पिछले 25 वर्षों में पहली बार हिंदुस्तान के दौरे पर आई आंग सांग सू ची अपने देश म्यांमार में असली लोकतंत्र की बहाली को लेकर आत्मविश्वास से भरपूर हैं. वे इसे बर्मा ही कहती हैं और इसे लेकर उनके विचार बड़े मजबूत हैं. म्यांमार की 67 वर्षीया सांसद, नेशनल लीग ऑफ डेमोक्रेसी की अध्यक्ष चाहती हैं कि हिंदुस्तान म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली में मुख्य भूमिका निभाए. लेकिन वे अगर राष्ट्रपति बनना चाहती हैं तो उन्हें देश के संविधान में तब्दीली लानी होगी. मौजूदा संविधान के मुताबिक, देश का सर्वोच्च पद उन्हें नहीं मिल सकता, क्योंकि उनके मरहूम पति विदेशी थे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात के कुछ देर पहले उन्होंने मेल टुडे के फॉरेन अफेयर एडिटर सौरभ शुक्ल से खास बातचीत की.
बर्मा में वास्तविक लोकतंत्र की बहाली की दिशा में आप हिंदुस्तान से कैसी भूमिका की अपेक्षा कर रही हैं?
मैं एक अच्छे दोस्त के तौर पर उसे देख रही हूं. अच्छे दोस्त बड़ी मुश्किल से मिलते हैं और कीमती होते हैं. हिंदुस्तान और बर्मा के बीच की अच्छी दोस्ती के लिए दोनों देशों के लोगों के बीच दोस्ती का रिश्ता कायम होना बेहद जरूरी है. मेरा हमेशा से यही मानना रहा है कि दो देशों की सरकारों के बीच के रिश्ते से ज्यादा अहम है इनके नागरिकों के बीच का आपसी संबंध... लोगों के बीच का रिश्ता ही सरकार की नीति को तय करने की बुनियाद तैयार करेगा न कि सरकारों के बीच का.
आपने दिल्ली में पढ़ाई की है, कॉलेज की कोई प्यारी याद?
मुझे लेडी श्रीराम कॉलंज की फ्रेंड्स और टीचर्स याद हैं. वे बेहद अच्छी थीं. वे हम सबका व्यक्तिगत रूप से ख्याल रखती थीं. हो सकता है हम खुशकिस्मत थे... छात्रों पर पाठ्यक्रम से कहीं ज्यादा असर ख्याल रखने वाले टीचर का होता है.
क्या 2015 में होने वाले अगले चुनावों से पहले बर्मा में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना हो जाएगी?
सबसे पहले जरूरी है कि हम संविधान में संशोधन करें; अगर 2015 चुनावों को सही मायने में लोकतांत्रिक होना है तो बर्मा के संविधान में तब्दीली की जरूरत है.
राष्ट्रपति थेइन शेन के कार्यकाल में हुए राजनैतिक सुधारों से आप संतुष्ट हैं? क्या वे पर्याप्त हैं?
मैं चाहूंगी कि सुधारों की प्रक्रिया ज्यादा संरचनात्मक तरीके से हो; बहुत लोग सुधारों की गति को तवज्जो देते हैं. मेरा नजरिया अलग है. बिना उचित ढांचे के तेज गति से चलना खतरनाक हो सकता है और यह ऐसी दिशा में जा सकता है जिस तरफ आप शायद कभी न जाना चाहें.
फिर आपने बर्मा को प्रतिबंधों से मुक्त करने में मदद क्यों की?
बर्मा से प्रतिबंध हटाने की सिफारिश करने के पीछे एक वजह यह थी कि मित्र देश लोकतंत्र की राह पर कदम आगे बढ़ाने में लंबे समय से हमारी मदद कर रहे थे. लेकिन अब हमें अपनी जिम्मेदारी खुद उठानी है. लोकतंत्र का अर्थ है जिम्मेदारी संभालना.
सैन्य शासन ने बर्मा का नाम बदलकर म्यांमार कर दिया, देश का नाम बदलना आपको कतई अच्छा नहीं लगा, क्या आप अब भी दुखी हैं?
यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस नाम से पुकारना चाहते हैं. हमने बर्मा नाम से ही आजादी पाई थी. यह बड़ी संकीर्ण और छोटी सोच का परिचायक है कि आप यह नाम सिर्फ इसलिए बदल दें क्योंकि औपनिवेशिक सत्ता ने इसे इस्तेमाल किया था? अगर ऐसा है तो क्या अब इंडिया नहीं कहा जाएगा?
