समाजवादी पार्टी सरकार के एक साल में हुए कई दंगों में लगातार मुसलमानों के शिकार बनने और पिछले दिनों एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी की हत्या में पूर्व मंत्री राजा भैया का नाम आने से पैदा सूरते-हाल पर प्रदेश के नगर विकास और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मो. आजम खान से प्रमुख संवाददाता पीयूष बबेले ने बातचीत की. पीड़ित परिवारों से मिलकर लौटे मंत्री ने माना कि राजा भैया को मंत्री बनाना बड़ी गलती थी. साथ ही उन्होंने कहा कि मुसलमानों को आज भी देश में गद्दार की तरह देखा जाता है. उन्होंने स्वीकार किया कि प्रदेश में साल भर में हुए अपराधों के लिए वे शर्मसार हैं.
सपा सरकार को आए एक साल हो गया है. इस दौरान आप लोग क्या कर पाए?
दरअसल हम इस एक साल को तजुर्बे और इम्तहान का साल कह सकते हैं. जो सरकार गई है, वह बेशुमार सवालात छोड़ कर गई है. उससे बड़ी बात यह हुई कि मीडिया से लेकर नेताओं तक किसी को यह भरोसा नहीं था कि समाजवादी पार्टी इतने बहुमत से सरकार बना लेगी. उन्होंने अपनी तौहीन-सी समझी. हर छोटी-सी बात, एक बड़ी वजह बनी हमारी बदनामी की. जो जुर्म हुए, जो क्राइम हुए, उनको कोई अच्छा तो कह नहीं सकता. लेकिन बीएसपी सरकार में दहशत का जो माहौल था, अब वैसा दहशत का माहौल नहीं है.
लेकिन इस एक साल में जुर्म तो बढ़े हैं?
जहां तक जुर्म का सवाल है. अगर बसपा सरकार के तरीके को अपनाया गया होता, उगाही के लिए लोगों के कत्ल किए जाते, रिश्वत के लिए लोगों के कत्ल हुए होते, तो वह बहुत शर्मनाक सूरते-हाल हुई होती. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कोई हिडिन हैंड अपराधियों को उकसाने का काम कर रहा है. ये अपराध हमारी सरकार में हुए, यह हमारे लिए शर्म की बात है. इस वक्त प्रतापगढ़ के इस एक वाकये को छोड़कर कोई ऐसा वाकया नहीं हुआ जब रिपोर्ट लॉज नहीं हुई. ये तो बड़ा मामला था. हाइलाइटेड मामला था. एक मंत्री का मामला था. एक सीओ की हत्या का मामला था. एक प्रधान और उसके भाई की हत्या का मामला है. इसमें भी चार में से तीन आरोपी जेल में हैं.
लेकिन चौथे का क्या?
देखिए, इसमें हम गिरफ्तारी न होने को कोई जस्टीफाई नहीं कर रहे हैं. चूंकि केस सीबीआइ को सुपुर्द कर दिया गया है. उसे पूरा अधिकार रहेगा और हम पूरी तरह सहयोग कर रहे हैं.
ऐसे व्यक्ति को मंत्रिमंडल में लाना क्या जोखिम भरा काम नहीं था?
बेशक राजा भैया को मंत्रिमंडल में लाना जोखिम का काम था. क्योंकि उन्हें मंत्रिमंडल में लिया गया औैर ये हादसा पेश आ गया. हमारे पास अपनी सफाई में कहने को कुछ नहीं है.
पीछे मुड़कर देखें तो एक साल में हुए कई दंगों में लगातार मुस्लिम निशाना बने? क्या इससे मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव से मुसलमानों का भरोसा टूटेगा नहीं?
क्या आप यह समझ्ते हैं कि सरकार ने बहुत खुशी महसूस की होगी. इन दंगों में. जो सरकार मुसलमानों के सहयोग से, पिछड़ों के सहयोग से, कमजोरों के सहयोग से सत्ता में आई हो, वह सरकार मुसलमानों को दंगे करके मारकर खुद को बरबाद करना चाहेगी. आखिर ये भी तो सोचिए कौन लोग हैं इसके पीछे. उन लोगों को रोकने के लिए दो तरीके हो सकते हैं. एक तो, जैसी कार्रवाई दहशतगर्द करते हैं, कोई डिक्टेटर करता है, वैसी कार्रवाई की जाए. लोकतंत्र में उसके लिए जगह नहीं है. सरकार ने जो भी कार्रवाई की काननू के दायरे में की. दंगा करने वालों ने एक मिशन बना लिया कि हम इस सरकार को बदनाम करके रहेंगे.
तो क्या उत्तर प्रदेश सरकार कानून के दायरे में दंगाइयों को रोक पाने में अक्षम है?
रोकने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कोई बड़ा फसाद न हो जाए, यह भी देखना है. क्योंकि आप यह जानते हैं कि यह प्रदेश 30 अक्तूबर, 1990 (अयोध्या में गोली चलने का दिन) और 6 दिसंबर, 1992 (बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की तारीख) जैसी कई तारीखें देख चुका है. उसका बड़ा नुकसान कमजोरों को ही हुआ. छुरी खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरी पर गिरे, नुकसान खरबूजे का ही होना है.
21 साल बाद कोई मुसलमान पीसीएस बना और वह भी मार दिया गया. इससे मुस्लिम समाज को कितना नुकसान हुआ?
