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मोदी कुछ कहें और हम न मानें, संभव ही नहीं

शिवराज इन सबके बावजूद आश्वस्त हैं. उन्हें लगता है कि लाडली बहना योजना के तहत सवा करोड़ लाभार्थी उनके तारणहार बनेंगे. इन सब महिलाओं को मुख्यमंत्री एक हजार रुपए हर महीने देना शुरू कर चुके हैं.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
अपडेटेड 20 जून , 2023

रात के तकरीबन 10 बजे थे. यह भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का आवास था. कभी यहां रौनकों के मेले होते थे. जब पद था, यह तब की बात है. अब इंतजार है. और है एक आप्त वचन-सा बयान. मैं समय की ध्वनि ध्यान से सुन रहा हूं. और धैर्य से भी. राजनीति में यह नहीं तो क्या ही है. और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के शासन के बारे में क्या सोचते हैं ये नेता. फिर एक बयान, वे सुबह-सवेरे सरसों का तेल शरीर पर रगड़कर निकलते हैं. किसी की पकड़ में नहीं आते.

इन बयानों को उन खांचों में डाला जा सकता है, जो नाराजगी के कोष्ठक में आते हैं. और शिवराज को लेकर पार्टी में अंदरखाने शीर्ष के दावेदार रहे या जो अभी भी हैं, गाहे-ब-गाहे इसे प्रकट करते रहते हैं. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 24 घंटे गुजारते ही हाउस ऑफ भाजपा की भुनभुनाहट सुनाई देने लग जाती है. प्रदेश अध्यक्ष और खजुराहो सांसद वी.डी. शर्मा रहेंगे या जाएंगे, इसकी चर्चा है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया और मुख्यमंत्री, इन दोनों ही खेमों में पटरी न बैठने की बात है. सीएम ग्रुप अंदरखाने निकाय चुनाव में हार का ठीकरा भी संगठन पर ही फोड़ता दिखा. बदलाव के वास्ते दोनों तरफ की और भी दलीलें हैं. एक यह कि हर जिले में वरिष्ठों को किनारे कर विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि वालों को संगठन दे दिया गया.

दूसरी यह कि चुनाव से इतना करीब बदलेंगे तो नए से संभाल कैसे होगी. और इस दूसरे तर्क की काट के लिए फिर एक तर्क कि ऐसे को लाओ, जो संगठन की चूलों से वाकिफ हो. ऐसे के एवज में जैसे भी आता है. पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से लेकर, कैलाश विजयवर्गीय और राजेंद्र शुक्ल के नाम गिना दिए जाते हैं. फिर एक कोने से एक और केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल का जिक्र भी आता है. मगर इस नाम के साथ आता है सामाजिक समीकरण कि मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष, दोनों पिछड़े समाज से कैसे आ सकते हैं.

संगठन को लेकर एक और कसमसाहट है. संगठन मंत्री हितानंद शर्मा के ऊपर संघ परिवार के ही शिवप्रकाश और अजय जामवाल की सक्रियता. हालांकि शर्मा के करीबी इसे संयोजन और चुनावी दृष्टि से जरूरी बताते हैं, मगर विरोधी खेमा इसे पर कतरना कह रहा है. पार्टी के प्रभारी महासचिव मुरलीधर राव के दौरों और बैठकों- सुझावों को लेकर भी अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं.

और फिर इन सबके समानांतर हैं शिवराज सिंह चौहान. 2005 से बरकरार. कमलनाथ के सवा साल के अंतराल को छोड़कर. भाजपा के सबसे ज्यादा लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नेता. जब पहली दफा दिल्ली से शताब्दी ट्रेन पकड़कर भोपाल आए थे, शपथ लेने, तब क्या सीन था. दिल्ली में प्रमोद महाजन भाजपा के सबसे बड़े रणनीतिकार थे. अटल बिहारी की सहमति जरूरी थी और आडवाणी पार्टी चला रहे थे.

