सुर्खियों का सरताज 2022
बातचीतः गौतम अदाणी
मेरे लिए 2022 कई लिहाज से असाधारण साल रहा. हम अदाणी विल्मर का कामयाब आइपीओ लाए और अब यह हमारे ग्रुप की सातवीं लिस्टेड कंपनी बन गई है. हमने ऐसा बिजनेस मॉडल बनाया है जिसमें हम बिल्कुल नीचे से शुरू करते हैं, उसे मुनाफे में लाते हैं और फिर आम लोगों को शेयर देते हैं.
यह आइपीओ इसकी एक और मिसाल था. करीब 10.5 अरब डॉलर (86,787 करोड़ रुपए) में एसीसी और अंबुजा सीमेंट का अधिग्रहण करके हम भारत के दूसरे सबसे बड़े सीमेंट मैन्युफैक्चरर भी बन गए. यह हमारा अब तक का सबसे बड़ा अधिग्रहण है और यह इन्फ्रास्ट्रक्चर व मटीरियल्स के क्षेत्र में भारत का अब तक का सबसे बड़ा एमऐंडए (विलय और अधिग्रहण) सौदा भी है.
सबसे अमीर भारतीय और सबसे अमीर एशियाई होने के अलावा अब आप दुनिया के तीसरे सबसे अमीर शख्स भी हैं. इतना धनवान होना कैसा लगता है? आपके लिए रुपए-पैसे के क्या मायने हैं?
देखिए, इन रैंकिंग और आंकड़ों की मेरे लिए कोई अहमियत नहीं है. ये तो बस मीडिया में उछाले जाते हैं. मैं पहली पीढ़ी का आंत्रप्रेन्योर हूं, जिसने बिल्कुल खाक से सब कुछ खड़ा किया. मुझे अपना रोमांच चुनौतियों से जूझने से मिलता है. वे जितनी ज्यादा बड़ी होती हैं, उतना ही ज्यादा मैं खुश होता हूं. मेरे लिए लोगों की जिंदगी में बदलाव लाना और देश की तरक्की में योगदान देने का मौका और उसकी क्षमता होना, किसी अमीरी की रैंकिंग में होने से ज्यादा संतोषजनक है.
आपको खुशी किस चीज से मिलती है?
निजी तौर पर कहूं तो यह साल मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा साल था. इस साल मैंने अपना 60वां जन्मदिन मनाया, जो व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए एक अहम पड़ाव था. इसके अलावा मेरे परिवार ने अदाणी फाउंडेशन को 60,000 करोड़ रुपए उन तीन सामाजिक कामों में मदद के लिए देने का वादा किया जो मेरे दिल के करीब हैं—शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और स्किल डेवलपमेंट. ये किसी भी राष्ट्र के लिए बुनियादी जरूरतें हैं. इससे मुझे बेहद संतोष और खुशी मिली, जो किसी पेशेवर उपलब्धि से कभी नहीं मिल सकती.
कारोबार और जिंदगी में आपको क्या प्रेरित करता है?
साधारण व्यक्ति होने के नाते औसत भारतीय की दिलेरी, ताकत, लगन और दृढ़ता मेरे लिए बहुत प्रेरक और हौसला बढ़ाने वाली चीजें हैं. आपको बताऊं, हमारी 'ग्रीन टॉक्स’ सीरीज के दूसरे संस्करण के दौरान अरुणिमा सिन्हा और किरण कनौजिया की कहानियों ने मेरे दिल को छू लिया. ये दोनों असाधारण महिलाएं हैं जो बदकिस्मती से अपने पैर गंवा बैठीं फिर भी उन्होंने दुनिया फतह की.
अरुणिमा माउंट एवरेस्ट पर चढ़ीं और 'ब्लेड रनर’ किरण मैराथनों में दौड़ रही हैं. उनकी कहानियां सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए. मुश्किलों के सामने ऐसे साहस, बहादुरी और पक्के इरादे से ज्यादा प्रेरक क्या कुछ और हो सकता है? उनकी कहानियां जानकर मेरा यह यकीन और पुख्ता हुआ कि इनसानी दिमाग से ज्यादा मजबूत कोई मशीन नहीं है. ऐसी कहानियां मेरे लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत हैं.
