
● भारत में राजमार्गों पर दुर्घटनाओं की समस्या कितनी गंभीर है?
समस्या बहुत, बहुत गंभीर है. हर साल 4.6 लाख दुर्घटनाएं होती हैं और 1.68 लाख मौतें. इस कारण हम एक अनुमान के हिसाब से देश की जीडीपी का कम से कम 3 फीसद गंवा रहे हैं. इन दुर्घटनाओं में करीब 33 फीसद से ज्यादा हमारे राष्ट्रीय राजमार्गों पर होती हैं. इनमें 60 फीसद मौतें 18 और 34 साल की उम्र के बीच के लोगों की होती हैं. यहां तक कि उग्रपंथी संगठनों के साथ मुठभेड़ में भी मौतों की संख्या काफी कम है. यहां तक कि हमने जो युद्ध लड़े हैं, उनमें भी इससे कम ही मौतें हुई हैं.
● किस कारण से मौतों की दर काफी ज्यादा है?
हमारे देश की एक अपनी समस्या है, जो दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में नहीं है. यहां न तो कानून का कोई सम्मान है और न ही उसका कोई डर. यह बहुत बड़ी समस्या है. हमने कई रोकथाम वाले उपाय किए हैं, जिनमें अनिवार्य तौर पर सीट बेल्ट लगाना, इलेक्ट्रॉनिक ब्रेकिंग सिस्टम वगैरह शामिल हैं. और उन्हें अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी और अन्य जरूरतों के अनुसार लागू किया जा रहा है. कारों के लिए हमने भारत न्यू कार असेसमेंट प्रोग्राम (एनसीएपी) शुरू किया है, जो उनके सुरक्षा प्रदर्शन के आधार पर स्टार रेटिंग देता है. इस स्टार रेटिंग के मुताबिक, अब वाहनों के लिए छह एयरबैग अनिवार्य हो गए हैं. हम बसों और ट्रकों के मामले में भी इसी तरह के कदम उठा रहे हैं.
● लेन डिसिप्लिन के पालन और लाइसेंस के मसलों पर क्या कहेंगे?
अनुशासन बरकरार रखना बहुत महत्वपूर्ण है. दुनिया भर में किसी भी जगह भारी वाहन एक ही लेन में चलते हैं लेकिन भारत में कोई इसका पालन नहीं करता. यह भी एक कारण है कि इस पैमाने पर दुर्घटनाएं होती हैं. यहां तक कि ऐसे लोग भी हैं जो राजमार्ग पर उलटी साइड में चलते हैं. दिल्ली-मेरठ हाइवे पर पिछले साल एक स्कूल बस टाइम बचाने के लिए रांग साइड से जा रही थी कि वह एसयूवी से टकरा गई और एसयूवी में बैठे परिवार के सभी छह लोगों की मृत्यु हो गई.
ऐसे हादसे तो सिर्फ समझदारी बढ़ाकर ही रोके जा सकते हैं. भारत में ड्राइविंग लाइसेंस को लेकर भी समस्या है. यहां यह बहुत ही आसान है जबकि अमेरिका में अगर आपको ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए तो आपको लिखित परीक्षा पास करनी होती है. डिजिटल टेस्ट होता है और आपको एक अच्छी-खासी मोटी किताब पढ़नी पड़ती है. परीक्षा पास करने के बाद ही आपको लाइसेंस मिलता है.
● भारत में लाइसेंसों के लिए ऐसे सख्त नियम क्यों नहीं लागू किए जा सकते?
भारत में मामला अलग है क्योंकि सड़क परिवहन समवर्ती सूची में है और कानून तथा सिस्टम के साथ समस्या है. कई ऐसी खामियां हैं, जिन्हें हमें और राज्यों को मिलकर दूर करना है. हमको सिस्टम ज्यादा ट्रांसपैरेंट, टाइमबाउंड और करप्शन फ्री बनाना होगा. हमने कानून बदले हैं और जुर्माना बढ़ाया है लेकिन लोग फिर भी नहीं समझ रहे. अब हम कई ड्राइवर ट्रेनिंग स्कूल खोल रहे हैं और कई कदम उठा रहे हैं.

