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राजनैतिक सत्ता के सामने हम आसानी से झुक जाते हैं: रोमिला थापर

82 की उम्र में भी रोमिला थापर की कलम में पहले जितनी ही ताकत है. जानी मानी इतिहासकार ने हाल ही में एक किताब लिखी हैः द पास्ट ऐज प्रेजेंट. उनसे खास बातचीत.

अपडेटेड 14 अप्रैल , 2014
‘‘अगर वर्तमान पर सच्चाई की मुहर लगाने के लिए अतीत का सहारा लेना पड़ता है, तो ऐसे अतीत की वैधता की लगातार पड़ताल होती रहनी चाहिए.’’ ‘‘राष्ट्रों को नई पहचान की जरूरत होती है. इसमें भरोसेमंद इतिहास जरूरी है.’’ ‘‘परंपरा की मिसाल देने से पहले हमें सवाल करना चाहिए कि हम किसकी परंपरा अपना रहे हैं, किस जाति, किस वर्ग, किस धार्मिक संप्रदाय और किस क्षेत्र की.’’ 82 वर्ष की उम्र में भी रोमिला थापर की कलम में पहले जितनी ही ताकत है. जानी-मानी इतिहासकार ने हाल ही में एक किताब लिखी है, जिसमें वर्तमान की दास्तान है. नाम है  द पास्ट ऐज प्रेजेंट. इसमें उनका आग्रह है कि हमें जो भी ज्ञान मिले उस पर हमेशा सवाल उठाएं, गैर-पारंपरिक विचारों की संभावनाओं को टटोलें और अगर हमें समाज के रूप में आगे बढऩा है तो इतिहास की व्याख्याओं पर बहस करें. रोमिला अपनी पिछली किताब द पास्ट बिफोर अस के बारे में अमेरिका के आधा दर्जन विश्वविद्यालयों में लेक्चर के लिए छह हफ्ते के दौरे पर निकलने की तैयारी में थीं. इसी बीच उन्होंने टेलीफोन कॉल और शानदार किताबों के संग्रह की लिस्ट बनाने की व्यस्तता से वक्त चुराकर संपादक कावेरी बामज़ई से बात की. वे बता रही हैं कि अपनी गलतियों से सीखने की जरूरत क्यों है?

दीनानाथ बत्रा हमें बताने पर तुले हैं कि हमें वेंडी डोनिगर को पढऩा चाहिए या नहीं. तो क्या विचारों की अगली जंग छिड़ चुकी है? यही वे लोग हैं, जिन्होंने 15 साल पहले आपकी लिखी टेक्स्ट बुक्स को लेकर आप पर हमला बोला था. क्या हमारे पास इस नई व्यवस्था के पैरोकारों का सामना करने के लिए सक्षम नेतृत्व है?

फिलहाल तो ऐसा नेतृत्व नजर नहीं आता. लेकिन जब हालात काबू से बाहर हो जाते हैं तो अपने आप नए रास्ते खुल जाते हैं. इसीलिए मैंने किताब का आखिरी अध्याय दिसंबर 2012 की बलात्कार की घटना के बाद के आंदोलन के बारे में लिखा है. जब लोग सचमुच सड़कों पर उतर आए थे. अगर उससे एक हफ्ते पहले किसी ने मुझसे पूछा होता कि क्या कोई विरोध होगा, तो मैंने इनकार कर दिया होता, लेकिन कुछ ही घंटों के भीतर बहुत सशक्त मत सामने आने लगा. मैं उससे बेहद प्रभावित हुई. यही उम्मीद की जा सकती है कि कहीं न कहीं कोई वैकल्पिक मत होगा, जो सामने आएगा.

ऐसा तभी होगा न जब लोग यह समझेंगे, जैसा आपने कहा है कि शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने का साधन या पासपोर्ट नहीं है. उससे अधिक महत्वपूर्ण है.
शिक्षा सिर्फ एक योग्यता नहीं है. शिक्षा एक मानसिक अवस्था है. मुझे लगता है कि यही बात उन लोगों की समझ में नहीं आ रही जो शिक्षक हैं, जिन्होंने शिक्षा ली है और जो अब शिक्षा दे रहे हैं. जोर इस बात पर होना चाहिए कि दिमाग की वह कौन-सी अवस्था है जिसका हम निर्माण करना चाहते हैं.

