पिछले साल उत्तर प्रदेश में सपा की शानदार जीत के बाद ऐसे कयास लगाए जाने लगे थे कि 'नेताजी' यानी समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव केंद्र की राजनीति में हलचल मचाएंगे. उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार रहने को कह दिया था. उनके उत्साह से लगता था कि तीसरा मोर्चा एक बार फिर उभर सकता है. लेकिन केंद्र में तृणमूल कांग्रेस के गठबंधन सरकार से बाहर होने के बाद भी कुछ नहीं हुआ. कुछ लोग मानते हैं कि कांग्रेस ने सपा का समर्थन बरकरार रखने के लिए मुलायम सिंह परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले को हथियार बना रखा है, हालांकि नेताजी इसे सैद्धांतिक मुद्दों पर समर्थन मानते हैं. इस बार उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को सितंबर में चुनाव के लिए तैयार रहने को कहा है. देश की राजनैतिक दशा-दिशा पर इंडिया टुडे ग्रुप के चैनल आज तक के अशोक सिंघल से उनकी बातचीत के प्रमुख अंश:
आप बार-बार क्यों कहते हैं कि चुनाव समय पर नहीं होंगे, जल्दी चुनाव होंगे, सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं करेगी. कभी सितंबर की बात करते हैं, कभी मध्यावधि चुनाव की, क्या वजह है?
नहीं, मैंने एक ही बार कहा है. और इस आधार पर कहा है कि सरकार हर मोर्चे पर असफल रही है. जो वादे किए थे जनता के सामने, गरीबी को दूर करेंगे, बेरोजगारी को दूर करेंगे, और महंगाई हटा देंगे. तो महंगाई बढ़ी है, बेरोजगारी बढ़ी है, और रोजगार दे नहीं सके. एक तो किसानों की पैदावार कम हुई, उस पर से उन्हें उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाया. मजदूर जो खेतों में काम करते हैं, फैक्टरियों में काम क रते हैं, उनके लिए भी जो घोषणापत्र में कहा वह भी पूरा नहीं कर पाए. तो कुल मिलाकर चाहे कि सान हों, मजदूर हों, व्यापारी हों, गरीब हों, वकील हों, चाहे राज्य कर्मचारी हों या दुकानदार हों जिनके लिए वादे किए वे पूरे नहीं कर पाए, न कर पाएंगे.
आर्थिक स्थिति और ज्यादा खराब हो रही है. उन्होंने कहा था कि देश की आर्थिक स्थिति बहुत जल्दी ठीक कर देंगे, दूसरा कहा था कि महंगाई को घटा देंगे. खत्म कर देंगे. तो मेरा कहना यह था कि महंगाई को अगर खत्म नहीं कर सकते, तो रोक तो सकते थे, ठहर तो सकती थी महंगाई. जब सरकार इनको मिली थी, उसी वक्त जो महंगाई थी उतनी ही रहती तो भी नहीं रह पाई. तो महंगाई बढ़ी, गरीबी बढ़ी, बेरोजगार बढ़े, किसानों की पैदावार कम हुई. किसान बर्बाद हो गया. और सबसे बड़ी महंगाई की मार गरीब पर पड़ी. किसानों की जो पैदावार थी, उसे सस्ते दाम पर लिया गया और जब उसको खरीदना पड़ा तब महंगा बेचा गया. अब इन सारे मोर्चों पर असफल हैं. अब वे बजट अच्छा रखने की कोशिश करेंगे वे चुनावी बजट से चुनाव लडऩा चाहते हैं. यह उनका आखिरी बजट है. क्योंकि अगला तो वे पेश नहीं कर पाएंगे. अगला बजट तो वही पेश करेंगे, जो नए आएंगे. इसीलिए इस बजट में कुछ अच्छे काम करने की कोशिश की जा रही है. और जो अच्छे करेंगे, चुनाव लडऩे के लिए उसी को लेकर ये जा रहे हैं जनता के बीच. ये हमारी जानकारी है और मैं समझता भी और इनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है.
बार-बार कहते हैं कि मध्यावधि चुनाव हो सकता है, लेकिन सरकार को समर्थन जारी रखे हुए हैं, ऐसी क्या मजबूरी है?
हमारी मजबूरी कोई नहीं है. हमारा सैद्धांतिक सवाल है. हम सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लड़े हैं और समाजवादी पार्टी सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लड़ती रहेगी. तो सवाल यह है कि एक तरफ है बीजेपी और एक तरफ कांग्रेस और तीसरा मोर्चा युनाइटेड नहीं है, वरना तीसरे मोर्चे का बहुमत हो जाता. हमारा सिद्धांत है कि कम्युनल फोर्स के खिलाफ लड़ी है समाजवादी पार्टी. और हिंदुस्तान में दूसरा यदि सहयोग मिला है तो लेफ्ट पार्टी का मिला है और इस बीच में सांप्रदायिकता से न बीजेपी से कांग्रेस लड़ी है न और कोई लड़ा है. समाजवादी पार्टी लड़ी है, और समय-समय पर समाजवादी पार्टी का सहयोग वामपंथी दलों ने दिया है.
अगर आप चुनाव की बात कर रहे हैं, आपकी पार्टी तैयार है चुनाव के लिए तो बीजेपी आरोप लगाती है कि मुलायम ङ्क्षसह जी समर्थन वापस लें तभी तो चुनाव होंगे. समर्थन वापस नहीं ले रहे हैं क्योंकि चुनाव वैसे ही सिर पर है. आपकी पार्टी अगर तैयार है तो समर्थन वापस क्यों नहीं ले लेते?
