फिल्म चक्रव्यूह माओवादी आंदोलन को सिनेमाई नजर से देखने की कोशिश है. फिल्म का असर उनकी स्टार कास्ट पर नजर आता है. दिल्ली के एक होटल में अर्जुन रामपाल ने उनसे कहा, ‘मुंबई में लोग फिल्म देखकर हैरान हैं. रितिक रोशन कह रहे थे कि हम सोचते हैं कि कैसे अपनी कमाई में कुछ करोड़ और जोड़ लें और आदिवासी 20 रु. में गुजारा करते हैं.’ बातें बहुत सारी हैं. प्रकाश झा ने फिल्म से जुड़े अपने अनुभव और विचारों को फीचर एडिटर मनीषा पांडेय के साथ साझा किया.
माओवादी आंदोलन पर फिल्म बनाने की क्यों सोची?
कॉलेज के समय से ही लेफ्ट की राजनैतिक विचारधारा के प्रति झुकाव रहा है. इस बीच देश के विभिन्न हिस्सों में माओवादी आंदोलन जोर पकड़ रहा है. यह देश की राजनैतिक दिशा को प्रभावित कर रहा है. मुझको लगा कि उनके जीवन के सवाल और संघर्ष सिनेमा के जरिए लोगों तक पहुंचें.
कहते हैं, ओम पुरी का चरित्र कोबाड गांधी से प्रभावित है?
हां, काफी हद तक. सिर्फ कोबाड गांधी ही नहीं, फिल्म के काफी चरित्र आजाद समेत वास्तविक आंदोलन के बहुत सारे नेताओं से मेल खाते हैं.
आपकी फिल्म माओवादियों के साथ है या सरकार के साथ?
किसी एक के साथ नहीं. मैंने दोनों पक्षों को ईमानदारी से समझने की कोशिश की है. उनके साथ अन्याय हुआ है, लेकिन हिंसा जायज नहीं है.
फिल्म का एक डायलॉग है, ‘‘मैं ऐसे लोकतंत्र में विश्वास नहीं करता, जो गरीबों की इज्जत करना नहीं जानता.’’ इस संवाद से कितना इत्तेफाक रखते हैं? आपको इस लोकतंत्र में विश्वास नहीं?
मैं इस संवाद से पूरी तरह सहमत हूं और इसमें विश्वास करता हूं.
माओवादी विद्रोही हैं या आतंकवादी?
वे विद्रोही हैं. वे अपने हक और अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं.
फाइव फिगर सैलरी वाली और जीडीपी ग्रोथ में विकास देखने वाली कॉर्पोरेट जनरेशन गरीबों, आदिवासियों के हक और बराबरी के बारे में नहीं सोचती. उनके लिए कोई संदेश.
बिजनेस और मैनेजमेंट की ऊंची डिग्रियां लिए हुए लोगों को यह सोचना होगा कि वे कैसे सबको साथ लेकर चलें. वरना उनके घर की खिड़की के कांच को तोडऩे वाला पहला पत्थर सामने की किसी झुग्गी से उठ सकता है.
आप लेफ्टिस्ट हैं. फिर तो नास्तिक भी होंगे?
नहीं, मैं भगवान में पूरा विश्वास रखता हूं और रोज पूजा भी करता हूं.