अदाणी समूह के विस्तार के पीछे क्या सोच है, इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना या नए क्षेत्रों में प्रवेश करना?
मैं मिडिल क्लास परिवार में पैदा हुआ और 1970 व ’80 के दशक में बड़ा हुआ. तब हमें पर्याप्त बिजली, पानी और बेहतर सड़कों के लिए जूझना पड़ता था. भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी थी. इसके उलट चीन ने हमसे पहले विकास की छलांगें लगानी शुरू कर दीं, जो भारत की आजादी के आसपास ही आजाद हुआ था और जिसकी प्रति व्यक्ति आय 1990 में भारत से कम थी.
इन सब मुद्दों ने मेरे भीतर गहरी इच्छा पैदा कर दी कि भारत के कायापलट के लिए और खासकर इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में मैं जो कुछ कर सकता हूं, करूं. इस बीच 1991 से नीतिगत बदलावों ने ऐसा माहौल बनाया जिससे प्राइवेट सेक्टर इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में आ सके. इसी वजह से मैंने ठान लिया कि भारत में विश्वस्तरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर और सुविधाओं के निर्माण के हर मौके का इस्तेमाल करूंगा.
आपकी मैनेजमेंट स्टाइल, कामयाबी का आपका मंत्र क्या है?
हमारे सारे बिजनेस पेशेवर और काबिल सीईओ चलाते हैं. मैं कंपनियों के रोजमर्रा के कामकाज में दखल नहीं देता. मेरी भूमिका रणनीति बनाने, कैपिटल एलोकेशन (वित्तीय संसाधनों का इस तरह इस्तेमाल ताकि निवेशकों का ज्यादा से ज्यादा फायदा हो) और कामकाज की समीक्षा करने तक सीमित है. यही वजह है कि मेरे पास न केवल इतने विशाल और विविध संगठन को संभालने बल्कि कई नए कारोबारों की तैयारी करने और अधिग्रहणों के नए मौके तलाशने का वक्त होता है.
एक नया अधिग्रहण एनडीटीवी मीडिया ग्रुप का टेकओवर था. क्या यहां भी गैर-दखलअंदाजी के उसी प्रबंधन सिद्धांत का पालन किया जाएगा जिसका आपने समूह की अन्य कंपनियों में किया है? उसकी संपादकीय स्वतंत्रता आप कैसे पक्की करेंगे?
जहां तक संपादकीय स्वतंत्रता की बात है, मैं डंके की चोट पर कह रहा हूं कि एनडीटीवी भरोसेमंद, स्वतंत्र, वैश्विक न्यूज नेटवर्क होगा, जहां मैनेजमेंट और एडिटोरियल के बीच स्पष्ट लक्ष्मण रेखा होगी. मैं जो कह रहा हूं उसके एक-एक शब्द पर आप अंतहीन बहस और व्याख्या कर सकते हैं... जैसा कई लोगों ने किया है... पर मेरा बुनियादी मुद्दा यह है कि स्वाद तो आपको खाने के बाद ही पता चलेगा न. इसलिए हमें परखना शुरू करने से पहले मेहरबानी करके हमें कुछ वक्त दीजिए.
आलोचक दूसरी चिंता यह जताते हैं कि अदाणी ग्रुप पर भारी कर्ज है, करीब 2 लाख करोड़ रुपए के आसपास. कर्ज से निबटने और चुकाने की आपकी क्या योजना है?