अगर ऐसा कोई मुद्दा आएगा, जैसा कि जनविरोधी कोई मुद्दा आएगा. लोकसभा के अंदर तब तो समाजवादी पार्टी समर्थन देने, न देने पर विचार कर सकती है. अभी तक ऐसा कोई जनविरोधी काम नहीं आया है. एक ही काम है जो पूरे देश के, जनता के सामने है. वे दो काम हैं. एक महंगाई, दूसरा बेरोजगारी.
मुद्दों पर आप समर्थन वापसी की मांग क्यों नहीं क रते हैं? ये दोनों आम आदमी से जुड़े हुए काम हैं. आप कहते हैं कि यह सरकार आम आदमी के खिलाफ काम कर रही है. तो ये तो बहुत बड़े मुद्दे हैं आपके सामने.
अगर हम बीच में समर्थन वापस करें, तो हमारे वापस करने से तो कांग्रेस सरकार गिरेगी नहीं. हम कोई छिपाने वाली बात नहीं कह सकते. क्योंकि अगर समाजवादी पार्टी समर्थन वापस भी कर ले तब भी कांग्रेस का बहुमत है. इसी सिद्धांत के आधार पर ऐसे मुद्दे आपने देखे होंगे जिन मुद्दों पर हमने कांग्रेस सरकार का समर्थन नहीं किया, एफडीआइ का विरोध किया, कस के विरोध किया उतना किसी ने नहीं कि या, जितना समाजवादी पार्टी ने कि या. और इसके पहले और कई मुद्दे आए. उन मुद्दों का भी विरोध कि या समाजवादी पार्टी ने. कांग्रेस को वोट नहीं दिया.
लेकिन मुलायम सिंह जी, विपक्ष भी सवाल उठाता है कि सदन के अंदर कई मुद्दों पर आप सरकार के साथ दिखाई देते हैं, और कई मुद्दों पर विरोध में. तो स्थिति बहुत साफ नहीं दिखाई देती. कंफ्यूजन है.
हमारी नीति साफ है. समाजवादी पार्टी कभी भी दुविधावादी पार्टी नहीं है. नीतियां जो हमारी हैं उसी के आधार पर चाहे लोकसभा हो, या संसद के अंदर हो या बाहर हो, समाजवादी पार्टी उन्हीं नीतियों पर चलती है.
यह बात सही है कि समाजवादी पार्टी स्टैंड लेती है. चाहे राष्ट्रपति चुनाव का मुद्दा हो, या एफडीआइ का मुद्दा हो या महंगाई का. लेकिन सवाल यहीं आकर अटक जाता है. चुनाव के लिए आप लोगों ने सीटों का आवंटन कर दिया था कुछ समय पहले. लोकसभा सीटों को लेकर तो आप जब तैयार हैं, सरकार गिरे या न गिरे, जनता के मुद्दे पर आप आगे बढ़ सकते हैं.
वो तो हम जा रहे हैं. हमारी पार्टी चुनाव की तैयारी कर रही है. और उत्तर प्रदेश में जितने उम्मीदवारों को लड़ाना था, उतना घोषित कर दिया.
एक और बड़ा सवाल उठता है. आप भी फेस करते हैं उन मुद्दों को लेकर कि सरकार सीबीआइ का डर दिखाकर आप लोगों से समर्थन ले रही है. समर्थन जारी है.
ऐसा नहीं है. ये सही है कि दिल्ली की सरकार के दो ही काम हैं, एक सीबीआइ और दूसरा आर्थिक मामले को लेकर कांग्रेस पार्टी ने विपक्ष को हमेशा दबाने की कोशिश की है. लेकिन समाजवादी पार्टी अपनी नीतियों पर हमेशा रहेगी. चाहे सीबीआइ की बात हो, चाहे और किसी तरह से आर्थिक नुकसान कराने का मामला हो. ये तो है. इनके हाथ में एक तो है इनकम टैक्स और एक सीबीआइ. तो इनकम टैक्स और सीबीआइ का पूरा-पूरा उपयोग यह सरकार करती है. हमेशा.
तो आपके ऊपर भी कभी दबाव डालने की कोशिश की होगी?
हमारे पीछे तो सीबीआइ लगा ही दी है. लेकिन सदन में आपने देखा होगा हमने अपनी नीतियों से समझौता नहीं किया.
मुलायम सिंह जी, एक बात और है: (कांग्रेस ने) राहुल गांधी को भी उपाध्यक्ष बना दिया. आपको क्या लगता है? कितने बड़े नेता हैं वे, उससे पार्टी का कल्याण होगा? कायाकल्प होगा?
वो कांग्रेस जाने, हम अपनी पार्टी के बारे में कह सकते हैं. कांग्रेस का क्या है. कितना उम्मीद है, कितना उम्मीद करके चल रहे हैं, तो ये तो कोई नई बात है नहीं. ये तो पहले से तय था. सोनिया जी नेता थीं, उसके पहले राजीव थे, उसके पहले इंदिरा थीं. आपको पता ही है. सबका नाम क्यों लाते हो? नेता वही हैं और वहां पर कि सी की हिम्मत है नहीं. सही बात भी कहने की हिम्मत वहां पर नहीं है. वहां पार्टी के अंदर जब मीटिंग होती है तो सुना करते हैं लोग, किसी की हिम्मत नहीं है कोई बात ऐसी वैसी कह सके.

