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"भाजपा में किसी की कोई दावेदारी नहीं होती"

पिछले साल दिसंबर में मध्य प्रदेश के बतौर मुख्यमंत्री शपथ लेेने वाले मोहन यादव से इंडिया टुडे के संपादक सौरभ द्विवेदी ने कई मुद्दों पर बातचीत की. पेश है उस इंटरव्यू के संपादित अंश

इंटरव्यू के दौरान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की तस्वीर
इंटरव्यू के दौरान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की तस्वीर
अपडेटेड 13 मार्च , 2024

मोहन यादव. मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश शासन. उज्जैन दक्षिण से विधायक अब किसी पहचान के मोहताज नहीं. इसलिए भी कि जब 11 दिसंबर, 2023 को भोपाल स्थित भाजपा मुख्यालय में उनके नाम का ऐलान हुआ, तब वे मध्य प्रदेश के भीतर और बाहर, भारी जिज्ञासा का केंद्र बन गए थे. 'कौन हैं? कहां से हैं? इन्हीं को मुख्यमंत्री क्यों बनाया गया', ऐसे सवालों पर लंबे-लंबे लेख छप चुके हैं.

लंबी बातचीत के दौरान वे इस बात से इनकार नहीं करते कि उन्हें मुख्यमंत्री आलाकमान ने बनाया. लेकिन इसी बातचीत के दौरान यह संकेत भी देते रहते हैं कि वे अपने पद को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं. श्यामला हिल्स पर टिके रहने को लेकर जैसी अनिश्चितता शिवराज के सामने पूरे पौने चार साल रही, वैसी मोहन यादव के सामने नहीं है.

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अपने निर्देशों में इतना स्पष्ट रहा है कि कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर और प्रह्लाद पटेल जैसे दिग्गजों ने नियति को स्वीकार कर लिया. कहीं कोई किंतु-परंतु, कोई चूं-चपड़ नहीं. सबको शांत रहना है, यही पार्टी अनुशासन का तकाजा है. और मोहन यादव इसी शांति के बीच खुद को बतौर मुख्यमंत्री स्थापित कर रहे हैं. मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री कार्यालय में हर ओर आपको नए चेहरे दिखते हैं.

बरसों से जमे नौकरशाह उन्हें हल्के में न लें, इसे पक्का करने के लिए तहसीलदार से लेकर एसडीएम और एसपी से लेकर जिलाधिकारी तक के तबादले हुए हैं, सीधे मुख्यमंत्री के निर्देश पर. यही संदेश, ऐसी ही नसीहत कैबिनेट मंत्रियों को भी है पर थोड़ा अलग ढंग से. स्टाफ मुख्यमंत्री की मर्जी से ही नियुक्त हो रहा है.

लेकिन जैसे-जैसे मोहन यादव कुर्सी पर जमते जाएंगे, उन पर प्रदर्शन का दबाव भी बढ़ता जाएगा. उनकी पहली चुनौती है 2024 का लोकसभा चुनाव. प्रदेश की 29 सीटों में से 28 भाजपा के पास है, सो वह आश्वस्त है. बची छिंदवाड़ा सीट, जिसे हासिल करने की कुंजी खोजना उनकी पहली बड़ी परीक्षा होगी. कैसे करेंगे? इस पर वे साफगोई से कहते हैं, "मेरा ध्यान कमल पर है, कमलनाथ पर नहीं." लेकिन किसी संभावना से इनकार भी नहीं करते.

लोकसभा चुनाव के बाद यादव को तसल्ली के साथ अपने सूबे पर ध्यान देना होगा. सरकारी नियुक्तियों को लेकर असंतोष गया नहीं है. शिक्षक वेतन मांग रहे हैं. प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर उनके सूबे में औद्योगिक विकास थम-सा गया है.

वे इस तस्वीर को बदल पाए, तब कहीं जाकर हिंदी पट्टी में उनके नाम का वैसा इस्तेमाल हो पाएगा, जिसके बारे में लंबे-लंबे संपादकीय लिख दिए गए हैं. इंडिया टुडे के संपादक सौरभ द्विवेदी से उज्जैन और भोपाल में बातचीत में मुख्यमंत्री मोहन यादव बता रहे हैं कि कैसे वे इस चुनौती से पार पाएंगे:

आपको कब पता चला कि आप मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं?

