उत्तराखंड की टिहरी गढ़वाल लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में मुख्यमंत्री के बेटे साकेत बहुगुणा की हार के बाद प्रदेश की राजनीति फिर करवट ले रही है. ऐसे में उत्तराखंड कांग्रेस के दिग्गज हरीश रावत, 64 वर्ष, स्वाभाविक रूप से चर्चा में हैं. उनको आगे रखकर कांग्रेस विधानसभा चुनाव लड़ती और जीतती रही है लेकिन रावत अब तक सीएम नहीं बन पाए. कांग्रेस के राजनैतिक संस्कार में बदलाव और पार्टी की चुनौतियों से लेकर प्रदेश की सामाजिक स्थितियों पर उनसे बात की इंडिया टुडे के कार्यकारी संपादक दिलीप मंडल और प्रमुख संवाददाता पीयूष बबेले ने.
टिहरी लोकसभा सीट विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने के कारण खाली हुई थी. ऐसे में उपचुनाव में मुख्यमंत्री के बेटे का ही चुनाव हार जाना क्या चैंकाने वाला नतीजा नहीं है?
जिस तरीके से पार्टी ने इलेक्शन ऑर्गेनाइज किया, उस हिसाब से हमें चुनाव जीतना चाहिए था. कुछ दिन पहले विधानसभा चुनाव में ही टिहरी की जनता ने हमें वोट दिया था. ऐसे में इतने कम समय में कांग्रेस के वोटर का बीजेपी की ओर शिफ्ट करना कठिन है. हमारी गलती यह रही कि हम मतदाताओं को वोट डालने के लिए घर से नहीं निकाल पाए. इस उपचुनाव में बहुत कम मतदान हुआ. मतदाता का वोट डालने न निकलना चिंता की बात है. दरअसल लोगों ने यह माना कि दोनों ही उम्मीदवार जमीन से जुड़े हुए नहीं हैं.
लेकिन कुछ नाम तो आपने भी सुझए थे, अगर उन्हें टिकट मिलता तो?
दरअसल होना यह चाहिए था कि या तो हम कोई बड़ा कद्दावर नाम सुझते या ऐसा स्थानीय नाम सामने लाया जाता जो जमीन से जुड़ा व्यक्ति होता. ये दोनों ही काम करने में विफल रहे. पार्टी को प्रत्याशी के चयन पर और गंभीरता से सोचना चाहिए था.
क्या ऐसा चुनाव नतीजा देकर मतदाताओं ने विजय बहुगुणा के छह महीने के काम की तुरंत समीक्षा कर दी है?
दरअसल इस चुनाव में एक साथ बहुत से फैक्टर काम कर रहे थे. जो फैक्टर हमारे खिलाफ गए उनमें प्रमुख हैः हमारे खिलाफ देशभर में बनाया जा रहा वातावरण भी इसकी एक वजह है. राज्य कर्मचारियों की हड़ताल भी एक वजह है. चुनाव के पहले ही इस क्षेत्र ने दैवीय आपदा का सामना किया. आपदा के दौरान जनता की सरकार से उम्मीदें बढ़ जाती हैं, जबकि ऐसे में आपदा तक सरकारी महकमे के पहुंचने में कुछ वक्त लगता है. इससे लोगों में नाराजगी पैदा होती है. जबकि हमारे पक्ष में सबसे बड़ा कारण यह था कि जनता ने छह महीने पहले जिस व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया उन्हीं के सुपुत्र चुनाव मैदान में थे. स्थानीय सांसद मुख्यमंत्री के घर का हो, जनता के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है. हमारा कैंडिडेट बीजेपी के कैंडिडेट से ज्यादा गतिशील था. इसके अलावा यह चुनाव आर्गनाइज होकर लड़ा गया.
फिर क्या इस हार की वजह क्या प्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी में छिपी है? अगर ऐसा ही रहा तो अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी का क्या होगा?
राजनीति में थोड़ी टकराहट तो होती ही है. लेकिन इस चुनाव में हर व्यक्ति ने उम्मीदवार को जिताने के लिए काम किया. हर कोई 2014 का चुनाव देखकर चल रहा है. ऐसे में सब चाहते थे कि कांग्रेस यह उपचुनाव जीते. उत्तराखंड में कांग्रेस के पास मजबूत नेताओं की कतार है. लेकिन सबसे बड़ी जरूरत है इन नेताओं में समन्वय बैठाना. 2009 के लोकसभा चुनाव में यही हुआ था. तीन प्रत्याशी हमारे साथ थे और दो हमारे साथ नहीं थे, लेकिन समन्वय था. इसलिए पार्टी पांचों सीटें जीत गई. अगर 2014 में एक बार फिर से ऐसा संतुलन बना तो पार्टी को बड़ी सफलता मिलेगी. अगर यह संतुलन नहीं बना तो स्थानीय बड़े नेता ही हमारी कमजोरी साबित हो सकते हैं. इस उपचुनाव में भी पार्टी ने अगर संतुलन बनाने का हमारा अनुरोध मान लिया होता तो परिणाम हमारे पक्ष में होता. लेकिन इस चुनाव में हमें किसी ने नहीं पूछा. हमारी भूमिका ‘तू भी आजा’ वाली हो गई. यही हाल स्थानीय नेताओं का भी रहा. जबकि अगर उपचुनाव की प्रारंभिक जिम्मेदारी में हम लोग दिखाई देते और सपोर्ट में सत्तारूढ़ खेमा होता तो संतुलन अपने आप बन जाता.