आपने किताब में लिखा है कि राष्ट्रों को पहचान की जरूरत होती है, जिसमें भरोसेमंद इतिहास बेहद अहम है.
एकदम. पहचान इतिहास पर आधारित होती है क्योंकि लोग हमेशा अतीत की बात करते हैं. पहचान समकालीन समस्याओं पर भी आधारित होती है और पहचान में अतीत के बारे में समकालीन सोच की दिशा का भी योगदान होता है. लेकिन आप अतीत के बारे में जिस ढंग से सोचते हैं, अगर वह अपने मन से चुना गया इतिहास है तो आप ऐसी पहचान बनाते हैं, जो कारगर नहीं होती. अगर इतिहास विवादित होने के बावजूद उस पर बहस हो, चर्चा हो, खुलकर बातें और विचारों के स्रोतों पर चर्चा हो तो वह व्यावहारिक होता है.

आम पाठक को भी सिखाना होगा कि आपको विचारों की उत्पत्ति पर सवाल उठाना होगा और इस बात पर भी सवाल करना होगा कि विचारों को कैसे थोपा जा रहा है. कोई भी विचार अलग से मौजूद नहीं रहता, उसकी जड़ें समाज में होती हैं. इसलिए किसी भी विचार पर गौर करना, उसकी उत्पत्ति पर सवाल उठाना और यह जानना कि विचार कौन लाया, उसका क्या काम है, उसे कैसे अपनाया जा रहा है, क्या उसका बेहतर उपयोग हो सकता है और विचार हमें कहां ले जा रहा है, बेहद जरूरी है.

आपका कहना है कि अब पौराणिक कथाओं को इतिहास मानने की परंपरा बढ़ती जा रही है. बीजेपी और आरएसएस जिस तरह से प्रतीकों को अपना रहे हैं और बीजेपी तथा कांग्रेस के बीच जिस तरह का प्रतीक युद्ध चल रहा है उसमें यही कुछ तो हो रहा है, कि नहीं?
सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि प्रतीक कब चुना गया, जैसे गुजरात में सरदार पटेल. और इस सवाल का विस्तार से जवाब देना होगा कि यही प्रतीक क्यों चुने गए. चुनने की एक प्रक्रिया है. इन्हें क्यों चुना गया? इसका संबंध उस व्यक्ति की राजनीति से ज्यादा होता है. वह पसंद एक राजनैतिक दल की है क्या? फिर यह सवाल उठता है कि इन प्रतीकों का तब अर्थ क्या था, जब ये जीवित थे.

लेकिन उनके बारे में पर्याप्त जानकारी तो नहीं है न?
इसकी दो वजहें हैं. एक तो स्कूल और कॉलेज स्तर पर आज भी इतिहास बेहद पुराने पड़ चुके ढंग से पढ़ाया जा रहा है, जिससे उसकी उपयोगिता नजर नहीं आती. दूसरे राजनैतिक पार्टियां उसका दुरुपयोग कर रही हैं. मिसाल के तौर पर औरंगजेब जैसा उलझा हुआ चरित्र, जिसमें गुण और दोष दोनों थे.

औरंगजेब के चरित्र की जटिलताओं को समझने की क्षमता ही नहीं है. उसे आततायी और हिंदू विरोधी घोषित करने की होड़ मची हुई है. हालांकि जैसा इस मामले में हुआ, राजा बनना अपने आप में बेहद जटिल काम है, जिसमें आप किसी को अच्छा और किसी को सिर्फ बुरा कहकर खारिज नहीं कर सकते. यह गलत इतिहास है. सही इतिहास के लिए उन कारणों की गहराई से छानबीन जरूरी है, जिनकी वजह से इतिहास में लोगों ने किसी खास तरह से व्यवहार किया.

एनडीए ने गलत तरह की बातों पर बहुत ज्यादा ध्यान देकर शिक्षा को खत्म ही कर डाला तो शायद यूपीए ने सही बातों पर ज्यादा ध्यान न देकर उसकी हत्या कर दी?
गंभीरता से सोची-समझी शिक्षा नीति को कब अपनाया गया? हमारी दो-तीन पीढिय़ां गुजर गई हैं. मुश्किल यह है कि जैसे सरकार गांव में स्कूल खोलती है तो आम तौर पर ऊंची जाति वाले इलाकों में खोलती है और अगर निचली जातियों के बच्चे वहां जाते हैं, तो उनका मजाक उड़ाया जाता है. बहुत-से बच्चे स्कूल जाना बंद कर देते हैं. इसलिए बेहद जरूरी है कि अच्छे स्कूल निचली जाति वाले इलाकों में या उनके आसपास खोले जाएं.