मैं तो शिक्षा मंत्री के तौर पर अपना काम करता रहा. चुनाव भी पूरे दम खम से लड़ा और जीते. बल्कि जिस दिन घोषणा हुई उस दिन भी मैं अंतिम पंक्ति में बैठा था. मेरे मन में तो बस इतना था कि पार्टी जो जिम्मेदारी दे, उसे हमेशा की तरह पूरी ईमानदारी से निभाना है.

विद्यार्थी परिषद के दिनों में जे.पी. नड्डा से आपकी मित्रता और अमित शाह से पुरानी करीबी को भी वजह बताया जाता है...

मुझे नहीं लगता. नड्डा जी की विशेषता है कि जो संगठन की लाइन होती है उससे इतर उनकी लाइन नहीं होती. मुझे नहीं लगता उन्होंने मेरे लिए पार्टी लाइन से अलग कोई बात रखी होगी, उनका प्रेम और स्नेह हमेशा मिलता रहा है मुझे. अमित शाह जी से तो कभी मेरा करीबी संबंध रहा ही नहीं. जब मैं मंत्री था तब भी और अब जब मुख्यमंत्री हूं तब भी केवल काम की बातों का संबंध रहा. उनके लिए सम्मान और प्रेम हमेशा से दिल में है.

मध्य प्रदेश में प्रभारी रहे दो मंत्रियों भूपेंद्र यादव और अश्विनी वैष्णव ने पीएम मोदी और अमित शाह के सामने आपके नाम की पैरवी की?

उसका मुझे पता नहीं. मैंने पहले भी कहा कि जब घोषणा हुई तो मैं अपने विधायक मित्रों के साथ बैठा हुआ था. बल्कि जब घोषणा हुई तो मुझे तो विश्वास भी नहीं हुआ. जब मंच से कहा गया कि आप ही को बुला रहे हैं तब उठकर गया. मुझे यह सब न पहले मालूम था न आज मालूम है. इतना मालूम है कि पार्टी ने जो जिम्मेदारी दी उस पर पूरी तरह से खरा उतरना है.

लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आशीर्वाद भरपूर रहा...

हां, मुझे इस बात का गर्व है कि मैं संघ का स्वयंसेवक हूं. बाल्यकाल से लेकर आज तक हमारा संघ परिवार सदैव हर मामले में मदद करता रहा है. उनका भाव हमेशा यह रहता है कि पद तो आते हैं जाते हैं, लेकिन कार्यकर्ता की सफलता में संघ की सफलता है.

लेकिन विद्यार्थी परिषद में राष्ट्रीय स्तर का दायित्व संभालने से लेकर चुनावी राजनीति की शुरुआत तक बहुत लंबा इंतजार नहीं करना पड़ा?

मेरे साथ के लोग राष्ट्रीय स्तर पर काम कर रहे थे, मैं तब भी जमीनी स्तर पर काम कर रहा था. राजनीति की तमाम बारीकियां भी इसी कारण समझ सका. जो काम मिला उसे पूरे मन से करने की आदत शुरुआत से रही है. 2003 में बड़नगर से टिकट मिला. सारी तैयारी हो चुकी थी लेकिन फिर संघ के स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने समझाया कि शांतिलाल जी आपसे उम्र में बीस साल बड़े हैं उनको चुनाव लड़ना चाहिए, तो मैंने फिर टिकट पार्टी को लौटा भी दिया.

उसके बाद सीधे 2013 में टिकट मिला. 2008 में टिकट न मिलने की क्या वजह रही?

2008 में टिकट मिलना लगभग तय था. फिर परिस्थिति कुछ ऐसी बनी कि 2003 में जिन्हें टिकट मिला था उन्हें ही टिकट मिलने की बात फाइनल हो गई तो मुझे मिला नहीं. शायद यह वजह रही होगी कि तब तक प्रदेश नेतृत्व में स्थिरता नहीं आ पाई थी. तो सोचा गया होगा कि जो व्यवस्था जमी हुई है कम से कम उसे न छेड़ा जाए. हालांकि मुझे मध्य प्रदेश पर्यटन निगम का अध्यक्ष बनाया गया और मैंने पूरी कर्मठता से वह जिम्मेदारी निभाई.

चर्चा यह भी होती है कि पर्यटन निगम की जिम्मेदारी दिलवाने के लिए संघ से सुरेश सोनी ने शिवराज सिंह चौहान पर दबाव बनाया.