और अब नरेंद्र मोदी, अमित शाह का दौर है. शाह के करीबी नरोत्तम मिश्र अब अपेक्षाकृत शांत हैं. शिवराज को अब उनके बयानों पर ज्यादा सफाई नहीं देनी पड़ती. मगर इस शांति में एक यह भाव भी है, कि ठीक है, फिर मेरे बिना ही करके दिखा लो. लेकिन यह मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी चिंता नहीं है. उनकी परेशानी है ग्वालियर-चंबल संभाग में सिंधिया गुट के विधायकों, मंत्रियों और वफादार दावेदारों को एडजस्ट करना. जहां-जहां ये पूर्व कांग्रेसी जीते-हारे वहां-वहां भाजपाई अपने टिकट को लेकर हलकान हैं. कैबिनेट से भी जब तब मुखामुखम की खबरें रिसकर आती रहती हैं.

शिवराज इन सबके बावजूद आश्वस्त हैं. उन्हें लगता है कि लाडली बहना योजना के तहत सवा करोड़ लाभार्थी उनके तारणहार बनेंगे. इन सब महिलाओं को मुख्यमंत्री एक हजार रुपए हर महीने देना शुरू कर चुके हैं. कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के 1,500 रुपए देने के वादे पर मुख्यमंत्री कहते हैं, ''उन्होंने तो कर्ज माफी का वादा भी किया था, मगर सत्ता में रहते कर नहीं पाए.

मैं मध्य प्रदेश का देखा-परखा हूं.’’ लेकिन सीएम के करीबी मानते हैं कि अभी कांग्रेसी वादे 500 रुपए के सिलेंडर की काट खोजना बाकी है. शिवराज खेमा विधायकों, मंत्रियों के प्रति लोकल ऐंटी इनकमबैंसी से भी वाकिफ है. मगर टिकट वितरण में अब भोपाल नहीं, दिल्ली का आखिरी फैसला होता है.

हमेशा से ऐसा नहीं था. एक वरिष्ठ नेता ने बताया, ''हमने राज्यसभा के लिए एक नाम भेजा. उस समय के प्रभारी ने नाम काट दिया. हम आलाकमान के पास पहुंचे और कहा, संगठन भोपाल से नाम तय कर लाया. अगर उस पर हां नहीं की जाएगी तो हमारी प्रतिष्ठा और हनक कैसे रहेगी.’’

आलाकमान इस तर्क पर राजी हो गया और फिर फैसला हक में हो गया. अब एक बार फिर दिल्ली को फैसला करना है. भोपाल के सूबेदार शिवराज सिंह चौहान को लेकर मतदाता उत्साहित हैं या फिर एक नए चेहरे और नारे की जरूरत है. क्या शिवराज सिंह चौहान ब्रैंड की अपील खत्म हो गई? क्या पार्टी के पास पूरे मध्य प्रदेश में अपील रखने वाला कोई और नेता है? इन्हीं सब से टिकट वितरण और सीएम फेस समेत कई जवाब मिलेंगे.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से उनकी सरकार, संगठन, विरोधी और तीन दशक की राजनैतिक यात्रा पर इंडिया टुडे के संपादक सौरभ द्विवेदी से बातचीत के अंश:
 
कांग्रेस का आरोप है कि सत्ता परिवर्तन से डरी शिवराज सरकार फाइलें जलाकर भ्रष्टाचार के सबूत मिटा रही है. सतपुड़ा भवन में 2018 और 2012 में भी आग लग चुकी है. क्या कहना चाहेंगे?

आग रात के अंधेरे में नहीं लगी. 4,000 लोग काम कर रहे थे, तब लगी. ऐसा षड्यंत्र कौन करेगा? दुर्भाग्य है कि विपक्ष ऐसी दुर्घटना पर राजनीति कर रहा है. आज के डिजिटल युग में कोई रिकॉर्ड ऐसा तो नहीं हो सकता कि जल जाए और मिले नहीं.

