● भारत की अर्थव्यवस्था 6-7 फीसद की दर से बढ़ रही है. प्रधानमंत्री आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहे हैं और बिजली क्षेत्र में निचले स्तर पर बड़ी संख्या में नए उपभोक्ता जुड़ रहे हैं. ऐसे में बिजली की निर्बाध आपूर्ति की जरूरत बढ़ती जा रही है. सबको 24&7 बिजली मुहैया कराने के मामले में हम कहां खड़े हैं?
2015 में ग्रामीण इलाकों में बिजली की उपलब्धता करीब 12 घंटे थी, जो अब बढ़कर 22 घंटे हो गई है. इसमें कृषि क्षेत्र भी शामिल है... शहरी क्षेत्रों में औसतन 23.5 घंटे बिजली आपूर्ति होती है. हमने जनरेटर या इनवर्टर पर निर्भरता को गुजरे जमाने की चीज बना दिया है.
हमने उत्पादन क्षमता 190 गीगावॉट बढ़ाई. वैश्विक मानकों के हिसाब से भारत में बिजली कनेक्शन पाना काफी ज्यादा आसान है. आज आपको 60 से 90 दिन के भीतर कनेक्शन मिल जाएगा. वहीं, अमेरिका में इसके लिए आपको ढाई से तीन साल तक इंतजार करना होगा. यूरोप में भी यह अवधि तीन साल तक हो सकती है.
● इसके लिए कुशल वितरण कंपनियों की जरूरत है. आप ऐसे कई सुधारों के लिए खासी मशक्कत कर रहे हैं. ये बदलाव किसी मुकाम तक पहुंचे हैं?
हमने करीब 2,10,000 करोड़ रुपए खर्च करके वितरण व्यवस्था को मजबूत किया है. 3,000 नए सबस्टेशन जोड़े हैं और करीब 4,000 सबस्टेशन और 8,50,000 सर्किट किमी एचटी और एलटी लाइनों को अपग्रेड किया है. साथ ही तमाम ट्रांसफॉर्मर बदले गए हैं. जब मैं यहां आया था तो व्यावहारिक तौर पर विद्युत क्षेत्र की स्थिति डांवांडोल थी.
उत्पादन कंपनियों (जेनको) का बकाया 1,35,000 करोड़ रुपए के आसपास था. 2014 में वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) का एटीऐंडसी घाटा करीब 23 फीसद था, जो अब लगभग 15.5 फीसद रह गया है. 1,35,000 करोड़ रुपए का बकाया घटकर 60,000 करोड़ रुपए (पिछला बकाया) हो गया है. मौजूदा सभी भुगतान अप-टू-डेट हैं, कुल मिलाकर हमारी विद्युत कंपनियां पूरी तरह पेशेवर रुख अपनाने लगी हैं. अगर कोई डिस्कॉम निर्धारित समय के भीतर बिजली का भुगतान नहीं करती तो उसकी कनेक्टिविटी स्वत: बंद हो जाती है.
● कुछ राज्य कुछ क्षेत्रों को सस्ती या मुफ्त बिजली देने का वादा कर रहे हैं. पूर्व में इसका डिस्कॉम के नकदी प्रवाह पर असर पड़ता रहा है. आप इस मसले को कैसे देखते हैं?
अगर कोई राज्य 100 यूनिट या 200 यूनिट बिजली मुफ्त देने की घोषणा करता है तो उसे इसके लिए भुगतान करना होगा. सब्सिडी का भुगतान डिस्कॉम को अग्रिम तौर पर करना होगा. अगर डिस्कॉम घाटे में चल रही है और उनके पास घाटे की पूर्ति का कोई रोडमैप नहीं है...तो राज्य सरकार को इसकी पुष्टि करनी होगी.