वित्तीय तौर पर हम बहुत मजबूत और सुरक्षित हैं. कर्ज को लेकर हल्ला-गुल्ला दो तबकों से उठ रहा है. पहले तो वे लोग हैं जिन्होंने गहराई में उतरकर हमारी कंपनियों की वित्तीय और कर्ज की स्थिति की बारीकियों को समझने की जहमत मोल नहीं ली. अगर वे ऐसा करें तो मुझे यकीन है कि कर्ज के बारे में सारी गलतफहमियां गायब हो जाएंगी. फिर दूसरा तबका अपने निहित स्वार्थों की वजह से ग्रुप की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए भ्रम और गलतफहमी पैदा कर रहा है.
हकीकत यह है कि बीते नौ साल में हमारा मुनाफा हमारे कर्ज के मुकाबले दोगुनी रपफ्तार से बढ़ता रहा है, जिसकी वजह से कर्ज के मुकाबले ईबीआइटीडीए (ब्याज, कर, डिप्रेशिएशन और एमॉर्टाइजेशन सहित कुल आमदनी) का हमारा अनुपात 7.6 से घटकर 3.2 पर आ गया, जो ऐसे किसी भी समूह के लिए बहुत अच्छा है जिसकी ज्यादातर कंपनियां इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में हैं, जहां नकदी प्रवाह सुनिश्चित होता है और पहले से इसका अनुमान लगाया जा सकता है.
यही वजह है कि न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने हमें भारत की सोवरेन रेटिंग के समकक्ष आंका है. मेरे लिए यह बड़े गर्व की बात है कि भारत के किसी भी दूसरे समूह में सोवरेन रेटिंग रखने वाली इतनी सारी कंपनियां नहीं हैं जितनी अदाणी ग्रुप में हैं. हमारे समूह की यही वह बुनियादी वित्तीय ताकत है जिसने हमें एसीसी और अंबुजा के सौदे को तीन महीनों के रिकॉर्ड वक्त में पूरा करने में मदद की.
अदाणी समूह के कर्ज में दूसरे बैंकों के साथ सरकारी बैंकों का भी बड़ा हिस्सा है. इस पर आप क्या कहेंगे?
लोग तथ्यों की तस्दीक किए बगैर चिंताएं जाहिर करते हैं. हकीकत यह है कि नौ साल पहले हमारे कुल कर्ज में 86 फीसद भारतीय बैंकों से उधार लिया गया था. मगर अब हमारी कुल उधारियों में भारतीय बैंकों का हिस्सा महज 32 फीसद है. हमारी तकरीबन 50 फीसद उधारियां अब अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड के जरिए हैं. आप यह तो मानेंगे कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक काफी घाघ होते हैं और पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही निवेश करते हैं.
आप उन आलोचकों को कैसे जवाब देंगे जो कहते हैं कि आपका गगनचुंबी उभार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आपकी नजदीकी की वजह से है?
प्रधानमंत्री मोदी और मैं एक ही राज्य से हैं. यह मुझे ऐसे निराधार आरोपों का आसान निशाना बना देता है. जब मैं पीछे मुड़कर आंत्रप्रेन्योर के तौर पर अपना सफर देखता हूं तो मैं इसे चार दौरों में बांट सकता हूं. कइयों को यह जानकर हैरानी होगी कि यह सब उस वक्त शुरू हुआ जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. उन्होंने एक्जिम पॉलिसी को पहली बार उदार बनाया, कई चीजें ओजीएल (ओपन जनरल लाइसेंस) की सूची के तहत लाई गईं.
इससे मुझे एक्सपोर्ट हाउस शुरू करने में मदद मिली. अगर राजीव गांधी नहीं होते तो आंत्रप्रेन्योर के तौर पर मेरा सफर कभी शुरू ही नहीं हुआ होता. दूसरा बड़ा पुश मुझे 1991 में मिला, जब नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने चौतरफा आर्थिक सुधारों की शुरुआत की. दूसरे कई उद्यमियों की तरह मैं भी उन सुधारों का लाभार्थी था. तीसरा निर्णायक मोड़ 1995 में आया जब केशुभाई पटेल को गुजरात के मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गई.