कांग्रेस सरकारी दफ्तरों में आग को लेकर मुखर है क्योंकि चुनाव आने वाले हैं. 2018 की बात करते हैं. तब जनादेश भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में नहीं था. आपकी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि 2018 में कई भाजपा नेताओं का मानना था कि नतीजों के बाद कुछ दिन इंतजार करना चाहिए था, छोटी पार्टियों को साथ लेने की कोशिश करनी चाहिए थी. राजभवन में पूर्व भाजपा नेता आनंदीबेन पटेल थीं ही. लेकिन आपने नतीजों की अगली सुबह इस्तीफा दे दिया. कहा गया कि आप लंगड़ी सरकार चलाने के पक्ष में नहीं थे. फिर 2020 में क्या आपका हृदय परिवर्तन हो गया था? या आलाकमान के निर्देश थे? ज्योतिरादित्य ने संपर्क किससे किया था?

बहुमत तो कांग्रेस के पास भी नहीं था. जिन छोटी पार्टियों और निर्दलियों से समर्थन की बात थी, उनमें से पांच से संपर्क हो भी गया था. तीन लोग हमसे मिलने निकले और सागर तक पहुंच भी गए थे. लेकिन मेरी चेतना को यह सब गवारा न था. मुझे लगा कि सीटें जिनके पास ज्यादा हैं, उन्हीं को सरकार बनानी चाहिए. सो, सवेरे जाकर मैंने इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया. लेकिन मैं चुप नहीं बैठा. मैंने कहा, टाइगर अभी जिंदा है.

लेकिन कमलनाथ सरकार ने वल्लभ भवन (मध्य प्रदेश सरकार का सचिवालय) को दलालों का अड्डा बना दिया, बदले की राजनीति की. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने वचन पत्र क्या याद दिलाया, उन्हीं को निबट लेने की सलाह दी गई. ऐसे में कांग्रेस के लोग ही टूटे. तब भाजपा के पास सरकार बनाने का अवसर आया. विधायकों ने इस्तीफा दिया. फिर से चुनाव लड़े. लोगों को इसमें कुछ गलत लगता तो हमें जिताते क्यों?

कांग्रेस से नेताओं के भाजपा में आने के बाद उन इलाकों के भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं को कहां और कैसे समायोजित किया जाएगा? 

ज्योतिरादित्य की तारीफ की जानी चाहिए कि वे भाजपा में आकर ऐसे घुल गए जैसे दूध में शक्कर मिलकर एक हो जाती है. स्वाभाविक रूप से जब कोई आता है, तो पहले से मौजूद लोगों का सम्मान बना रहे, यह पार्टी का दायित्व है. (सिंधिया के आने के चलते) प्रदेश भाजपा में कोई व्यापक असंतोष हो, ऐसा नहीं है. 

आप पर पार्टी में अपने प्रतिद्वंद्वियों को किनारे लगाने का आरोप लगता है. कहा जा रहा है कि कैलाश विजयवर्गीय, प्रभात झा, राकेश सिंह, कृष्ण मुरारी मोघे जैसे वरिष्ठ नेताओं का एक खेमा तवज्जो न मिलने से नाराज है.

मैंने कभी अपने बारे में कोई फैसला नहीं किया. मुझसे जुड़े फैसले हमेशा पार्टी ने लिए. मेरे मुख्यमंत्री बनने की कहानी ही यह साबित करती है. मैंने कभी सीएम बनने का प्रयास नहीं किया. मैं तो पहले पार्टी महासचिव था, फिर अध्यक्ष बना. पार्लियामेंट्री बोर्ड ने मुझे कुर्सी सौंपने का निर्णय लिया, तब दोपहर के तीन बज रहे थे.

