ऐसी सुगबुगाहट है कि रामपुर में जया प्रदा की गाड़ी से उतरी लाल बत्ती के पीछे आजम खान का हाथ है. प्रमुख संवाददाता पीयूष बबेले ने आजम खान से इस संबंध में बातचीत की. पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश.
जब से जया प्रदा की गाड़ी से लाल बत्ती उतार ली गई, तब से लोग कह रहे हैं कि आजम साहब इतने बड़े मंत्री बन गए फिर भी मामूली अदावतों को भूल नहीं पा रहे?
इस इश्यू से हमारा कुछ लेना-देना नहीं है. और जिस दिन की यह बात है, उस दिन मैं बरेली की गलियों में यूनिवर्सिटी के लिए फर्नीचर ढूंढने गया था. रात 1 बजे रामपुर पहुंचा तो मेरी इत्तिला में आया कि ये वाकया होकर निबट गया है.
लेकिन रामपुर के बारे में तजुर्बा यही कहता है कि यहां तो हर काम में आपकी मौन सहमति होती है?
न तो ये मौन सहमति का था, न सहमति का. हां, मुझे वापस आकर पता चला कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस साहब ने कोई फैसला दिया है लाल बत्तियों के इस्तेमाल पर. मैं खुद भी लाल बत्ती का इस्तेमाल नहीं करता हूं. मैं मंत्री रहा, राज्यसभा में रहा, लेकिन मैंने खुद कभी लाल बत्ती नहीं लगाई.
क्या आपने अपने बाकी सांसदों से भी लाल बत्ती हटाने को कहा है?
मेरा इससे कोई कंसर्न ही नहीं है. कोई आदमी अपनी गाड़ी की छत पर 50 लाल बत्तियां लगा ले. क्या लेना-देना. प्रिवीपर्स खत्म होने के बाद भी लोग अपने को राजा और नवाब लिखते हैं. लाल बत्ती लगने से, उसके साइज से, उसकी क्वालिटी से, उसकी तेज रोशनी से किसी नेता का कद नहीं तय होता. बापू की गाड़ी पर तो कभी लाल बत्ती नहीं लगती थी, लेकिन बापू आज तक बापू हैं.
खैर छोड़िए, ये बताइए कि इस पूरे मामले पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?
मेरा मामला ऐसा है कि इन मोहतरमा के बारे में मैं ऐसा कमनसीब आदमी हूं कि अच्छा किया तो भी बुरा हुआ और खुदा न करे, कुछ बुरा किया या कुछ बुरा करूं तो पता नहीं क्या हो. नहीं करने पर तो कौन-सी गाली है जो मुझे नहीं पड़ रही है. अगर कुछ दखल हमारा होता तो पता नहीं क्या होता? इसलिए मैंने प्रतिक्रिया से खुद को दूर रखा.