फिर भी मेरी समस्या यह है कि इस देश के लोग सड़क नियमों के उल्लंघन के असर और इस कारण होने वाले जिंदगी के भारी नुक्सान को नहीं समझते. सो, जागरूकता पैदा करना जरूरी है. सबसे अहम बात यह आश्वस्त करना है कि हर आदमी कानून का सम्मान करे और सड़क के नियमों का पालन करे. यह बहुत बड़ी चुनौती है. आदमी का व्यवहार बदले बिना हम हालात नहीं बदल सकते.
● ऐसा लगता है कि कई हाईवे गलत तरीके से बनाए गए हैं, जो दुर्घटनाओं का एक कारण है?
हां, उचित और सटीक सड़क इंजीनियरिंग का इस्तेमाल करना बहुत ही महत्वपूर्ण है. हमने ब्लैकस्पॉट की पहचान की है और इन ब्लैकस्पॉट को ठीक करने के लिए 40,000 करोड़ रुपए के खर्च से एक योजना तैयार की गई है. अभी तक 10,000 से ज्यादा ब्लैकस्पॉट पता चले हैं, जिनमें से 6,500 को ठीक किया जा चुका है. लेकिन जब हम नई सड़क बना रहे होते हैं तो जो लोग विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करते हैं, वे लगातार गलतियां कर रहे हैं. यह उन वजहों में से एक है जिसके चलते हमें सड़क इंजीनियरिंग में सुधार की जरूरत है.
इससे निबटने के लिए हम कदम उठा रहे हैं. अगर कोई गलती होती है तो हम डीपीआर बनाने के लिए जिम्मेदार कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे. मेरी जिम्मेदारी यह आश्वस्त करना है कि सड़क परियोजनाओं की डीपीआर 100 फीसद दुरुस्त हो. यह बेहद जरूरी है कि दोषपूर्ण रोड इंजीनियरिंग के चलते कोई दुर्घटना नहीं होनी चाहिए.
● सड़क नियमों के सख्त पालन के बारे में क्या कहेंगे?
कानून पर अमल बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन यही बहुत बड़ी समस्या बना हुआ है. अब इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम होने से अगर आप कानून का उल्लंघन करते हैं तो कैमरा इसे पकड़ लेता है. हमें हर जगह के लिए पूरी तरह इंटेलिजेंट ट्रैफिक सिस्टम की जरूरत है जो लोगों में जागरूकता पैदा करे. लोगों को शिक्षित करना भी महत्वपूर्ण है, खास तौर पर स्कूलों में. देश के लिए अब यह तय करने का समय आ गया है कि राज्य सरकारें छात्रों को स्कूलों में सड़क सुरक्षा और सड़क नियमों के महत्व के बारे में पढ़ाए जाने की व्यवस्था करें.
● एक अन्य मसला एंबुलेंस और घटनास्थल पर वक्त पर पहुंचने के बारे में है, जिसे गोल्डन आवर कहा जाता है. उसे सुधारने के लिए क्या किया गया है?
हमने एंबुलेंस की स्थिति में सुधार किया है और राज्य सरकारों के साथ काम कर रहे हैं. हमने 110 नंबर शुरू किया है और यह आश्वस्त भी किया है कि अगर इसे डायल किया जाता है तो एंबुलेंस 15 से 20 मिनट के भीतर मौके पर पहुंच जाए. लेकिन समस्या यह है कि अगर दुर्घटना में कार या बस शामिल है और वाहन की हालत ऐसी है कि उसे खोलने के लिए काटना पड़ेगा तो उसके लिए हमारे पास उपकरण नहीं हैं. हमने टोल प्लाजा के लिए दो बातें अनिवार्य की हैं—एक क्रेन और एक एंबुलेंस. नई संहिता यह तय करेगी कि एंबुलेंस में वेंटिलेटर लगे हों, अन्य आवश्यक चिकित्सा उपकरण हों और एक प्रशिक्षित कंपाउंडर हो जो सैलाइन चढ़ा सके और अन्य जरूरी उपचार कर सके. साथ ही उनके पास वाहन को काटने के लिए इंजीनियरिंग औजार भी होंगे.
