
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा से 10 दिन पहले समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश से सटे इस राज्य में अपने चुनावी अभियान का बिगुल बजा दिया था. अखिलेश ने 27 सितंबर को रीवां जिले के सिरमौर निर्वाचन क्षेत्र में एक सार्वजनिक बैठक को संबोधित करके मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपनी पार्टी के अभियान की शुरुआत की.
सिरमौर से सपा ने पूर्व विधायक लक्ष्मण तिवारी को उम्मीदवार घोषित किया है. उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता अखिलेश यादव ने मध्य प्रदेश में अपनी दो दिवसीय यात्रा के दौरान पार्टी के राज्य नेतृत्व के साथ कई बैठकें कीं. मध्य प्रदेश, जहां विधानसभा चुनाव में मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच होने की उम्मीद है, में समाजवादी पार्टी की एंट्री ने 'इंडिया' के सहयोगियों के बीच समीकरण बिगाड़ दिए हैं.
विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन के दो प्रमुख घटक कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच विवाद की नींव 15 अक्टूबर की घटनाओं से पड़ी. सुबह पहले जब कांग्रेस ने मध्य प्रदेश की विधानसभा सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा की तो उनमें वे सीटें भी शामिल थीं जिन पर सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव पहले ही पार्टी के प्रत्याशी उतार चुके थे.
यहीं से इन दोनों दलों के बीच पनप रहा असंतोष सतह पर आ गया. शुरुआती विवाद की जड़ बनीं सीटें थीं- चितरंगी, मेहगांव, भांडेर और राजनगर. पिछली बार कांग्रेस ने मेहगांव, भांडेर और राजनगर सीट जीती थी. सपा नेतृत्व छतरपुर जिले के बिजावर से कांग्रेस के उम्मीदवार उतारने से सबसे ज्यादा नाखुश है, जहां पार्टी ने 2018 में जीत हासिल की थी. बिजावर में चरण सिंह यादव को मैदान में उतारने के कांग्रेस के फैसले ने सपा को परेशान कर दिया है.
चरण सिंह बुंदेलखंड में सपा के वरिष्ठ नेता दीप नारायण यादव के चचेरे भाई हैं. सपा नेता योगेश यादव बताते हैं, "यह दुखद है कि कांग्रेस ने उस सीट पर उम्मीदवार की घोषणा की है जिसे सपा ने 2018 में जीता था और पार्टी वहां मजबूत चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है." बिजावर में बड़ी संख्या में यादव और ब्राह्मण आबादी है और 2018 के विधानसभा चुनाव में यह सपा के राजेश कुमार शुक्ला उर्फ बबलू भैया के पास चली गई, जो 2020 में मध्य प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के पतन के बाद भाजपा में चले गए थे.
कड़ा संकेत देते हुए सपा ने भी 15 अक्टूबर को कांग्रेस की सूची जारी होने के करीब 10 घंटे बाद अपने नौ उम्मीदवारों की लिस्ट घोषित कर दी. इनमें बिजावर के अलावा निवाड़ी, राजनगर, भांडेर, धौहनी, चितरंगी, सिरमौर, बिजावर, कटंगी और सीधी विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए गए. हालांकि इनमें से छह सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान पहले ही हो गया था, केवल तीन नाम ही नए जोड़े गए.

लखनऊ के अवध गर्ल्स कॉलेज की प्राचार्य और राजनीतिशास्त्र विभाग की प्रमुख बीना राय बताती हैं, "यूपी के बाहर राज्यों में विस्तार कर सपा राष्ट्रीय पार्टी की संभावनाएं तलाश रही है. इसी रणनीति के तहत पार्टी मध्य प्रदेश और यूपी की सीमा पर मौजूद उन विधानसभा सीटों पर फोकस कर रही है जहां सपा का जनाधार है." 2018 के विधानसभा चुनाव में सपा मध्य प्रदेश की पारसवाड़ा, बालाघाट, पृथ्वीपुर, निवाड़ी और गूढ़ विधानसभा क्षेत्र में दूसरे स्थान पर थी. मध्य प्रदेश के यूपी की सीमा से सटे जिलों पन्ना, छतरपुर, भिंड, मुरैना, ग्वालियर, दतिया, सतना, रीवां में सपा के समर्थक मतदाता अच्छी तादाद में हैं.