हमारे बीच का अगर कोई इस स्तर का पुलिस अधिकारी कत्ल किया जाता है तो हमें सोचना होगा कि आखिर हमारा भविष्य क्या है? यह सवाल सिर्फ किसी राजनैतिक दल के लिए नहीं है, पूरे समाज के लिए है. हम 1947 में पाकिस्तान नहीं गए, यूपी से कोई पाकिस्तान गया नहीं है. जिन्ना साहब का पाक का नारा तो फेल हो गया. पाकिस्तान गए डेढ़ फीसदी लोगों की सजा साढ़े 98 फीसदी को दी जाएगी? क्या हमारे साथ इंसाफ होगा? मौलाना आजाद थे हमारे नुमाइंदे, जिन्ना नहीं थे. देश नहीं बंटता तो बंटवारे के नाम की नफरत नहीं होती और जो आज हमारे साथ हो रहा है, वह नहीं होता. सबसे ज्यादा लूजर हम हैं, नुकसान तो सिर्फ हमारा हुआ है. बंटवारा हुआ तो अपने ही वतन में गद्दार कहलाए. कितना भी दिल निकालकर दे दें, यही कहा जाएगा कि अब दे रहे हो जब धड़क नहीं रहा है. हम तो जान से गए और जिसे दिल दिया, उसने कद्र नहीं की.
क्या आप यह कहना चाह रहे हैं, कि मुसलमानों से सौतेला व्यवहार होता है?
सौतेला तो नहीं, लेकिन समझने में गलती हुई. जिस दिन यह समझ लिया जाएगा कि जितना हक हिंदुस्तान में अटल बिहारी वाजपेयी साहब का है सोनिया गांधी का, मनमोहन सिंह और मुलायम सिंह यादव का है उतना ही हक मुसलमान का है, तो सारे मसले खुद खत्म हो जाएंगे.
सपा ने वादा किया था कि आतंकवाद के आरोप में बंद बेगुनाहों को रिहा कराया जाएगा. इस वादे पर ज्यादा अमल क्यों नहीं हो सका?
आतंकवाद में एक तो मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी होती है. उसके बाद एक-दूसरे से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी होती है. इन दूसरी तरह की गिरफ्तारियों में जो बेगुनाह इंगित हुए उन में पुलिस ने अपनी रिपोर्ट अदालत में पेश की. बहुत हाइलाइटेड केसों में भी तरीका तो यही होगा. पुलिस अपनी रिपोर्ट देगी, अब फैसला अदालत के हाथ है. इसमें हमारा कोई दखल नहीं है.
क्या संवेदनशील पुलिस की जरूरत है?
जो लोग मुसलमानों पर आतंकवादी होने का इल्जाम लगाते हैं. जो लोग यह कहते हैं कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है, लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान है. वह ‘‘अभिनव भारत’’ को भूल जाते हैं. और वह ये भूल जाते हैं कि जब दिल्ली की सड़कों पर सामूहिक बलात्कार के मामले को लेकर सारे हिंदुस्तान के नौजवान पंजों पर खड़े हो जाते हैं और सरकार से एक मजबूत कानून की मांग करते हैं. जब केंद्र सरकार को ये लगने लगता है कि तहरीर चौक की तरह कोई इंकलाब न आ जाए. तभी सरहदों पर अचानक दो सिर उतर जाते हैं. और अलगे दिन कोई मामला नहीं रहता और बात खत्म हो जाती है.
ये सवाल जो आपने उठाया तो क्या ये सवाल आपकी पार्टी को संसद में नहीं उठाना चाहिए था?
मैं इस पर कुछ कह नहीं सकता.
लेकिन यह तो बताइए कि आपके नेताजी ने संसद में बीजेपी से सशर्त साथ आने की बात क्यों उठाई? क्या बीजेपी के साथ रिश्तों की गुंजाइश है?
बीजेपी के लिए गुंजाइश का कोई सवाल ही नहीं उठता. न ऐसा हमारा इतिहास है. भारतीय जनता पार्टी को यह अहसास दिलाना था, हमारे नेता को, उन्हें पूरे देश को यह दिखाना था कि इन लोगों के पास और इन लोगों की दुकान में नफरत के सिवाय कोई सामान नहीं है. इन्हें कितना भी पुकारो ये अंधे हैं, ये बहरे हैं, ये बिना पैरों के हैं, इनके हाथ नहीं हैं. ये फासिस्ट थे और फासिस्ट रहेंगे.
क्या आपको नहीं लगता कि मोदी के मिशन 2014 से मुस्लिम कांग्रेस की तरफ जा सकते हैं?
पिछली बार सपा को नुकसान कांग्रेस की वजह से नहीं हुआ था, पिछली बार मुसलमान कन्फ्यूज हो गया था किसी खास वजह से..
यानी आप उस समय पार्टी में नहीं थे इसलिए मुस्लिम कन्फ्यूज हुए?
ये सब कहने का वक्त नहीं है. बात की बड़ी कड़वाहट होगी. लेकिन मुसलमान कन्फूज हो गया था.
मुसलमानों के लिए आगे आपके पिटारे में क्या है?
मैं मुस्लिमों के लिए एक खास चार्टर पर काम कर रहा हूं. जल्द ही नेताजी से मिलकर इसे अंतिम रूप दूंगा. आप ये समझ लीजिए कि इसमें मुसलमानों की शिक्षा और रोजगार की ठोस व्यवस्था होगी. जैसे कोई इंजीनियर है तो उसे इतनी मदद मिल सके कि वह अपना रोजगार शुरू कर सके. हम मिस्तरी पैदा करने वाली व्यवस्था को खत्म कर देंगे.