● सड़क दुर्घटना के पीड़ितों के इलाज के लिए क्या ट्रॉमा केयर अस्पतालों की कमी है?
हमने कुछ ट्रॉमा सेंटरों की योजना बनाने की कोशिश की थी लेकिन यह विषय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत आता है तो उस समय यह पहल रोक दी गई. हम तो अब भी कह रहे हैं कि ऐसे ट्रॉमा सेंटर बनाने के लिए हम हाइवे पर मुफ्त में जमीन देंगे.
● इन ट्रॉमा सुविधाओं को टोल प्लाजा कंशेसनेयर की साइट पर ही क्यों नहीं शामिल किया जा सकता?
यह एकदम अलग विषय है क्योंकि हमें विशिष्ट बुनियादी ढांचे, स्टाफ, डॉक्टर और अन्य संसाधनों की जरूरत है, जो मेडिकल साइंस के तहत आते हैं. इस कारण से हमें अस्पतालों की मंजूरी की जरूरत है और यह बहुत महत्वपूर्ण है. सबसे अच्छा नजरिया जिस पर हम विचार कर रहे हैं, वह यह तय करना है कि हर किसी को यह पता हो कि किसी जगह से सबसे नजदीक का ट्रॉमा सेंटर कहां पर है.
दूरी निर्धारित होगी और एंबुलेंस 15 से 20 मिनट के भीतर मरीज को अस्पताल ले जाएगी. इसके साथ ही रोड साइड सुविधाओं के हिस्से के रूप में एअर और हेलिकॉप्टर एंबुलेंस के भी प्रस्ताव हैं. इनमें घायल को सीधे और तुरंत अस्पताल पहुंचाने के लिए हेलिपैड शामिल होगा. हम 670 रोड साइड सुविधाएं विकसित कर रहे हैं जो 50 से 60 हेक्टेयर के दायरे में हैं और उनमें आपात स्थिति में लाने-ले जाने के लिए हेलिपैड का प्रावधान होगा.
● आप जीरो फैटलिटी कॉरिडोर्स की भी योजना बना रहे हैं?
हम रोड सेफ्टी ऑडिट कर रहे हैं जिससे यह पता चले कि दुर्घटनाओं की असली वजह क्या है और हमारे हिस्से की कोई गलती है तो उसे ठीक किया जा सके. हमने एक स्पेशल कोर्स शुरू किया है और इंजीनियरिंग कॉलेजों को जोड़ रहे हैं, खास तौर पर सिविल इंजीनियरिंग विभागों और आईआईटी को. हम उन्हें सिलेबस दे रहे हैं और अनुरोध कर रहे हैं कि छात्रों से सड़क सुरक्षा की जांच कराएं. अभी तक हमने 20 सड़कों की ऑडिट पूरी की है और इन निष्कर्षों के आधार पर हम सुधार कर रहे हैं. हमारा लक्ष्य हर राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए रोड सेफ्टी ऑडिट करना है.
● भारत 2030 तक सड़क दुर्घटना में मौतों को आधा करने के वैश्विक मिशन में एक पार्टी है. हर कुछेक साल बाद यह लक्ष्य और आगे खिसका दिया जाता है. मौजूदा स्थिति क्या है?
मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने लक्ष्य तय किया. हर दूसरे मसले पर हमारी सफलता की कहानियां हैं लेकिन जहां तक इस मसले का मामला है, मैं मानता हूं कि हमने लक्ष्य हासिल नहीं किया है. हम लोगों को यह नहीं बताना चाहते कि हमारी गलती नहीं है. हम जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं. मैं इस विषय को बहुत गंभीरता से लेता हूं और अगर कोई समस्या बताता है तो हम उसे दूर करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
—अभिषेक जी. दस्तीदार

