● सत्यजित रे के लिए इतना कुछ रच पाना आखिर कैसे संभव हुआ?
टाइम मैनेजमेंट. दिन भर के एक-एक लम्हे का वे काम के लिए इस्तेमाल करते. सुबह 7-8 तक उठ जाते, सबसे पहले चिट्ठियों के जवाब लिखते. फिर अपनी पत्रिका संदेश के लिए इलस्ट्रेशन बनाते और दूसरे तयशुदा काम करते. फिर लिखने बैठते. लिखते बहुत तेजी से थे. दो दिन में एक कहानी और सात दिन में तो उपन्यास लिख डालते थे.
● आज अगर वे होते तो एक फिल्म के लिए किस तरह का मजमून चुनते?
खुद के दो-एक स्क्रीनप्लेज के अलावा ज्यादातर तो उन्होंने साहित्य से ही कहानियां लेकर फिल्में बनाईं. तो मेरा अंदाजा है कि वे फिर वहीं से लेते. किसी ज्वलंत सियासी मसले या अपने समय को संबोधित करते हुए फिल्म बनाने में उनकी दिलचस्पी नहीं थी. वजह? उनका मानना था कि कोई भी मुद्दा मानवीय रिश्तों के किस्से की पृष्ठभूमि के रूप में होना चाहिए.
● पिता के बारे में सोचने पर आपके दिमाग में उनकी किस तरह की छवियां उभरती हैं?
मेरी स्मृतियां तो अक्सर उन्हें काम पर देखने से ही जुड़ी हैं, या तो सेट पर या फिर एडिटिंग टेबल पर. उनके साथ के किसी भी व्यक्ति के लिए काम से इतर उन्हें याद कर पाना मुश्किल है. मुझे याद है, अपने लेखक पिता सुकुमार रे पर डॉक्युमेंट्री बनाते हुए अपनी पैदाइश वाले घर की शूटिंग के दौरान अंदर जाने से मना कर दिया. वे बोले, भीतर सब बदल गया है. मैं पुरानी स्मृतियों के साथ जीना चाहूंगा.
● अब किस पर काम कर रहे हैं?
कोलकाता के हालात (आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज प्रकरण संबंधी आंदोलन के बाद) को देखते हुए किसी नए फिल्म प्रोजेक्ट के बारे में सोचना बेमानी है. पर शायद मैं कुछेक कहानियों के आधार पर एंथोलोजी फिल्म बनाऊं. दर्शकों का अटेंशन स्पैन अब बहुत कम हो गया है. पूरी फिल्म देखने के दौरान वे फोन स्क्रोल न करें, मुमकिन ही नहीं. बेहतर हो कि तीसेक मिनट की शॉर्ट फिल्में बनाकर एक साथ बुन दें जिससे वे चुस्त बनी रहें.
—देवर्षि घोष

