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"पूर्णिया छोड़ना मेरे लिए आत्महत्या के बराबर है"

पूर्णिया से चुनाव लड़ने पर लालू यादव के रुख से लेकर प्रदेश कांग्रेस के रवैये जैसे अनेक मसलों पर पप्पू यादव ने विशेष संवाददाता पुष्यमित्र के सवालों का बेबाकी से जवाब दिया

पूर्णिया से निर्दलीय लोकसभा प्रत्याशी पप्पू यादव
पूर्णिया से निर्दलीय लोकसभा प्रत्याशी पप्पू यादव
अपडेटेड 16 अप्रैल , 2024

पूर्णिया की जिद क्यों? आपका घर तो मधेपुरा है, वहां से क्यों नहीं?

पूर्णिया से हम चार बार सांसद रहे. पूर्णिया ने मुझे कभी हराया नहीं. पूर्णिया मेरी जन्मभूमि है और कर्मभूमि पूर्णिया ही रही. मधेपुरा जरूर मेरा घर है. 1991 में हम पूर्णिया से पहली बार एमपी बने. मेरी गैरहाजिरी में मेरी मां ने पूर्णिया से निर्दलीय चुनाव लड़ा और 32 हजार से भी कम वोट से हारीं. पिछली बार मैं पूर्णिया से मधेपुरा इसलिए गया क्योंकि मेरी पत्नी कांग्रेस में हैं और पूर्णिया से कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे. राजद कभी पूर्णिया में सफल नहीं हुआ, कभी वहां उनका कोई मजबूत प्रत्याशी नहीं था.

आपका तीस साल का राजनैतिक करियर है. मगर पार्टियां, खास कर राजद आपसे परहेज करता रहा.

मेरा तीस नहीं, चालीस साल का पोलिटिकल करियर रहा है. अस्सी के दशक में ही मैं मुखिया बन गया था. जहां तक राजद की बात है तो 1990 में लालू को मुख्यमंत्री बनाने में मैं बेटे की तरह खड़ा रहा. मगर अपने देश में पार्टियां नेता केंद्रित रही हैं. उनमें कोई नया विचार नहीं पनपता. कांग्रेस को छोड़ दें, जो विविधताओं वाली पार्टी है, तो सबका यही हाल है. भाजपा भी अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पार्टी हो गई है. जद (यू) नीतीश कुमार की पार्टी हो गई है.

जन अधिकार पार्टी के तहत आपने पूरे बिहार में सक्रियता दिखाई, मगर पार्टी बहुत सफल नहीं हो पाई.

हमारा दुर्भाग्य है कि हिंदी पट्टी में जात-पात, हिंदू-मुसलमान, बैकवर्ड-फॉरवर्ड की राजनीति होती है. यही पप्पू यादव दक्षिण भारत में होता तो उसे नायक की तरह पूजा जाता. वहां काम के दम पर नेता और पार्टी को पहचान मिलती है. हमने कितनी सेवा की हर मौके पर. मगर हमारे उम्मीदवारों को पांच-छह हजार वोट मिलते हैं. कोरोना में, पटना बाढ़ में मेरी सेवा का मुझे क्या इनाम मिला. मेरी छोड़िए, ईरोम शर्मिला का क्या हुआ, उनको कितने वोट मिले.

कांग्रेस बिहार में आपको भविष्य के नेता के तौर पर देख रही है.

यह जरूर है कि टाइटल के तौर पर मेरे नाम में यादव लगा है इसलिए मुझे ओबीसी का नेता समझ लिया जाता है. मगर हम हर जाति, हर समाज के बीच सक्रिय रहे हैं. जब कोरोना में सबने अपनों को छोड़ दिया तो हमने सबको अपना रिश्तेदार बनाया था. लालू जी से मैंने कहा कि हम दोनों मिलकर बिहार में भाजपा को हराएंगे. मगर न जाने क्यों वे मेरी बात नहीं समझ पाए. मैंने पूर्णिया में छह-सात महीने से प्रणाम पूर्णिया, सलाम पूर्णिया और जोहार पूर्णिया का अभियान चला रखा है. एक बड़ी रैली भी हुई, जिसमें दो-ढाई लाख लोग पहुंचे.

मैंने उनसे कहा कि मैं पूर्णिया से लड़ना चाहता हूं, तो उन्होंने कहा कि अपनी पार्टी राजद के साथ मर्ज कर लो और मधेपुरा से लड़ जाओ. फिर मैंने कहा, पार्टी मर्ज करने में दिक्कत नहीं. लेकिन मधेपुरा नहीं पूर्णिया दे दीजिए. मैंने कल भी लालू जी से कहा कि मुझे पूर्णिया दे दीजिए. बीमा भारती को कोई और सीट दे दीजिए मेरे लिए पूर्णिया छोड़ने का मतलब है, आत्महत्या कर लेना. मैंने कहा था, दुनिया छोड़ देंगे, पूर्णिया नहीं छोड़ेंगे. कांग्रेस में शामिल होने के लिए मेरे पास प्रियंका जी का फोन आया था. राहुल गांधी जी का जितना स्नेह और सम्मान मुझे मिला है, उसका मैं सौदा नहीं कर सकता. मेरा स्वभाव सौदेबाजी का नहीं है. प्रियंका जी, राहुल जी का आदेश मेरे लिए सब कुछ है. 

कहा जा रहा है कि कांग्रेस की प्रदेश इकाई आपके आने से सहज नहीं है.

90 फीसद लोग मेरे समर्थन में हैं. कुछ नासमझ हैं, मुझसे सहमत नहीं हैं. तो उनका क्या किया जा सकता है. 

क्या ऐसे लोगों की वजह से आपको कांग्रेस में टिकने में दिक्कत होगी?

हमको किसी से क्या दिक्कत होगी. पूरे देश और दुनिया को पप्पू से दिक्कत है. जब ओखली में सिर दे दिया तो डर कैसा.

आप चुनाव लड़ेंगे, आपको जीतने की कितनी संभावना लग रही है.

जब पप्पू यादव पूर्णिया से निर्दलीय लड़कर जीतता रहा है तो इस बार तो पूरे देश का फोकस पप्पू यादव और पूर्णिया पर है. कांग्रेस का साथ है. कैसे नहीं जीतेंगे. पूर्णिया के बीस लाख लोगों का आशीर्वाद मेरे साथ है.

अगर कांग्रेस का साथ नहीं मिला तो...

ऐसा अभी हम नहीं सोचते. मुझे लगता है कांग्रेस का साथ मुझे जरूर मिलेगा.

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