उत्तराखंड की राजनीति में ठाकुर और ब्राह्मण दो सबसे प्रमुख समुदाय हैं. जनसंख्या के लिहाज से ठाकुर सबसे बड़ा सामाजिक समूह है, फिर भी दोनों राजनैतिक दल लगातार एक ही वर्ग (ब्राह्मण) को मुख्यमंत्री की कुर्सी दे रहे हैं?
आपको याद हो तो उत्तराखंड राज्य की नींव ही जातिवाद की राजनीति के खिलाफ पड़ी थी, लेकिन जिस तरह से दोनों प्रमुख राजनैतिक दल सबसे बड़े सामाजिक समूह की उपेक्षा कर रहे हैं, उससे बुद्धिजीवी वर्ग में सवाल उठने लगा है. दोनों राजनैतिक दलों को समझना होगा कि एक प्रमुख सोशल ग्रुप को सत्ता से बाहर रखना ठीक नहीं है. डर इस बात का है कि हमारा राज्य उत्तराखंड भी उसी गंदगी (जाति की राजनीति) में न चला जाए.
कहीं ऐसा तो नहीं कि उत्तराखंड राजनैतिक दृष्टि से एक छोटा राज्य है, इसलिए पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व राज्य को बहुत गंभीरता से न लेता हो?
उत्तराखंड को केवल पांच सांसदों वाले राज्य की तरह नहीं देखा जा सकता. यह धार्मिक, प्राकृतिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दृष्टि से बहुत संवेदनशील राज्य है. उत्तराखंड की संस्कृति का उद्गम स्थान उत्तराखंड है. प्राकृतिक रूप से यह मध्य हिमालय क्षेत्र में आता है जो भौगोलिक स्थिरता के लिए संवेदनशील क्षेत्र है. रणनीतिक रूप से देखें तो अरुणाचल प्रदेश के बाद उत्तराखंड से लगा चीन का बॉर्डर सबसे ज्यादा संवेदनशील है. कश्मीर के साथ भी चीन का बॉर्डर है लेकिन वह बहुत दुर्गम इलाका है. उत्तराखंड के पास बाराहूत दर्रे तक चीन की मौजूदगी है. नेपाल के साथ भी लंबा बॉर्डर है. नेपाल में माओवाद की मौजूदगी में यह बॉर्डर संवेदनशील हो जाता है. इसके अलावा हिमाचल प्रदेश को छोड़कर उत्तराखंड ही एकमात्र ऐसा पर्वतीय राज्य है जो सबसे ज्यादा शांत है. इन सब बातों के मद्देनजर राजनैतिक दलों को इस प्रदेश पर खास ध्यान देना चाहिए.
कांग्रेस में एक जमाने में मजबूत क्षत्रप हुआ करते थे, लेकिन अब वे लगभग खत्म हो चुके हैं. खुद आपको भी आपका हक नहीं मिला. कांग्रेस के चरित्र में इस बदलाव पर आप क्या सोचते हैं?
असल में हमारा केवल संविधान ही नहीं बल्कि हमारा स्वभाव भी संघात्मक एकात्मकता की तरफ है. फेडरल इन एटीट्यूड ऐंड यूनिटरी इन फंक्शनल बिहैवियर. अगर टॉप मजबूत है तो ब्रांच अपने आप मजबूत हो जाती हैं. इसका लाभ कांग्रेस को मिलता रहा. हमारे पास राज्यों में वहां की भावनाओं को व्यक्त करने वाले लोग थे. इधर देश की राजनीति में बदलाव आए हैं. जब से मुद्दा आधारित चुनाव होने लगे जैसे परिवार नियोजन, करप्शन वगैरह, इसका असर राजनैतिक दलों पर पड़ा. कांग्रेस और बीजेपी में भी इसका असर है. बीजेपी में टॉप कमजोर होने के कारण पार्टी में टॉप मिसिंग है और ब्रांचेज इंडिपेंडेंट बिहैवियर कर रही हैं. कांग्रेस में टॉप मजबूत है, लेकिन ब्रांच मजबूत नहीं हो पा रही है. ऐसे में जहां लोगों को लोकल आउटलेट मिला वहां वे निकल गए. इससे कांग्रेस को नुकसान हुआ है. इस पर हमें ध्यान देना होगा.
आप उत्तराखंड के परमानेंट सीएम इन वेटिंग हैं. आपके नाम पर चुनाव लड़ा जाता है, वोट गिरता है और जीतने के बाद जनता का ध्येय पूरा नहीं होता.
मैं तो इस बात से भी प्रसन्न हूं कि पार्टी के लिए मेरी उपयोगिता बनी रहे. पार्टी उसका पुरस्कार देती है, नहीं देती है, यह पार्टी को तय करना है. मैं तो यही चाहता हूं कि मेरी उपादेयता बनी रहे.