तब तक गुजरात का पूरा विकास मुंबई-दिल्ली एनएच-8 के इर्द-गिर्द सिमटा था, जो वापी, अंकलेश्वर, भड़ूच, सिलवासा, वडोदरा, सूरत और अहमदाबाद से होकर गुजरता था. वे दूरदर्शी थे और उन्होंने तटीय विकास पर जोर दिया, और यही वह नीतिगत बदलाव था जो मुझे मुंद्रा ले गया और जिसने मुझे अपना पहला बंदरगाह बनाने के लिए उकसाया. और बाकी, जैसा कहा जाता है, इतिहास है.
चौथा निर्णायक मोड़ क्या था?
चौथा निर्णायक मोड़ 2001 में आया, जब मुख्यमंत्री मोदी के कार्यकाल में गुजरात में विकास पर जबरदस्त जोर दिया गया. उनकी नीतियों और उन पर अमल ने आगे चलकर न केवल राज्य का आर्थिक परिदृश्य बदल दिया बल्कि सामाजिक कायापलट हुआ और पहले कम विकसित रह गए इलाकों का विकास हुआ. इसकी वजह से उद्योग और रोजगार ने भी ऐसी उड़ान भरनी शुरू की जैसी पहले कभी नहीं की थी.
आज उनकी काबिल अगुआई में हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर वैसा ही पुनरोत्थान देख रहे हैं. बदकिस्मती यह है कि मुझे बदनाम करने के लिए ऐसे नैरेटिव पूरी ताकत से आगे बढ़ाए जा रहे हैं. मैंने आपको बताया ही कि ये आरोप बेबुनियाद और हाल की घटनाओं के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं, जो तंग नजरिए के चश्मे से हमारे समूह की कामयाबी को देखकर लगाए गए हैं. मेरी पेशेवर कामयाबी किसी एक नेता की बदौलत नहीं है बल्कि तीन दशकों से ज्यादा लंबे वक्त के दौरान कई नेताओं और सरकारों की तरफ से शुरू किए गए नीतिगत और सांस्थानिक सुधारों की वजह से है.
आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व शैली के बारे में क्या कहेंगे?
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को दूरदर्शी और प्रेरणास्पद नेतृत्व दिया है, न केवल अहम नीतिगत बदलाव लाकर बल्कि हरेक भारतीय की जिंदगी को सीधे छूने वाले तमाम कार्यक्रमों और योजनाओं के जरिए भी. राजकाज का बमुश्किल ही कोई पहलू है जिसे उन्होंने छुआ न हो. वे न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था में कायाकल्प करने वाले बदलाव लाने के लिए मेहनत से जुटे हैं बल्कि सामाजिक कायापलट और समावेशी वृद्धि पर भी पूरा जोर दे रहे हैं.
कई नवोन्मेषी योजनाओं और उनके असरदार अमल के जरिए उन्होंने भारत के औद्योगिक और आर्थिक विकास पर भी बहुत ज्यादा जोर दिया है. आत्मनिर्भर भारत, डिजिटल इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया सरीखी योजनाओं ने इकोनॉमिक मल्टीप्लायर (आर्थिक बहुगुणक) का काम किया, बिजनेस और मैन्युफैक्चरिंग के अंतहीन अवसर पैदा किए और लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियों का सृजन किया.
प्रधानमंत्री का इतना ही जोर गरीबों के लिए सुरक्षा जाल के साथ देश के सामाजिक क्षेत्र, कृषि अर्थव्यवस्था और कम विकसित इलाकों पर है, जिससे यह पक्का हुआ कि वृद्धि समावेशी और टिकाऊ हो. स्वच्छ भारत, जन धन योजना, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और आयुष्मान भारत सरीखी उनकी योजनाएं भारत में कायाकल्प करने वाले बदलाव लाईं.
अपने कारोबार के दूसरे क्षेत्रों में भी आपने भारी आलोचना का सामना किया, चाहे वह ऑस्ट्रेलिया हो, श्रीलंका या भारत के कई हिस्सों में किए गए निवेश हों...