और मैं दिल्ली के अपने आवास पर सो रहा था. तभी दरवाजे की घंटी बजी. हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद हुड्डा सपत्नीक आए थे, जो दिल्ली के पंडित पंत मार्ग पर पास के ही एक बंगले में रहते थे. पत्नी ने मुझे उठाकर कहा कि टीवी पर आपके मुख्यमंत्री बनने की खबर चल रही है. हुड्डा अपने साथ एक बुके लाए थे. तब से लेकर अब तक पार्टी ने ही सारे फैसले किए. मैं सारे वरिष्ठों का सम्मान करता हूं और किसी से संबंध खराब नहीं है.

आज आप मुख्यमंत्री हैं, एक वक्त नेतागीरी के लिए पिटाई भी हुई थी.

उन दिनों मैं सातवीं में था. देखता था कि मजदूरों की स्थिति बहुत खराब थी. तो मैंने कुछ मजदूरों को लेकर नारेबाजी की—ढाई नहीं, पांच पाई लेंगे, नहीं तो काम बंद करेंगे. प्रदर्शन जब मेरे घर के पास पहुंचा तो मेरे चाचा पुहुप सिंह चौहान लाठी लेकर निकले. आंदोलन तुरंत खत्म हो गया. मेरी पिटाई हुई और अगली सुबह भोपाल भेज दिया गया.

नरेंद्र मोदी से पहली मुलाकात कब हुई?

1991 में मुरली मनोहर जोशी ने तिरंगा यात्रा निकाली थी. मोदी इस यात्रा के प्रभारी थे. मुझे यात्रा के साथ चल रही केसरिया वाहिनी का संयोजक बनाया गया था. तब हमारी खूब मुलाकात होती थी. तत्कालीन केंद्र सरकार ने पूरी यात्रा को श्रीनगर के लाल चौक नहीं जाने दिया. डॉ. जोशी सिर्फ कुछ ही लोगों के साथ वहां जा पाए.

इसे लेकर यात्रा में शामिल कार्यकर्ता मायूस भी थे और नाराज भी. जब मोदी श्रीनगर से लौटे, तो यात्रा समापन पर जम्मू में एक सभा हुई. मोदी ने कहा, ‘‘मेरे साथ इतने दिनों तक कार्यकर्ताओं ने मेहनत की. ये सब लाल चौक पर तिरंगा फहराना चाहते थे. लेकिन ये नहीं हो पाया. रात भर ये सब रोते रहे.’’ इतना कहते-कहते मोदी का गला रुंध गया. उनकी आंखों से आंसू बह निकले.

 
क्या यह सही है कि 2014 में सरकार बनने पर नरेंद्र मोदी चाहते थे कि उनके मंत्रिमंडल में आप शामिल हों?

ये सारी बातें गपोड़ेबाजी करने वालों की देन हैं. मोदी कुछ कहें और हम न मानें, यह हो ही नहीं सकता. 

महाकाल कॉरिडोर का उद्घाटन करने प्रधानमंत्री आए थे. अब सप्तऋषियों की मूर्तियां टूटी हुई नजर आ रही हैं.

महाकाल महालोक करीब 350 करोड़ रुपए में बना. इसमें से मूर्तियों पर 7.5 करोड़ रुपए खर्च हुए. आंधी के कारण 178 में से केवल सप्तऋषियों की मूर्तियां गिरीं. जो भी निर्माण हुआ है, तीन साल तक उसका मेंटेनेंस ठेकेदार को ही करना है. जांच चल रही है. कोई दोषी पाया गया, तो कार्रवाई होगी.

● पहले आपकी ईद और क्रिसमस मनाते हुए तस्वीरें आती थीं. अब नहीं आतीं. क्या योगी आदित्यनाथ और हेमंत बिस्व सरमा के आने के बाद आपने भी अपनी छवि को बदला?

अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई आज से नहीं, 2006 से चल रही है. महिलाओं के खिलाफ अपराध पर फांसी की सजा का प्रावधान सबसे पहले मध्य प्रदेश में ही आया. अवैध निर्माण पहले से तोड़े जाते रहे हैं. योगी जी के बाद बुलडोजर ज्यादा चर्चा में आए.