हम तर्कसंगत मानदंडों को संशोधित कर बैंकों को भी अपने ऋण संबंधी मानदंडों को इसके मुताबिक संशोधित करने को लिखेंगे. हमने जीएसडीपी का 0.5 फीसद अतिरिक्त उधार लेने की सहूलत भी प्रदान की है. इस तरह, बड़े लक्ष्य पूरे करने के लिए प्रोत्साहित करने का तरीका कारगर साबित हो रहा है.
● बिजली काटना काफी साहसिक कदम नजर आता है. बिजली एक संवेदनशील विषय है और राजनीति को भी प्रभावित करता है. आप इससे कैसे निबटते हैं? क्या किसी तरह की छूट देते हैं?
किसी को कोई छूट नहीं है....पूरा सिस्टम स्वचालित है. अगर मैं कुछ करना भी चाहूं तो नहीं कर सकता. बिल्कुल, यह एक संवेदनशील मुद्दा है...जब कनेक्शन काटने की शुरुआत हुई तो कई राज्य मंत्रियों और (यहां तक भाजपा शासित राज्यों के) मंत्रियों ने भी छूट मांगने के लिए फोन किया. तब मुझे उनसे कहना पड़ा—माफ कीजिए यह नहीं हो सकता.
● आपने विद्युत अधिनियम में संशोधन के साथ प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण शुरू करने और राज्य नियामकों की नियुक्तियों में क्रांतिकारी बदलाव की योजना बनाई थी. क्या स्थिति है?
विद्युत अधिनियम में संशोधन की संसदीय प्रक्रिया अपनाई जा चुकी है... नया बिल जल्द ही संसद में लाया जाएगा.
● पर्यावरणविद् उन बिजली संयंत्रों को चालू रखने की आलोचना करते हैं जिनकी सेवाओं को अब तक बंद कर दिया जाना चाहिए था.
हम आशावादी हैं. हमारा मानना है कि देर-सवेर विद्युत भंडारण संभव हो पाएगा. ऐसे में जब तक आपके पास परमाणु ऊर्जा नहीं है तब तक आप जीवाश्म ईंधन को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते...दुनिया में कुल भंडारण विनिर्माण क्षमता करीब 24 गीगावॉट या इसके आसपास है. भंडारण बेहद आवश्यक है क्योंकि सूर्य केवल दिन में निकलता है और बिजली की जरूरत आपको रात में भी पड़ती है. हवा कभी चलती है, कभी नहीं भी चलती है. तो, भंडारण के बिना आपको चौबीसों घंटे नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध नहीं हो सकती. तब तक आपको कोयला या गैस या परमाणु ईंधन से बिजली उत्पादन की जरूरत पड़ेगी.
● इसका मतलब है कि भारत को अभी काफी समय तक कोयले पर निर्भर रहना पड़ सकता है?
हम कोयला इस्तेमाल करते हैं. पर अन्य देश गैस या परमाणु ईंधन का इस्तेमाल करते हैं. कुछ देश भारी तेलों का उपयोग करते हैं जो कि कोयले से भी अधिक प्रदूषणकारी हैं. कोयले की तुलना में प्राकृतिक गैस अधिक मीथेन उत्सर्जित करती है. मीथेन कार्बन डाईऑक्साइड से लगभग 80 गुना अधिक खतरनाक है...इसलिए आपको थर्मल पावर की जरूरत होती है. लेकिन हमें पूरी उम्मीद है कि भंडारण की लागत कम होगी.
● भंडारण के लिए हमें कब तक इंतजार करना होगा?
हम भंडारण विनिर्माण क्षमता स्थापित कर रहे हैं...मैंने करीब 1000 मेगावाट-घंटे (एमडब्ल्यूएच) के भंडारण के लिए बोली आमंत्रित की थी, जो दुनिया के सबसे बड़े बजटों में से एक 10 रु. प्रति किलोवाट-घंटा थी. यानी 2.5 प्रति यूनिट की उत्पादित होने वाली बिजली के भंडारण पर प्रति घंटे 10 रुपए का खर्च. हालांकि, जैसा आप जानते हैं, मात्रा बढ़ने पर यह लागत कम होगी.

