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"तबला फील्ड ने भी आज जेंडर दायरा तोड़ दिया है"

पुणे की युवा तबलावादक सावनी तलवलकर ने उस्ताद जाकिर हुसैन के सामने बजाने, जेंडर दायरे और संगीत में सोशल मीडिया पर इंडिया टुडे से बातचीत में क्या बताया

सावनी तलवलकर, युवा तबलावादक
सावनी तलवलकर, युवा तबलावादक
अपडेटेड 12 सितंबर , 2024

11 अगस्त की शाम पुणे में एकल वादन का नायाब मौका आप तक आया कैसे?

गुरु पूर्णिमा का प्रसंग था. अब्बाजी यानी उस्ताद अल्लारक्खा की स्मृति में प्रति वर्ष मुंबई में समारोह आयोजित होता है. गए बरस ही फजल (कुरैशी) भाई ने 2024 को पड़ने वाले गुरु पूर्णिमा समारोह के लिए तैयार रहने को कह दिया था. उस साल एकाधिक महिला कलाकारों ने बजाया था. इस वर्ष मेरी हाजिरी लगी. गुरुओं का पुण्य प्रताप ही मानती हूं इसे मैं.

आम धारणा है कि महिला होने के नाते बजाने के मौके मिल जाते हैं. क्या कहेंगी?

मेरे पिताजी (पं. सुरेश तलवलकर) ने न कभी प्रमोट किया और न उनसे उम्मीद की जा सकती है. उनका सिद्धांत है: अपनी कला के बलबूते पर अपना संसार खड़ा करो. उन्होंने आज तलक कितनों को तैयार किया होगा. मेरा स्ट्रगल मेरा अपना है. जो दर्जेदार नतीजा देगा वही उभरकर आएगा. संगीत में कॉपी-पेस्ट नहीं चलता!

● सभागार में जब दिग्गज उस्ताद जाकिर हुसैन के साथ पिता-गुरु पं. सुरेश तलवलकर सहित पं. आनिंदो चटर्जी के अलावा योगेश शम्सी जैसे वादक सामने बैठकर ताल देते सुनने लगें तो बजाना कितना आसान और कितना मुश्किल होता है?

अच्छा-बुरा अलग बात है. जब ऐसे साधक सम्मुख हों तो बजाना ही अपने आप में एक सबक है. तैयारी तो यकीनन मैंने कर रखी थी, लेकिन मंच पर जो बात निकलकर आनी है, वही आती है. नॉर्मल रूटीन में बजाना और असाधारण मौकों पर, प्रेशर तो बड़ा होता है. मैं भी अंडर प्रेशर थी. फिर भी पिता की तालीम का असर कहिए कि एक बार नगमा कानों में पड़ते ही मैं अपने में एकाग्र हो जाती हूं. आप कितने काबिल हैं? सही मायनों में तभी पता लगता है! मेरे लिए सीखने की एक और घड़ी थी उस रोज.

कभी कभी ऐसा लगता है क्या कि तबला भी सुनने की कम, देखने की चीज ज्यादा हो रहा है? क्या इसे सोशल मीडिया का असर कहें कि दिखने के प्रति वादक अब पहले से अधिक चौकस हुए हैं?

सभी को तो मौके मिल नहीं सकते. सोशल चौपाल ने दरवाजे खोल दिए हैं. अब पहुंच सीधी हो गई है. लोकप्रियता मिल रही है. बढ़िया जरिया है खुद को प्रमोट करने का. पहचान होने से बुलावे भी आते हैं. कद्रदान सुनकर सीधे तय कर लेते हैं, और क्या चाहिए. प्रदर्शन अब नवाचार भी बनने लगा है. यदि खुद के दिखने को लेकर कलाकार सतर्क हुए हैं तो इसे मैं अच्छा बदलाव मानती हूं.

देश में इस समय महिला शास्त्रीय वादक तेजी से सामने आ रही हैं. कभी इन सभी को जोड़ कर समारोह या सिंपोजियम होना चाहिए. क्या सोचती हैं आप इस ख्याल पर?

एक बार महिला वादकों पर एकाग्र समारोह तो हुआ था लेकिन उसमें और भी लय वाद्य थे. तबले में, खासकर महिला कलाकारों को एकत्र किया जाना सुंदर विचार है, ताकि पता लगे कि इस फील्ड ने भी आज जेंडर दायरा तोड़ दिया है. अब हम सब एक हैं और सिर्फ कलाकार हैं.

—राजेश गनोदवाले.

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