आपके कबड्डी खेलने पर परिवार को ऐतराज क्यों था?
मैं पटना (बिहार) जिले के दूरदराज के एक गांव की एक मुस्लिम फैमिली से हूं. हाफ पैंट, जींस, कटे बाल, इन सब पर वहां पाबंदी थी. दादी अक्सर कहतीं कि खानदान का नाम डुबो रही है. एक अंकल ने तो जींस पहनकर अपने घर आने से रोक दिया. लेकिन खराब आर्थिक स्थिति के बावजूद मम्मी-पापा मेरे साथ खड़े रहे.
विरोध का सामना किस तरह से किया?
गांव वालों को मेरा खेलना पसंद न था, इसलिए वे ग्राउंड में शौच कर देते, टूटा शीशा और कीलें फेंक देते. जिसके घर कपड़े बदलती, उस पर भी मुझे न आने देने के लिए दबाव डालते. स्थायी ग्राउंड न था, सो 10-15 ग्राउंड बदले.
ऐसे हालात में भी क्या चीज थी जो ताकत दे रही थी?
हमारे मम्मी-पापा. उन्हें काफी भला-बुरा सुनना पड़ता. पर वे विचलित नहीं हुए. उनके बारे में लोग तरह-तरह की उलटी-सीधी बातें करते. पापा के प्रयास से कई और मुस्लिम लड़कियां आने लगीं लेकिन प्रतिक्रियावादी समाज के दबाव में उन्हें वापस जाना पड़ा. मैंने दूसरे गांवों की लड़कियों के साथ अभ्यास जारी रखा.
सबसे बड़ा खुशी का मौका क्या था?
ईरान से जब (एशियन महिला कबड्डी-2017) का स्वर्णपदक जीतकर गांव पहुंची तो अब तक मुझे हिकारत से देखने वालों ने दिल खोलकर स्वागत किया. मुझे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था. पटना में मुख्यमंत्री (नीतीश कुमार) ने भी बधाई दी.
ईरान तक का रास्ता कैसे बना?
पहली दफा 2007 में गांव से आरा गई थी खेलने. तब 100 रु. इनाम में मिले थे. 39वीं से 41वीं जूनियर नेशनल कबड्डी चैंपियनशिप और 60वीं से 64वीं सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में बेहतर प्रदर्शन से ईरान तक का रास्ता बना.