क्या धीरेंद्र शास्त्री और प्रदीप मिश्रा जैसे कथावाचकों को भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का काम सौंपा गया है? पुरी शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने बीते दिनों धीरेंद्र शास्त्री को भाजपा प्रचारक कहा था. 

ये सब सम्मानित संत हैं. ये किसी पार्टी के नहीं हैं. मैं शंकराचार्य पर टिप्पणी नहीं करूंगा.

आपके गृह मंत्री समानांतर सेंसर बोर्ड चला रहे हैं. वे कहते हैं कि वे हिंदू धर्म की आस्था की रक्षा कर रहे हैं.

गृह मंत्री अपनी ड्यूटी कर रहे हैं. वे जवाब देने में सक्षम हैं. उन्होंने आपको जवाब दिया भी होगा.

मध्य प्रदेश विधानसभा में दिए जवाब के मुताबिक, 39 लाख पंजीकृत बेरोजगारों में से 21 लोगों को ही रोजगार कार्यालय के जरिए नौकरी मिली (अप्रैल 2020 के बाद से). पौने 17 करोड़ रुपए इन कार्यालयों पर खर्च हुए.

एक लाख पदों पर भर्तियां चल रही हैं. 22,000 लोगों को हाल में प्रधानमंत्री ने नियुक्ति पत्र दिए. 60,000 सरकारी पदों पर भर्ती चल रही है. ये पूरी हो जाएंगी, तब 50,000 भर्तियां फिर निकाली जाएंगी. निजी नौकरियों/स्वरोजगार के लिए भी निवेश आदि के प्रयास चल रहे हैं. 

राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के नतीजे नियमित नहीं.

परीक्षाएं नियमित हो रही हैं, नतीजे भी आ रहे हैं. कोविड के दौरान परीक्षाएं नहीं हुईं क्योंकि परिस्थिति नहीं थी.

दिग्विजय सिंह और कमलनाथ से बात होती है?

बिल्कुल बात होती है. अभी चुनाव का दौर चल रहा है तो सब व्यस्त हैं. लेकिन अगर वे कोई मुद्दा उठाना चाहते हैं, तो हम जरूर सुनते हैं.

यही बात भोपाल की सांसद प्रज्ञा ठाकुर पर भी लागू होती है. उनके चुनाव के वक्त 2019 में विनय सहस्रबुद्धे को भोपाल में डेरा क्यों डालना पड़ा था?

प्रज्ञा का काम बहुत बेहतर है. उनके टिकट के मुद्दे पर हम सब राजी थे. सहस्रबुद्धे भोपाल इसलिए आए थे क्योंकि वे मध्य प्रदेश के प्रभारी थे.

दमोह की घटना इन दिनों चर्चा में है. हिज्ब-उत-तहरीर के मॉड्यूल की बात हो रही है. 

हमने डकैती, सिमी और नक्सलवाद पर लगाम लगाई है. रही बात धर्मांतरण की, तो लोभ या डरा धमका कर धर्मांतरण करवाना मध्य प्रदेश में गैरकानूनी है. जब ऐसे मामले सामने आते हैं, कार्रवाई होती है.

2017 में किसानों के प्रदर्शन के दौरान मंदसौर में फायरिंग ने छह किसानों की जान ली थी. कमेटी की रिपोर्ट का क्या हुआ? 

मैं इस घटना को अपने राजनैतिक जीवन की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना मानता हूं. कार्रवाई भी तत्काल हुई थी, मुआवजा दिया गया. लेकिन ऐसे कैसे कह दें कि किसी ने सीधे गोली चला दी थी. उस घटना के बाद भी मंदसौर लोकसभा सीट की आठ में से सात विधानसभा सीटें हम जीते थे. 

आप एक नई योजना लाए हैं—लाडली बहना. सवा करोड़ लाभार्थियों को 1,000-1,000 रुपए देने वाले हैं.