हिंदुस्तान ने जब सैन्य शासन को समर्थन देने का फैसला किया था तो आप आहत हुई थीं?
जब हिंदुस्तान ने अपनी नीति बदली थी तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ. हर देश अपने हित को ध्यान में रखते हुए अपना काम करता है. मैं मानती हूं कि मुझे दुख हुआ था, पर बहुत ज्यादा नहीं, क्योंकि आप जानते हैं कि चीजें लगातार बदलती रहती हैं.
आपकी नजरबंदी के दौरान क्या हिंदुस्तान से आपका संपर्क बना रहा?
हिंदुस्तान की सरकार से मेरा बहुत कम संपर्क रहा. दोनों देशों ने आजादी के वक्त एकजुट होकर काम किया था. शुरुआती दौर में हम मित्र थे, पर अफसोस कि लोकतंत्र की लड़ाई के दौरान हम साथ नहीं थे.
आपके विचार से लोकतंत्र का मतलब क्या है?
इसका अर्थ है लोगों की सुरक्षा और आजादी के बीच संतुलन.
एक दमनकारी शासन ने आपको सबसे अलग कर नजरबंद किया था. यह कितना मुश्किल था?
नजरबंदी के तहत अपने अकेलेपन में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई. मैं बड़े नियम से अपने समय का इस्तेमाल करती थी. मैं ध्यान लगाती, योग करती और किताबें पढ़ती, रेडियो सुनती. मैं घर का काम करती. कभी-कभी दिन बड़ी तेजी से बीत जाते.
वह कौन-सी शक्ति है जिसने आपको अपनी राह से डिगने नहीं दिया, क्या कभी आपको लगा कि सब खत्म हो गया?
मैं समझती हूं कि अनुशासित रूप से समय का इस्तेमाल करने से सब आसान हो जाता है. जिस बात से मुझे शक्ति मिलती रही, वह थी अपने काम के प्रति मेरी प्रतिबद्धता.
आजादी का अर्थ?
आजादी का मतलब है जिस रास्ते पर आप चलना चाह रहे हैं उसके लिए खुद फैसला कर सकें और अपने चयन के लिए जिम्मेदार हों.
ग्लोबल कॉर्पोरेट दिग्गजों में बर्मा में प्रवेश पाने की होड़-सी लगी है. ऐसा मालूम होता है कि लूट-खसोट मची है. क्या आपको भी ऐसा लग रहा है?
अगर हमने सही नियम नहीं बनाए तो हम विदेशी कंपनियों पर कैसे दोष लगा सकते हैं कि वे हमारे संसाधनों को लूट रही हैं.
आप हिंदुस्तान और चीन के कूटनीतिक सरोकारों में कैसे संतुलन कायम करेंगी?
बर्मा ने लंबे समय से यह संतुलन बनाए रखा है. दोनों ही देशों के साथ हमारा रिश्ता अच्छा रहा है और अच्छा रहेगा.
भ्रष्टाचार के अभिशाप का मुकाबला कैसे किया जाए?
भ्रष्टाचार से मुकाबला करने का ज्यादा सकारात्मक तरीका है लोगों को प्रोत्साहित करना कि नैतिकता का पालन इंसान के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालता है.
बर्मा में अपना ठिकाना बनाकर हिंदुस्तान में अराजकता फैला रहे गुट चिंता का सबब हैं, अगर आप देश की नेता होतीं तो क्या आप इसे खत्म करने का आश्वासन देतीं?
बर्मा में भी अराजक तत्व सक्रिय हैं. लेकिन हम जब तक अपनी समस्या का समाधान नहीं कर लेते किसी को आश्वासन नहीं दे सकते हैं.
हिंदुस्तान से आपकी अपेक्षाएं?
मेरे दौरे का उद्देश्य हिंदुस्तान से अपने रिश्ते बेहतर बनाना है. हमें लोकतांत्रिक प्रणाली की बहाली की सही दिशा में आगे बढऩे के लिए हिंदुस्तान की मदद चाहिए. हिंदुस्तान को सतही बदलावों को महत्व नहीं देना होगा. लोकतंत्र की सही कसौटी होगी संविधान का संशोधन.
पर पूर्ण लोकतंत्र हासिल करने की राह कितनी मुश्किल होगी?
आप जितना प्रयास करेंगे उतनी ही सफलता मिलने की उम्मीद है. मेरे लोग इस बात को समझने लगे हैं कि उन्हें ही यह करना है. वे मुझसे या मेरी पार्टी से सारा काम करने की अपेक्षा नहीं रखते. जितनी जल्दी वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेंगे, उतनी ही जल्दी हम सफलता हासिल कर पाएंगे.

