भी फायदा होता है क्योंकि उन्हें कम दर मिल जाती है. यह दोनों के लिए फायदे की बात है क्योंकि बीच की लागत कम हो गई है. 2011-12 से पहले की तुलना में घरेलू बचत में उल्लेखनीय बदलाव आया है. तब 90 फीसद बचत को बैंक जमाओं, मुद्रा और बीमा में निवेश किया जाता था, जो 2024-25 में घटकर 56 फीसद रह गई है.

घरेलू बचत के साधनों का नया ब्रेक-अप क्या है?
साल 2012 में कुल घरेलू बचत में से लगभग 58 फीसद बैंक जमाओं में, 22 फीसद बीमा में और 11 फीसद मुद्रा के रूप में रखी गई थीं. आज बैंक जमाएं घटकर लगभग 35 फीसद, मुद्रा लगभग 6 फीसद रह गई है. बीमा घटकर लगभग 15-16 फीसद पर रह गया है. जो बढ़े हैं, वे हैं शेयर, इक्विटी और डिबेंचर, जो इन 13 वर्ष में 2 फीसद से कम से बढ़कर अब लगभग 16 फीसद हो गए हैं. प्रॉविडेंट फंड और पेंशन फंड लगभग 11 फीसद थे जो बढ़कर करीब 22 फीसद हो गए हैं.

किस कारण से यह स्वस्थ बदलाव है?
यह अच्छा बदलाव है क्योंकि इक्विटी में भारतीय लोगों की हिस्सेदारी बढ़ रही है. इसका ज्यादातर हिस्सा, लगभग 80-85 फीसद, म्युचुअल फंडों और एसआइपी के जरिए हो रहा है, इसलिए यह दीर्घावधि की पूंजी है. दूसरा, पेंशन फंडों में बढ़ोतरी भी अच्छी बात है क्योंकि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक स्थिर पूंजी मिलती है.

क्या आपको लगता है कि हाल ही जीएसटी में हुए बदलाव का उपभोग पर वाकई बड़ा असर पड़ेगा?
बेशक. यह पहले से हो रहा है. कीमतें घटने से लोगों की खरीद शक्ति बढ़ी है. उस हद तक, हम निश्चित ही उपभोग में अच्छी बढ़ोतरी देखते रहेंगे. लगभग एक साल से मौद्रिक नीति में की गई नरमी से भी उपभोग को बढ़ावा मिलना चाहिए. सबसे अहम बात, केंद्र सरकार का ग्रोथ पर फोकस है और जिस तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक रूप से बहुत अच्छी नींव है और अच्छी स्थिति में है, उससे हमें लंबे समय तक बढ़ते रहने में मदद मिलती रहेगी.

बैंकिंग क्षेत्र में हमें कई झटके लगे हैं. इस समय बैंकिंग प्रणाली की मजबूती को लेकर आप कितने आश्वस्त हैं?
कुछ घटनाओं को छोड़कर, बैंकिंग क्षेत्र बहुत मजबूत है, बहुत दमदार है. लाभ के आंकड़े अच्छे हैं, आरओई (रिटर्न ऑन इक्विटी) औसतन 14 फीसद है. परिसंपत्ति गुणवत्ता फिर से बहुत अच्छी है. 0.5 फीसद का शुद्ध एनपीए अब तक के सबसे निचले स्तर पर है. कैपिटल एडिक्वेसी (पूंजी पर्याप्तता) 17 फीसद  से ज्यादा और अच्छी स्थिति में है और लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (एलसीआर) लगभग 130 फीसद पर है. कुल मिलाकर, बैंकिंग क्षेत्र काफी दमदार स्थिति में है.

पिछले कुछ वर्षों में संचालन में सुधार हुआ है. केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक और बैंकों ने मिलकर जो कदम उठाए हैं, उनसे नियमन और बेहतर हुआ है और निगरानी में मजबूती आई है. केंद्रीय बैंक की नीतियों के अलावा, इसका काफी श्रेय केंद्र सरकार को भी जाता है जिसने सरकारी बैंकों के संचालन में सुधार किया और जरूरी पूंजी उपलब्ध कराई. कुल मिलाकर पिछले 10 वर्षों में बैंकिंग प्रणाली में निश्चित रूप से सुधार हुआ है.

आप इनोवेशन को बढ़ावा देने और नियामकीय नियंत्रण के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं, खासकर फिनटेक और एनबीएफसी के क्षेत्र में?
हमारे पास पहले से ही पांच सिद्धांत वाला नियामकीय ढांचा था, जिसे अब हमने औपचारिक रूप दे दिया है. पहला यही कि यह सिद्धांत पर आधारित होगा, न कि नियमों पर आधारित रेगुलेशन, ताकि यह ज्यादातर हालात में काम कर सके और हमें हर नई परिस्थिति के साथ इसे बदलने और संशोधित करने की जरूरत न पड़े. यह अब नतीजों और सिद्धांत पर आधारित है. दूसरा, यह आनुपातिक है. इसलिए, हम लागत-लाभ विश्लेषण देखते हैं. हमें पता है कि नियमन की लागत होती है लेकिन इसके साथ ही फायदे भी हैं.