नहीं, ऐसा तो नहीं था. सुरेश जी भाई साहब इन मामलों में दखल देने वालों में से नहीं हैं. मुझे तो टूरिज्म के साथ अपेक्स बैंक का अध्यक्ष बनने का भी विकल्प दिया गया था. हाउसिंग बोर्ड के लिए भी कहा गया लेकिन मैंने ही कहा कि प्राधिकरण का काम इतने सालों तक देख लिया, अब भवन निर्माण के काम में नहीं लगे रहना चाहता.

एक समय सिंहस्थ कुंभ के लिए तय जमीनों को लेकर आप पर आरोप लगे.

देखिए, मैं कॉलेज जीवन से अपना स्वतंत्र व्यवसाय करता रहा हूं. कठिन परिस्थितियों से निकलने की वजह से हमेशा दिमाग में यह रहा कि किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना है. जो किया पूरी ईमानदारी, मेहनत और लगन से किया. अब अकर्मण्य लोग इस पर आरोप लगाते हों तो कुछ कह नहीं सकता. सारे आरोप नितांत झूठे हैं. जिन जमीनों पर कॉलोनी बनाने के आरोप हैं, वहां पहले भी खेती थी, आज भी खेती होती है.

मुख्यमंत्री बनने के बाद जब हाल ही में आप बेटे की शादी का न्यौता प्रधानमंत्री को देने गए तो क्या बातचीत हुई?

प्रधानमंत्री जी ने मंगल कामना दी. हां, एक बात अवश्य कही कि जब मंत्री और मुख्यमंत्री बनते हैं तो लोगों की अपेक्षा हो जाती है बड़े भारी समारोह की. लेकिन हमें अपने आचार, विचार और व्यवहार की सादगी से लोगों को संदेश देना चाहिए कि बड़े पैमाने पर अनावश्यक खर्च इत्यादि से आम जन को भी बचना चाहिए. सत्ता शासन में हमें जनता के लिए आदर्श स्थापित करने चाहिए.

व्यवहार की बात आती है तो 2018 का एक वीडियो भी सामने आता है जिसमें आप अपशब्दों का प्रयोग करते दिखाई देते हैं, क्या था मामला?

उज्जैन के एक पोलिंग बूथ पर दूसरी पार्टी ने बाकायदा कब्जा कर लिया था. ऐसा होता नहीं लेकिन तब यह हुआ था. कांग्रेस के कोई लोकल नेता थे. हमारे पोलिंग कार्यकर्ता को भगा दिया गया. मैं वहां प्रत्याशी था तो गलत काम रोकना मेरी जिम्मेदारी थी. और मेरा यह मानना है कि जब झगड़ा ही हो रहा हो तो मंत्र तो नहीं सुनाएंगे न! और उस पोलिंग बूथ पर आज तक सफलता से वोटिंग होती है.

बतौर मुख्यमंत्री अब तक किए गए कामों को अपनी सफलता मानते हैं?

सरकार बनते ही पहला फैसला हमने नई शिक्षा नीति के आधार पर एक्सीलेंस कॉलेज बनाने का किया. दूसरा फैसला था कि लाउडस्पीकर के मामले में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का पालन हो. इसके अलावा खुले में मांस बिक्री पर रोक, पुराने अपराधियों को बार-बार जमानत मिलने पर रोक लगाने के फैसले भी किए. मैं प्रचार प्रसार से ज्यादा काम करने में विश्वास करता हूं.

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को भाजपा में लाने का काम भी उतने ही विश्वास से कर रहे हैं? 2019 में आप सिर्फ छिंदवाड़ा की सीट हारे, इस बार क्लीन स्वीप होगा?

पहली बात, मेरा ध्यान कमल पर है, कमलनाथ पर नहीं. दूसरी बात, जिस प्रकार से मोदी जी ने दूसरे कार्यकाल में काम किए हैं, हमें पूरा विश्वास है कि मध्य प्रदेश की जनता पूरा साथ देगी. रही छिंदवाड़ा की बात तो जिस प्रकार से वहां बड़े-बड़े लोग बीजेपी में आ रहे हैं, मुझे पूरा भरोसा है कि बदलती हवा में आज नहीं तो कल लोग आएंगे. मेरे परिवार में कोई आना चाहेगा तो मैं स्वागत ही करूंगा. राष्ट्रीय नेतृत्व जो फैसला करेगा हम साथ रहेंगे.

उज्जैन को लेकर बड़ी कथाएं चलती हैं, विक्रमादित्य की और बाकी कथाओं के काल निर्धारण की बात होती है, समय निर्धारण को लेकर आपका आग्रह क्या है?