यह दरअसल एक योजना न होकर योजनाओं की एक कड़ी है. बचपन से मैंने बहन-बेटियों के साथ अन्याय होते हुए देखा है. भ्रूण हत्याएं होती हैं. मध्य प्रदेश में तो लिंगानुपात 1,000 पुरुषों के मुकाबले 912 महिलाओं पर आ गया था. जब मैं विधायक बना, तो अपने इलाके में गरीब बेटियों की शादी करवाता था. जब मुख्यमंत्री बना, तो 2006 में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना बनाई. इसके बाद हमने सेक्स रेशियो पर काम करना शुरू किया.

लाडली लक्ष्मी योजना लाए. इसमें जन्म के साथ ही लड़कियों को सरकार आर्थिक मदद देना शुरू करती है. जैसे-जैसे लड़की की पढ़ाई आगे बढ़ती है, आर्थिक मदद मिलती रहती है. 21 साल की उम्र में 1 लाख रुपए दिए जाते हैं. नतीजे में सेक्स रेशियो 912 से 965 पर आ गया है. लाडली लक्ष्मी योजना के कारण 45 लाख से ज्यादा बेटियां आज इस दुनिया में हैं, जो मुझे मामा कहती हैं. इसके बाद हमने स्थानीय निकाय में महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण दिया.

तमाम विरोध के बावजूद पुलिस में 30 फीसद आरक्षण दिया. शिक्षक भर्ती में 50 फीसद आरक्षण दिया. अब हम गरीब परिवारों में महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधारने पर काम कर रहे हैं. तो लाडली लक्ष्मी से चली आ रही शृंखला में एक नई योजना आई, लाडली बहना. बैगा, भारियां और सहरिया जनजाति की महिलाओं को हम 2017 से ही एक हजार प्रति माह की आर्थिक मदद दे रहे हैं. इस योजना के चलते इन जनजातियों के घरों में पोषण का स्तर सुधर गया था. लेकिन इस योजना को 2018 में आई कमलनाथ सरकार ने बंद कर दिया था.

कमलनाथ भी महिलाओं को आर्थिक मदद देने का वादा कर रहे हैं. आपने 1,000 रुपए की घोषणा की, उन्होंने 1,500 रुपए की कर दी. प्रदेश की खस्ता आर्थिक स्थिति पर नजर रखे विद्वान पूछ रहे हैं कि यह होड़ कहां जाकर रुकेगी?

कमलनाथ ने तो जनजातीय महिलाओं को आर्थिक मदद बंद करने का फैसला किया था. अब जब हम योजना लाए हैं, तब उन्हें चिंता हुई. इसीलिए उन्होंने जानबूझकर ऐसी बात की, जो उनके दिलो-दिमाग में कभी थी ही नहीं.

कमलनाथ 500 रुपए में सिलेंडर देने की बात भी कर रहे हैं. 100 यूनिट बिजली माफ और 200 यूनिट पर बिल हाफ करने का वादा कर रहे हैं. क्या आप इसके जवाब में कोई ऐलान करेंगे?

वे जो कह रहे हैं, वह गारंटी नहीं चुनावी शिगूफा है. कहा तो राहुल गांधी ने भी था कि 2018 में सरकार बनते ही किसानों का कर्ज माफ कर देंगे. बेरोजगारी भत्ता देंगे. इनमें से क्या हो पाया?

2023 को लेकर क्या आकलन है? शिवराज सिंह चौहान सीएम बनेंगे?

जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हूं. सीएम कौन होगा, पार्टी तय करेगी.

कमलनाथ जो (500 रु. में सिलेंडर देने को) कह रहे हैं वह गारंटी नहीं, सिर्फ चुनावी शिगूफा है. 2018 में कहा तो राहुल गांधी ने भी बहुत कुछ था, उनमें से क्या हो पाया?

(उज्जैन में) आंधी के कारण 178 में से केवल सप्तऋषियों की मूर्तियां गिरीं. निर्माण का मेंटेनेंस तीन साल तक ठेकेदार को ही करना है. जांच चल रही है’’.

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