● आपने तीसेक साल बाद बड़ी कास्ट का कोई नाटक निर्देशित किया है. वह भी एनएसडी के स्टुडेंट्स के लिए.
जी. 1995 बैच के साथ एडवर्डो फिलिपो का एक प्ले रानी सेठानी नाम से किया था. इस बार थर्ड ईयर के साथ एंटन चेखव का थ्री सिस्टर्स किया. स्टुडेंट्स को अंदेशा था: 3.30 घंटे का प्ले! मैंने कहा, भूल जाओ ऑडियंस को. अपने लिए करो. यह नाटक मनुष्य जीवन को एक गरिमा देता है. आशाओं और संभावनाओं की बात करता है. इसने जीवन के प्रति खुद स्टुडेंट्स के नजरिए को भी बदल दिया.
● कश्मीर की मशहूर रहस्यवादी कवयित्री लल देद पर सोलो प्ले आप लंबे समय से करती आ रही हैं.
उनमें मेरे प्राण बसते हैं. इस साल दिसंबर में उस प्ले को करते हुए इक्कीसवां साल होगा. फिर पूरे साल देश भर में उसके शो और उनके वाख यानी कश्मीरी में लिखे पद्य पर वर्कशॉप करना चाह रही हूं. उन पर बनाई फिल्म भी दिखाना चाहती हूं. कोशिश है कि 21वें साल पर लल देद को सेलिब्रेट किया जाए.
● सिनेमा और ओटीटी में सक्रिय रहने के बावजूद थिएटर के लिए आप वक्त निकाल रही हैं. पर नया क्या करने की योजना है?
मैं नाटक पर थोड़ा और जोर देना चाहती हूं. हिंदी के कुछ सुंदर नॉवेल्स को स्टेज पर लाना चाहती हूं. कृष्णा सोबती के दो नॉवेल अरसे से लिए बैठी हूं: ऐ लड़की और सूरजमुखी अंधेरे के. बार-बार पढ़ने के बावजूद ये मेरे लिए बासी नहीं हुए हैं, यानी उन्हें करना मेरे अपने लिए जरूरी है. थोड़ा-थोड़ा काम कर भी लिया है.
● आप हमेशा एक कंफर्ट जोन में रहती हैं. जैसे अपने ही भीतर कुछ खंगाल-तराश रही हैं. बाहर को लेकर बहुत फिक्र नहीं.
मुझमें उस किस्म का एंबिशन नहीं है. मैं शुरू से क्लियर थी कि प्रोफेशनल नेम-फेम आए तो अपने उसूलों पर. शुरू में कुछ लोगों ने सब्जबाग दिखाए पर मैं वहां से पतली गली से कट लेती थी. मैंने मुंह पर फिल्में मना की हैं. मजबूरी में कुछ नहीं किया.
● एनएसडी में पढ़ाई के दौरान इरफान आपके बैचमेट थे. उन्हें गए चार साल हो गए. कितना याद आते हैं अब वे?
उन दिनों हम खूब झगड़ते थे. वे मेरी चोटी खींचते रहते थे. कोरोना में उनकी डेथ पर हम मुंह ढककर उनके फ्यूनरल में गए थे. एक्चुअली जहां उनकी कब्र है, मेरा घर वहां से पास में ही है. आते-जाते मैं अक्सर उनसे बातें करती हूं (हंसते हुए), 'क्या चल रहा है? कैसा है तू?’ पता है कि दीवार के उधर उसकी कब्र है.