दूसरा मसला यह है कि रेडियो और टेलीविजन का इस्तेमाल शिक्षा से जुड़े उद्देश्य के लिए नहीं हो रहा है. इसकी वजह यह है कि शिक्षा के महत्व पर जोर नहीं है. लोग आपका आकलन इस आधार पर नहीं करते कि आपकी शिक्षा कैसी है, बल्कि आप कितना पैसा बहा सकते हैं.

क्या आपको लगता है कि हमारे नेताओं की इतिहास में खास दिलचस्पी नहीं है?
ऐसा नहीं है कि नेतृत्व ने सिर्फ  इतिहास में दिलचस्पी खो दी है. अगर आपका नेतृत्व पूरी शिक्षा को ही बेहतर बनाए जाने को महत्व नहीं देता तो वह फौरी सियासी फायदे के सिवा हर चीज के प्रति बेरुखी दिखाएगा. इसके अलावा राजनीति में आ रहे लोगों की क्वालिटी को लेकर भी सवाल है. यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि क्या नंदन नीलेकणि जैसे लोग कोई बदलाव ला सकते हैं. हम ऐसी चर्चा भी बहुत सुन रहे हैं कि हमारा समाज हमेशा सहनशील और अहिंसक रहा है. जरा आसपास नजर डालिए, सहनशीलता कहां है? अहिंसा कहां है?

दक्षिणपंथियों को सरदार पटेल या विवेकानंद को अपनाने की जरूरत क्यों पड़ी? वे सावरकर और गोलवलकर का बखान क्यों नहीं करते?
हिंदू राष्ट्रवादी या मुस्लिम राष्ट्रवादी कहलाना अपने आप में विरोधाभासी है क्योंकि राष्ट्रवादी होने का मतलब ही यही है कि आपकी पहचान आपकी धार्मिक या जातिगत अथवा आपकी क्षेत्रीय पहचान के दायरे से कहीं ज्यादा व्यापक है. आप इससे कैसे मुक्ति पाएंगे? अगर आप कोई ऐसा प्रतीक चुनते हैं, जो सावरकर जैसा खांटी हिंदू प्रतीक है, तो भारतीय नागरिक होने का नजरिया सीमित हो जाएगा क्योंकि सावरकर का तो साफ  मत था कि भारत का मूल नागरिक हिंदू है.

दक्षिणपंथी श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम क्यों नहीं लेते?
शायद इसलिए कि उन्होंने ऐसी कोई विरासत नहीं छोड़ी और शायद उनकी ऐसी उग्र धारणा भी नहीं रही थी? अब यह भावना तो पनप रही है कि उनकी नजर में वे राजनैतिक सत्ता हथियाने के करीब हैं, तो उन्हें कुछ रियायतें तो देनी पड़ेंगी.

जैसा 1999 में हुआ था, अगर उसी तरह इतिहास और शिक्षा से छेड़छाड़ हुई तो क्या हम उसका मुकाबला करने के लिए तैयार दिखते हैं?
नहीं. हम उससे निबटने में सक्षम नहीं हैं. उसकी वजह यह है कि हम राजनैतिक सत्ता के सामने बहुत आसानी से झुक जाते हैं. हमारे पास तार्किकसोच के आधार पर लगातार एक-सा रुख अपनाने और ऐसी किसी चुनौती का विरोध करने लायक मजबूत रीढ़ भी नहीं है. हम यह सोच भी नहीं पाते कि हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था में क्या चाहिए. बच्चों और नौजवानों को पढ़ाने की प्रक्रिया में तार्किक सोच और संवेदनशीलता जरूरी है. 

द पास्ट ऐस प्रेजेंट

 द पास्ट ऐज प्रेजेंटः फोर्जिंग कंटेम्पररी आइडेंटिटीज थ्रू हिस्ट्री
रोमिला थापर
प्रकाशकः अलेफ
कीमतः 595 रु.
पेजः 329
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