दूसरे सिद्धांत क्या हैं?
हम हितधारकों से परामर्श भी करते हैं, जो हमारे नियमन का तीसरा स्तंभ है. हमारी कोशिश रही है कि ऐसे उचित नियमन हों जो लंबी अवधि की वृद्धि में मदद करें और स्थायित्व बनाए रखें. मसलन, क्रिप्टो को लेकर हमारी चिंताएं हैं. लेकिन इसके साथ ही हम भुगतान, डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देते हैं. यूपीआइ इसलिए सफल है क्योंकि मुख्य रूप से इसकी अगुआई करने वालों में रिजर्व बैंक भी एक था. इसी तरह हम डिजिटल ऋण को आसान और सक्षम बनाते हैं, इसलिए यह संतुलन साधना मुश्किल तो है लेकिन हम इसके लिए कोशिश करते हैं.

जब से आपने क्रिप्टो करेंसी की बात की है, अच्छी और बुरी क्रिप्टो को लेकर खूब बहस हो रही है. इस पर रिजर्व बैंक का रुख क्या है?
जहां तक रिजर्व बैंक का सवाल है, हमारा मानना है कि क्रिप्टो की राह पर निश्चित रूप से जोखिम भी हैं तो फायदे भी हैं. हमारे देश में बहुत अच्छी भुगतान प्रणाली है, इसलिए क्रिप्टो के साथ घरेलू मोर्चे पर कोई समस्या नहीं है. हमारे पेमेंट सिस्टम जैसे यूपीआइ, एनईएफटी और आरटीजीएस तेज, सस्ते और कुशल हैं.

वे दूसरे देशों में भुगतान की समस्या भी हल कर सकते हैं. हमारे विचार से सीबीडीसी (सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी) को एक देश को दूसरे देश के तेज भुगतान सिस्टम से जोड़ना ही आगे की राह है. और अपनी तरफ से हम इसे आगे बढ़ाएंगे. जहां तक क्रिप्टो और आगे के रास्ते की बात है, तो सरकार ने एक समूह बनाया है, जिसमें रिजर्व बैंक एक सदस्य है. हमने अपने विचार वहां बता दिए हैं, और आखिरी फैसला सरकार का होगा.

अंत में, रिजर्व बैंक के गवर्नर को किस फिक्र में रात को भी जगे रहना पड़ता है?
यह तो बहुचर्चित कथन है ना कि केंद्रीय बैंक का काम ही फिक्र करना है. इसलिए, हम अलग-अलग जगह से आने वाले कई जोखिमों से निबटने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. ये जोखिम बाहरी सेक्टर में लगातार बने रहते हैं, चाहे वह भू-राजनीति हो, व्यापार का छितरते जाना हो या विकसित देशों में बढ़ता सार्वजनिक ऋण का ऊंचा स्तर हो, जिसका परोक्ष असर हो सकता है, या परिसंपत्तियों की ऊंची कीमतें हों.

टेक्नोलॉजी के भी परोक्ष प्रभाव होते हैं. भारत की बात करें तो बेशक, मौसम और जलवायु से जुड़ी घटनाएं होती हैं जिनको लेकर हमें सतर्क रहना चाहिए. राजकोष के लिहाज से सरकार अच्छी राह पर है. केंद्र और राज्य दोनों ही सुदृढ़ हो रहे. मुझे पूरा भरोसा है कि आगे भी, वे अपना हिसाब-किताब मजबूत रखते रहेंगे.

गोल्डीलॉक फेज पर
अमूमन ऊंची वृद्धि दर से महंगाई बढ़ती है और कम महंगाई का अर्थ होता है कमजोर वृद्धि. पर इस समय दोनों के उम्दा छोर हमारे सामने हैं: कम महंगाई, ऊंची वृद्धिदर. यही गोल्डीलॉक फेज है.समय तक काबू में रहेगी. 

रेपो रेट घटाने पर
हमारा उद्देश्य मांग को बढ़ावा देना है और आप देखिए, वह होता दिख रहा है. पिछली दो-तीन तिमाहियों में उपभोक्ता खर्च के साथ-साथ ऋण वृद्धि और कर्ज की मांग में भी तेजी आई है.

रुपया कमजोर होने पर
हमारी एक स्पष्ट और स्थिर नीति है कि हम रुपए का स्तर बाजार की ताकतों को ही तय करने देते हैं. बहुत अस्थिरता वाली किसी स्थिति में ही हम दखल करते हैं.

बाजार के सवाल पर
दरअसल डिमांड ही निवेश की अगुआई करती है, उसे खींचकर लाती है, न कि निवेश डिमांड को. उपभोग चूंकि तेजी से बढ़ रहा है ऐसे में मुझे पूरा यकीन है कि निजी निवेश में अभी और इजाफा होगा.

बचत के सवाल पर
घरेलू बचत में आई गिरावट एक स्वस्थ बदलाव है. बचत करने वालों को ज्यादा ब्याज मिल रहा है जबकि कर्ज लेने वालों को कम ब्याज. यह दोनों के लिए फायदे का सौदा है.

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