देखिए महाकाल में काल का अर्थ समय ही तो है. बाबा महाकाल की नगरी मतलब समय की नगरी. हजारों साल से माना जाता रहा है कि उज्जैन पृथ्वी के केंद्र में है. तीन सौ साल पहले तक पूरी दुनिया के समय की गणना उज्जैन से होती थी. आज भी पंचांगों में समय की गणना उज्जैन के सूर्योदय से होती है. जब भारत कमजोर हुआ तो पहले पेरिस से स्टैंडर्ड टाइम की गणना हुई, फिर पिछले ढाई सौ सालों से ग्रीनविच से स्टैंडर्ड टाइम की गणना होती है जिसे कई विद्वान, खास तौर से एस्ट्रोफिजिक्स के विद्वान गलत मानते हैं.

एक कहानी उज्जैन को लेकर यह भी चलती है कि महाकाल की नगरी में कोई राजा रात को नहीं रुकता था, जब आप मुख्यमंत्री बने तो यह कहानी दोहराई गई कि अब आप यहां कैसे रुकेंगे?

देखिए, काल के प्रभाव में कई बार ऐसा होता है कि घटनाओं के अपभ्रंश रूप आ जाते हैं. 1812 में जब उज्जैन से राजधानी गई तो यह कहानी चला दी गई. जबकि आप देखिए कि महादजी सिंधिया साहब हों या रानोजी सिंधिया, सभी ने राजधानी उज्जैन में रखी. उससे पहले राजा भोज से लेकर राजा विक्रमादित्य तक और उदयादित्य से लेकर सम्राट अशोक तक सब उज्जैन में रहे.

उज्जैन महाकाल महालोक के विकास की तो खूब चर्चा हुई लेकिन कई आलोचक ध्यान दिलाते हैं कि राम वन गमन पथ पर सरकार ने अब तक कुछ ठोस कदम नहीं उठाया.

मैंने मुख्यमंत्री बनने के एक महीने के भीतर राम वन गमन पथ पर मीटिंग भी कर ली और चित्रकूट समेत कई स्थानों पर होकर भी आया हूं. शासन ने साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए की डीपीआर भी मंजूर कर दी है. मेरा कहना तो यह है कि केवल भगवान राम का ही नहीं भगवान श्री कृष्ण के भी जहां जहां चरण पड़े उन्हें तीर्थ बनाया जाए. इसमें कहीं कोई बाधा नहीं.

एक बाधा मध्य प्रदेश के शिक्षकों की तरफ से गिनाई जाती है वेतनमान को लेकर, क्या शिक्षक आपसे उम्मीद कर सकते हैं कि अब उन्हें पहले वर्ष से पूरा वेतनमान मिलेगा?

कोविड के दौरान जब हमारी सरकार बनी थी और मैं शिक्षा मंत्री बना उसके बाद से हमने किसी भी अतिथि व्याख्याता को बाहर नहीं किया. हमारा मानना था कि न तो पढ़ने वालों के और न ही पढ़ाने वालों के भविष्य के साथ किसी तरह का कोई समझौता होना चाहिए. अतिथि व्याख्याताओं को हमने तब भी तीस हजार रुपए वेतन दिया था जिसे बाद में बढ़ाकर पचास हजार रुपए किया गया. तो शिक्षक वर्ग पूरी तरह से आश्वस्त रहे. लोकसभा चुनाव के बाद उनके हित में फैसले लिए जाएंगे.

पटवारी भर्ती पर लगे आरोपों में अधिकारी कह रहे हैं कि तकनीकी जांच हो चुकी है लेकिन विपक्षी आश्वस्त नहीं दिख रहे, वे जांच रिपोर्ट जारी करने की बात कहते हैं.

देखिए, जांच भी हो चुकी और उसकी रिपोर्ट भी आ चुकी. कोई भी उसकी कॉपी ले सकता है. किसी को घर-घर जाकर तो दिखाएंगे नहीं. 8,700 पदों पर पटवारी भर्ती हुई है. जांच में अगर सब कुछ निष्पक्ष है तो उन्हें भर्ती करके सर्विस का मौका भी हम दे रहे हैं. यह युवाओं के रोजगार से जुड़ा मामला है और भाजपा की मंशा है अधिक से अधिक रोजगार मुहैया करवाना.

