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''सरकार का जोर ज्यादा रोजगार देने वाली ग्रोथ पर है''

केंद्रीय वित्त सचिव डॉ. टी.वी. सोमनाथन 2024 के बजट में रोजगार सृजन और कौशल के भारी-भरकम नए पैकेजों के लिए जिम्मेदार प्रमुख व्यक्तियों में से एक हैं. उन्होंने इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा के साथ खुलकर बात की कि इसकी परिकल्पना कैसे की गई और आगे क्या चुनौतियां हैं. पेश हैं संपादित अंश

डॉ. टी.वी. सोमनाथन, केंद्रीय वित्त सचिव
डॉ. टी.वी. सोमनाथन, केंद्रीय वित्त सचिव
अपडेटेड 7 अगस्त , 2024

प्र. बजट में रोजगार और कौशल विकास पर दिए गए जोर को आप कैसे देखते हैं?

रोजगार के लिए राजकोषीय प्रोत्साहन ऐतिहासिक रूप से कई देशों में कारगर रहे हैं और उन्हें एक मौका देना चाहिए. इसमें यह सुनिश्चित करने पर नवोन्मेषी जोर दिया गया कि भारत की वृद्धि ज्यादा रोजगार-सघन हो. यह इसलिए भी बहुत बड़ी कोशिश है क्योंकि इससे हमारे 4 करोड़ युवाओं को मदद मिलने की उम्मीद है. हम छोटे-मोटे बदलाव की बात नहीं कर रहे हैं, हम इसमें 2 लाख करोड़ रुपए लगा रहे हैं. यह नवोन्मेषी है क्योंकि इन योजनाओं का कोई जस-का-तस समानांतर उदाहरण नहीं है, खासकर निजी क्षेत्र की भागीदारी और इन सारी सब्सिडी को निवेश या उत्पादन के बजाय रोजगार से जोड़ने के मामले में. 

• इसके पीछे फलसफा क्या है, यह कैसे निकला?

हमारी जनसांख्यिकी और खासकर युवाओं की आबादी में आए उभार को देखते हुए अगले कुछ सालों में रोजगार बेहद अहम होगा. युवाओं की बहुत बड़ी तादाद नौकरियों के बाजार में दाखिल होगी. अब सरकार इस मामले में दो काम कर सकती है. वृद्धि को बढ़ावा दे क्योंकि बढ़ती अर्थव्यवस्था का मतलब ज्यादा नौकरियां है. हमने यह विवेकपूर्ण राजकोषीय नीति, पूंजीगत निवेश में बढ़ोतरी, और निवेश को बढ़ावा देने वाले विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए किया. मगर यह भी तथ्य है कि आधुनिक समय में मशीनीकरण, ऑटोमेशन और टेक्नोलॉजी के दूसरे विकासक्रमों के कारण कम रोजगार के साथ भी वृद्धि हो सकती है.

दूसरा है नौकरियों के सृजन के लिए रोजगार से जुड़े प्रोत्साहनों पर जोर देना. लेकिन कंपनियां किसी को सिर्फ इसलिए रोजगार नहीं देंगी क्योंकि सरकार सब्सिडी दे रही है. मगर आगे का सोचें तो उनके फैसले राजकोषीय प्रोत्साहनों से प्रभावित होते हैं. इसलिए अगर कोई लोगों को रोजगार देने की योजना बना रहा है तो एक अवधि के दौरान सब्सिडी का प्रावधान उन्हें कर्मचारियों की भर्ती को बढ़ाने और तेज करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है. ज्यादा ऑटोमेशन और मशीनीकरण बनाम श्रम के ज्यादा इस्तेमाल को लेकर हमेशा बढ़ते विकल्प होते हैं. ऐसी स्थिति में हम राजकोषीय प्रोत्साहनों का पैकेज लेकर आए जो ज्यादा रोजगार की दिशा में कंपनियों के विकल्पों को प्रभावित करेगा.

• नए भर्ती लोगों के ईपीएफओ में नामांकित होने के बारे में क्या कहेंगे, ''प्रधानमंत्री चाहते थे कि हम रोजगार को प्रोत्साहन देने में प्राइवेट सेक्टर को साथ लें लेकिन बिना किसी अनिवार्यता के'' नौकरियों को औपचारिक दायरे में लाने का कदम है?