गौतम अदाणी लोकतांत्रिक भारत की उपज है. विरोध, आलोचना और आरोप किसी भी धड़कते लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा हैं. दरअसल यही लोकतंत्र को परिभाषित करते हैं. मैं यकीनी तौर पर मानता हूं कि हमारे लोकतंत्र ने हमें आर्थिक स्वतंत्रता और अवसर दिए और हम सबको इसका फायदा मिला. अब हम अच्छी और लाभदायक चीजें चुनकर लोकतंत्र के उन दूसरे पहलुओं के बारे शिकायत नहीं कर सकते जिनका कानून की चारदीवारी के भीतर अपना कामकाजी मोल और अहमियत है.
हम इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में हैं, जो काम करने के लिए सबसे मुश्किल क्षेत्र हैं. आलोचना के प्रति मेरा दिमाग बहुत खुला है. मेरे लिए मेसेज हमेशा मेसेंजर से ज्यादा अहम रहा है. मैं हमेशा अपने भीतर झांकता हूं, और दूसरे के नजरिए को समझने की कोशिश करता हूं. मुझे एहसास है कि मैं न तो परफेक्ट हूं और न ही हमेशा सही हूं. हरेक आलोचना मुझे खुद को सुधारने का मौका देती है.
सारी आलोचना के बावजूद आपने कभी हार नहीं मानी. क्या यह भी अदाणी संस्कृति का हिस्सा है?
हां, हार मान लेना कभी अदाणी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा. इतने सालों के दौरान समूह ने मजबूत और पेशेवर टीम विकसित की है, जिसमें अंतहीन ऊर्जा और समस्याओं को हल करने का नजरिया कूट-कूट कर भरा है. हम हमेशा समाधान की तलाश में रहते हैं.
भारत सरीखे इतने गतिशील लोकतंत्र में अपने हुनर को निखारने के बाद मुझे और मेरे समूह को पूरा विश्वास है कि हम दुनिया के किसी भी हिस्से में डिलिवर और बिजनेस कर सकते हैं. मैंने बचपन से कठिनाइयां और संकट झेले. हर मौके ने मुझे कई बेशकीमती सबक सिखाए और ज्यादा मजबूत बनाया. यही वजह है कि मैं हमेशा अपनी टीम से कहता हूं: 'संकट को कभी मत गंवाओ.’
आप ग्रीन एनर्जी और खासकर सोलर तथा हाइड्रोजन पर बड़ा दांव लगा रहे हैं. निकट भविष्य में उनके लाभदायक बनने का आपको कितना भरोसा है, खासकर, फर्ज कीजिए, ग्रीन हाइड्रोजन को ईंधन में बदलने और जमा करके रखने की लागत को देखते हुए?
ग्रीन एनर्जी मेरे दिल के बहुत करीब है और एनर्जी ट्रांसफॉर्मेशन न केवल कारोबार का विशाल मौका है बल्कि भावी पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है. भारत सरकार बेहद आकर्षक प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआइ) स्कीम लेकर आई है, जिसने ग्रीन हाइड्रोजन कारोबार को फायदेमंद और आकर्षक बना दिया है. दरअसल मुझे पूरा विश्वास है कि इसके साथ हम न केवल घरेलू मांग पूरी करेंगे बल्कि जल्द ही ग्रीन हाइड्रोजन के निर्यातक भी बन जाएंगे.
धीरूभाई अंबानी सरीखे पहली पीढ़ी के आंत्रप्रेन्योर को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. आप भी पहली पीढ़ी के आंत्रप्रेन्योर हैं. आप अपने मेंटॉर के रूप में किसकी तरफ देखते हैं?
धीरूभाई अंबानी भारत के लाखों आंत्रप्रेन्योर के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं. उन्होंने हमें दिखाया कि किस तरह एक मामूली आदमी किसी सहारे या संसाधन के बगैर और तमाम विषमताओं के खिलाफ न केवल विश्वस्तरीय बिजनेस समूह स्थापित कर सकता है बल्कि विरासत भी छोड़कर जा सकता है. मामूली शुरुआत करने वाला पहली पीढ़ी का आंत्रपे्रन्योर होने के नाते मैं उनसे बहुत ही प्रेरित हूं.
