आलोचना: पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआइए) अधिसूचना 2020 का मसौदा 2006 में बने नियमों को हल्का करता है, इसे उद्योगों का हमदर्द बना देता है और पर्यावरण की चिंताओं की अनदेखा करता है.
जावडेकर: नया ईआइए 2006 की ईआइए अधिसूचना में हुए 55 संशोधनों और इसमें बदलाव के लिए जारी 230 ऑफिस मेमोरैंडम का संकलन भर है.
आ: ईआइए 2020 'पूर्व प्रभाव से’ मंजूरी का प्रावधान करता है, यह बिना मंजूरी चल रही परियोजनाओं को अनुमति लेने और जुर्माना अदा करके उल्लंघनों से बच निकलने देता है.
जा: यह प्रक्रिया पूर्व प्रभाव से मंजूरी देने के बराबर नहीं है; 2002 से ही इस प्रावधान पर अमल होता आ रहा है. नए ईआइए ने जुर्माने का पैमाना और धनराशि बढ़ा दी है.
आ: सुप्रीम कोर्ट का फैसला है कि ''पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी’’ की अवधारणा पर्यावरण न्यायशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है; लिहाजा सरकार ने अदालत के आदेश का उल्लंघन किया है.
जा: उसी आदेश में, और उससे पहले भी कई मौकों पर सुप्रीम कोर्ट और ऊंची अदालतों ने अनुरूपता का सिद्धांत लागू किया था और कहा था कि पर्यावरण मंजूरी का अनुपालन नहीं करने की वजह से प्रतिष्ठान बंद नहीं किया जा सकता
आ: अलग-अलग किस्म के 40 उद्योगों को पूर्व पर्यावरण मंजूरी से छूट दे दी गई है.
जा: इनमें कई रियायतें यूपीए सरकार के दौरान दी गई थीं.
आ: नया मसौदा सरकार की तरफ से 'रणनीतिक’ बताई गई किसी भी परियोजना को ईआइए के दायरे से बाहर रखने की छूट देता है. सार्वजनिक छानबीन से बचने को परियोजनाएं रणनीतिक की श्रेणी में रखा जा सकती हैं.
जा: सुरक्षा एजेंसियां तय करेंगी कि क्या रणनीतिक है, क्या नहीं.
आ: सार्वजनिक विचार-विमर्श की जरूरत को कई श्रेणियों के लिए तिलांजलि दे दी गई है, इस तरह इन परियोजनाओं से प्रभावित लोगों का लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिया गया है और ईआइए प्रक्रिया की पारर्दिशता को कमजोर कर दिया गया है.
जा: केवल स्वच्छ टेक्नोलॉजी वाले एमएसएमई और उद्योगों को छूट दी गई है. 2006 की अधिसूचना में नौ श्रेणियों को जन सुनवाई से छूट दी गई थी. उसे घटाकर सात पर लाया गया है. यूपीए की सरकार के वक्त 19 क्षेत्रों में जनसुनवाई की जरूरत नहीं थी. अब इस सूची से सीमेंट, ताप बिजली, स्टील, कागज सरीखे बहुत ज्यादा प्रदूषक उद्योगों को हटा दिया गया है.
आ: जन सुनवाई के लिए नोटिस अवधि 30 से 20 दिन हो गई है.
जा: आजकल संचार के साधन तेज रफ्तार हो गए हैं. इसके लिए 20 दिन काफी हैं.
आ: उल्लंघनों की जानकारी सरकार और परियोजना के प्रस्तावक ही दे सकते हैं, नागरिक नहीं. उल्लंघन करने वालों से ही जानकारी देने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
जा: उल्लंघन कोई भी सरकार की जानकारी में ला सकता है. जहां जरूरी होगा, कार्रवाई होगी.
आ: 2006 की अधिसूचना में हर छह महीने में परियोजना की अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करना जरूरी था. अब इसे बढ़ाकर एक साल कर दिया गया है. इस तरह उल्लंघनों को जांच-पड़ताल से बचे रहने के लिए ज्यादा लंबा वक्त दे दिया गया है जिससे पर्यावरण को गंभीर नुक्सान होने का जोखिम बढ़ गया है.
जा: साल में एक रिपोर्ट दाखिल करने में कुछ भी गलत नहीं. जोर इस बात पर होना चाहिए कि ये रिपोर्ट पढ़ी जाएं और उन पर कार्रवाई हो. सरकार इसी दिशा में काम कर रही है.
आ: नया ईआइए उद्योगों को ए, बी1 और बी2 श्रेणियों में बांटता है. पहले श्रेणियां बनाने और उनमें बांटने का विवेकाधिकार राज्यों को दिया गया था.
जा: एक राज्य ने अगर एक उद्योग को ए श्रेणी में रखा है और दूसरे राज्य ने उसी उद्योग को श्रेणी बी में रख दिया, तो इससे उलझन पैदा होती थी. केंद्र ने उसे आसान बना दिया है.
आ: राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरणों (एसईआइएए) की नियुक्ति का मंत्रालय का फैसला सहकारी संघवाद की भावना के खिलाफ है.
जा: एसईआइएए के सदस्यों की नामजदगी केंद्र सरकार का अधिकार है. दिल्ली और झारखंड सरीखे कई राज्यों ने बीते तीन साल से बार-बार याद दिलाने के बावजूद अपने एसईआइएए के लिए लोगों को नामजद नहीं किया. लिहाजा, केंद्र सरकार को दखल देना पड़ा.