हमें यह जानने के लिए एक तंत्र की जरूरत थी कि नौकरी का सृजन वास्तविक है या नहीं. ईपीएफओ से जोड़ने की वजह केवल धोखाधड़ी को रोकना है. इस पहले हिस्से में जो स्कीम ए है, उसमें धन सीधे रोजगार पाने वाले को मिलेगा. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए स्कीम बी है. उद्योग कम से कम 50 नए लोगों को रोजगार देता है, तो हम उन्हें अच्छी सब्सिडी देंगे जो चार साल चलेगी. यहां तर्क यह है कि कंपनी इन कई बेरोजगार/अनुभवहीन लोगों को लेने की परेशानी उठा रही है. हो सकता है उन्हें इन लोगों को मानक स्तर तक लाने के लिए ट्रेनिंग देनी पड़े. यह ऐसी चीज है जिसके बदले सब्सिडी देना सरकार को पसंद है.

• शीर्ष कॉर्पोरेट कंपनियों में इंटर्नशिप योजना के पीछे क्या है?

इंटर्नशिप योजना उन अप्रेंटिसशिप मॉडल योजनाओं पर आधारित है जो हम अप्रेंटिसशिप अधिनियम के जरिए चलाते है, लेकिन जो पूरी तरह स्वैच्छिक हैं. यहां इरादा साधनहीन वर्ग के उन लोगों के लिए पुल बनना है जिन्होंने योग्यता तो हासिल की है पर जिन्हें निजी क्षेत्र की हमारी बड़ी कंपनियों तक पहुंच हासिल नहीं है या जो उनमें करियर के बारे सोच तक नहीं सकते. हम उन टॉप 500 कंपनियों की तरफ देख रहे हैं जिन्हें कंपनी कानून के तहत अपने मुनाफों का 2 फीसद सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) कार्यक्रमों पर अनिवार्य रूप से खर्च करना है.

हम उन्हें ऐसे लोगों की सूची भेजेंगे जो कम रोजगारयोग्य हैं, जिन्हें उद्योग अपने आप नहीं चुनेगा. यह इरादतन है. ये इंटर्न ऐसे लोग हैं जिन्हें एक्सपोजर की जरूरत है. हम 12 महीने तक उनके 90 फीसद स्टाइपेंड का भुगतान करेंगे. कंपनी को बेशक इस व्यक्ति को किसी ऐसे काम में हुनरमंद बनाने की लागत वहन करनी होगी जिससे वह जुड़ा है. हम पहले चरण में करीब 30 लाख और दूसरे चरण में करीब 70 लाख इंटर्नशिप का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं.

• नई सीएसआर योजनाओं को क्या पहले कहीं आजमाया गया है?

यह भारतीय प्रयोग है. लेकिन यह उन अप्रेंटिसशिप से प्रेरित है जो भारत में और कई विकसित देशों में हैं. मगर कानूनी व्यवस्था के जरिये सीएसआर योजना लगभग अनोखे ढंग से भारतीय है. सीएसआर योजना लोगों को अच्छे नियोक्ताओं के साथ नौकरी करते हुए अनुभव हासिल करने का मौका देने के लिए भी है. एक और फायदा यह है कि हमारा वास्ता भारत की शीर्ष कंपनियों के साथ होगा, जहां धोखाधड़ी या प्रशिक्षण के ढोंग की गुंजाइश कम होगी, क्योंकि उन्हें अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करनी है. अगर वे कुछ करने को राजी होती हैं, तो वे शायद इसे अच्छी तरह करेंगी.

• इस नीति का निर्देश कहां से आया?

प्रधानमंत्री काफी समय से इस बारे में बात कर रहे थे. हमारा एक काम यह था कि कौशल विकास के बारे में कुछ अर्थपूर्ण करें ताकि हम निजी क्षेत्र को तत्परता से भी और स्वेच्छा से भी शामिल करके रोजगार को बढ़ावा दे सकें. उनके लिए कोई बाध्यता नहीं होनी चाहिए थी.

• तो क्या यह रोजगार सृजन की दिशा में बड़ी छलांग है?

अर्थशास्त्री होने के नाते मैं कहूंगा कि निजी क्षेत्र की मदद के लिए सरकार जो कर सकती है, उसमें यह भारत के लिए आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका है. हम ऐसे नॉन-जॉब्स (गैर-नौकरियों) का सृजन करना नहीं चाहते जिनका वजूद केवल सरकार की वजह से हो. हम असल नौकरियां चाहते हैं, जहां निजी क्षेत्र इसलिए एक व्यक्ति को रोजगार देगा क्योंकि वे देना चाहते हैं. और हम क्या कर रहे हैं? हम मदद कर रहे हैं. 

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