लेकिन इस भर्ती के अलावा भी कई ऐसी भर्तियां हैं जो अलग-अलग चरणों में कहीं न कहीं अटकी हुई हैं. उसमें क्या कर रहे हैं आप?

आज की तारीख में ऐसी 28,000 भर्तियां हैं जो अटकी हुई थीं. हम उनका निराकरण करके एक साथ उन पदों पर जॉइनिंग कराने वाले हैं. इसके अलावा बड़ी संख्या में नई भर्तियां भी निकालने वाले हैं. मेरा मानना है कि अगर पद उपलब्ध है तो नई भर्तियां निकालनी ही चाहिए. मैं जब भी जिस विभाग में रहा हूं भर्तियों, प्रमोशन और रोजगार से जुड़े मामले मेरे काम की लिस्ट में सबसे ऊपर रहते हैं. इसलिए अब लगातार भर्तियां आएंगी.

कुछ लोग उलाहने के स्वर में कह रहे हैं कि उज्जैन के 'सीएम सिटी' होने की वजह से विकास कार्यों का फोकस उज्जैन पर ज्यादा है.

ऐसा नहीं है. जब प्रधानमंत्री जी ने उज्जैन के महाकाल महालोक का लोकार्पण किया उसके बाद तो उज्जैन का दृश्य ही बदल गया. बड़े पैमाने पर उज्जैन में व्यापार व्यवसाय की नई दुनिया ही बस गई. उज्जैन की तरफ ट्रैफिक इतना आ रहा है कि हमको फोर लेन में दो लेन और बढ़ानी पड़ी. अब सिंहस्थ आने वाला है, जिसमें पंद्रह करोड़ लोगों के आने का अनुमान है. सरकार ने 2016 में भी 4,000 करोड़ रु. के काम उज्जैन में करवाए थे. बाकी जगह किसी तरह की कोई उपेक्षा नहीं होगी बल्कि विकास कार्यों में तेजी ही आएगी.

बड़ी चर्चा चल रही है कि क्या पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान विदिशा से सांसद बनकर दिल्ली जाएंगे?

राजनीति में किसी संभावना को नकारा नहीं जा सकता. भाजपा वह परिवार है जिसमें केंद्रीय नेतृत्व सबके बारे में सोचता रहता है. पार्टी फैसला लेगी तो उनके साथ हूं क्योंकि पांच बार के सांसद रहे हैं माननीय शिवराज सिंह चौहान. पार्टी की दी गई सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है उन्होंने. मुझे हमेशा सपोर्ट किया है.

कहा जा रहा है कि विधायकी हार गए कई दिग्गज सांसद बनकर दिल्ली जाना चाह रहे हैं. नरोत्तम मिश्र और कमल पटेल समेत कई बड़े नेताओं का नाम लिया जा रहा है.

भाजपा परिवार में किसी की कोई दावेदारी नहीं होती. मुझे बड़ा गर्व होता है कि मैं उस पार्टी का सदस्य हूं जहां नेतृत्व का मामला भी बहुत सहजता से हल हो जाता है. यहां तो मुख्यमंत्री बनाने से पहले भी नहीं बताने की परंपरा है. पार्टी सबको साथ लेकर चलती है, सबका विश्वास, सबका प्रयास.

इस बार मंत्रिमंडल तय करने में किस बात का ध्यान रखा गया?

हमारे यहां मंत्रियों को चुनने के पीछे केंद्रीय नेतृत्व का एक विचार यह रहता है कि राज्य स्तर पर नई लीडरशिप तैयार हो. आपको याद होगा जब उमा भारती जी को चुना गया, उस समय भी कई सीनियर नेता मौजूद थे लेकिन नया नेतृत्व खड़ा करने का निर्णय लिया गया. शिवराज जी को जब चुना गया, तब भी यही विचार था. पार्टी के निर्णय के हिसाब से सभी लोग सहयोग भी भरपूर करते हैं.

पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भी आपकी भूमिका देख रही है? उत्तर प्रदेश और बिहार से शुरू हुए दौरों की सघनता बढ़ेगी?

मुझे तो इतना मालूम है कि अगर पार्टी ने मुख्यमंत्री बनाया है तो यहां पूरी ईमानदारी से काम कर रहा हूं. लेकिन पार्टी का आधार बढ़ाने के लिए, कार्यकर्ताओं से मिलने के लिए और अपने विचार जनता के बीच पहुंचाने के लिए पार्टी ने कोई निर्णय किया तो मैं इस फैसले के बिल्कुल साथ हूं.

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