आगे देखें तो आने वाले साल में भारत की आर्थिक वद्धि को आप किस तरह देखते हैं?
आजादी के हमारे 75 साल में जीडीपी के पहले ट्रिलियन (एक खरब) डॉलर पर पहुंचने में हमें 58 साल, अगले ट्रिलियन पर पहुंचने में 12 साल और तीसरे ट्रिलियन पर पहुंचने में महज पांच साल लगे. लेकिन अब अगर आप सामाजिक और आर्थिक सुधारों की हमारी रक्रतार को देखें तो मैं भारत को अगले दशक के भीतर हर 12 या 18 महीनों में अपनी जीडीपी में एक ट्रिलियन जोड़ते देखता हूं.
मैं भारत की वृद्धि और समृद्धि को लेकर बहुत आशावादी हूं. यह आशावाद इस तथ्य से आता है कि 2050 में हमारे यहां 1.6 अरब लोगों का युवा भारत होगा, जिसकी औसत उम्र 38 होगी. हमारे यहां दुनिया की सबसे ज्यादा मिडिल क्लास आबादी भी होगी. यह डेमोग्राफिक डिविडेंड और इसके साथ सबसे बड़ा मिडिल क्लास भारत की वृद्धि और समृद्धि को जोरदार बढ़ावा देगा और इसे 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बना देगा. इसलिए साफ तौर पर यह सदी भारत की है.
आखिर में, कई विशेषज्ञ 2023 में वैश्विक मंदी की आहट देख रहे हैं. क्या ऐसी भविष्यवाणियों से आप परेशान हैं?
मैं पैदाइशी आशावादी हूं और कभी उम्मीद नहीं खोता. मुझे याद है कि 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान भी कई पंडितों ने भारत के लिए ऐसा ही उदास दृश्य चित्रित किया था. मगर उन भविष्यवाणियों को परास्त करने में भारत कामयाब रहा. मुझे उम्मीद है कि अगला केंद्रीय बजट इन सारी चिंताओं के समाधान का बड़ा मौका देगा. पूंजीगत खर्च, रोजगार, सामाजिक इन्फ्रास्ट्रचक्चर और सामाजिक सुरक्षा पर जोर देने से मंदी के वैश्विक झोंकों से बचने में मदद मिलेगी. भारत इससे और मजबूत होकर उभरेगा.
''मेरी भूमिका रणनीति बनाने, कैपिटल एलोकेशन और कामकाज की समीक्षा करने तक सीमित है. यही वजह है कि मेरे पास इतने विशाल समूह को संभालने के साथ-साथ नए मौके तलाशने का भी वक्त होता है’’
''प्रधानमंत्री मोदी से मेरी नजदीकी को लेकर लगाए जाने वाले सारे आरोप बेबुनियाद हैं. मेरी पेशेवर कामयाबी किसी एक नेता की बदौलत नहीं है बल्कि तीन दशकों से ज्यादा लंबे वक्त के दौरान कई नेताओं और सरकारों की तरफ से शुरू किए गए नीतिगत और सांस्थानिक सुधारों की वजह से है ’’
''एनडीटीवी भरोसेमंद, स्वतंत्र, वैश्विक न्यूज नेटवर्क होगा, जहां मैनेजमेंट और एडिटोरियल के बीच स्पष्ट लक्ष्मण रेखा होगी... अभी से इस बारे में राय बनाने से पहले मेहरबानी करके हमें कुछ वक्त दीजिए’’
''अरुणिमा सिन्हा और किरण कनोजिया की कहानियां जानकर मेरा यह यकीन और पुक्चता हुआ कि इनसानी दिमाग से ज्यादा मजबूत कोई मशीन नहीं है. ऐसी कहानियां मेरे लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत हैं’’.