सपा इस बार मध्य प्रदेश की जिन विधानसभा सीटों पर फोकस कर रही है उनमें हैं: सिरमौर, जहां पूर्व भाजपा विधायक लक्ष्मण तिवारी उसके उम्मीदवार हैं, निवाड़ी, जहां सपा ने विधायक मीरा दीपक यादव को मैदान में उतारा है, राजनगर, जहां बृजगोपाल पटेल उर्फ बबलू पटेल उम्मीदवार हैं, भांडेर (अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित), जहां अहिरवार समुदाय के सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश डी.आर. राहुल मैदान में हैं और सीधी (अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित) जहां विश्वनाथ सिंह मरकाम सपा के उम्मीदवार हैं.
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के बाद सपा के प्रमुख महासचिव रामगोपाल यादव और कांग्रेस के मध्य प्रदेश प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने वार्ता की कमान संभाली. इसके बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, कमलनाथ और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के बीच भी बातचीत हुई. फिर ऐसी संभावना जताई जाने लगी थी कि नवरात्र में जारी होने वाली कांग्रेस की पहली सूची में ही सपा प्रत्याशियों के भी नाम होंगे.
लेकिन नवरात्र के पहले दिन जारी पहली सूची और 18 अक्टूबर की रात को 85 प्रत्याशियों वाली अपनी दूसरी सूची जारी करने के साथ ही कांग्रेस ने आमला सीट को छोड़कर बाकी सभी 229 सीटों पर उम्मीदवार तय कर दिए. इस सूची में वे सीटें भी थीं जिनको लेकर कांग्रेस और सपा में गठबंधन की चर्चा हुई थी. इसका सीधा मतलब था कि कांग्रेस मध्य प्रदेश में सपा के साथ गठबंधन को तैयार नहीं हुई और उसने सभी सीटों पर अपने ही उम्मीदवार उतार दिए.
यही दोनों पार्टियों के बीच विवाद का कारण बना. बीना राय बताती हैं, "कांग्रेस की दुविधा थी कि अगर वह इंडिया गठबंधन में शामिल किसी घटक दल के साथ समझौता करती है तो उसे आप जैसी अन्य पार्टियों के लिए भी कुछ सीटें छोड़नी पड़तीं. मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में जहां कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की लड़ाई का अनुमान लगाया जा रहा है वहां कांग्रेस के लिए एक-एक सीट महत्वपूर्ण है."
कांग्रेस की दूसरी सूची जारी होने के अगले दिन 19 अक्टूबर को अखिलेश यादव शाहजहांपुर में सपा के प्रशिक्षण शिविर में शामिल होने पहुंचे थे. यहां उन्होंने पहली प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस पर धोखा देने का आरोप लगाया. अखिलेश ने कहा, "इंडिया गठबंधन को पहले ही स्पष्ट कर देना चाहिए था कि तालमेल केवल लोकसभा चुनाव के लिए है न कि विधानसभा चुनाव के लिए. जब लोकसभा चुनाव होगा तो हम भी वही व्यवहार करेंगे जो हमारे साथ मध्य प्रदेश में किया गया." अखिलेश के बयान पर पलटवार करते हुए यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि यूपी में कांग्रेस सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.
बयानबाजी का सिलसिला यहीं नहीं रुका. अखिलेश यादव ने अजय राय के बयानों पर प्रतिक्रिया दी और व्यक्तिगत हमला कर दिया. सपा प्रमुख ने कहा, "वे (अजय राय) इंडिया की किसी मीटिंग में नहीं थे. वहां गठबंधन को लेकर क्या बातें हो रही हैं, उन्हें नहीं मालूम. कांग्रेस को ऐसे चिरकुट नेताओं को इस मसले पर बयान देने से रोकना चाहिए."
इसी वाद-विवाद के बीच मध्य प्रदेश के कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के बयान ने भी विवाद को और बढ़ा दिया. मीडिया से बात करते वन्न्त अखिलेश यादव की नाराजगी के सवाल पर कमलनाथ बोले, "अरे छोड़ो अखिलेश-वखिलेश को." अबकी पलटवार करने की बारी रामगोपाल यादव की थी. कमलनाथ के बयान पर वे बोले, "हमें इन पर कुछ नहीं कहना है, ये छुटभइये नेता हैं."
इस बढ़ती बयानबाजी से हो रहे विवाद के बाद सपा और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की आपसी बातचीत से कुछ बीच का रास्ता निकलने की उम्मीद जगी थी. लेकिन 22 अक्तूबर की शाम सपा ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए नौ और उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी. इससे सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन के प्रयास के विफल होने का संकेत माना गया. मध्य प्रदेश के सपा प्रदेश अध्यक्ष रामायण सिंह पटेल कहते हैं, "कांग्रेस नेतृत्व के साथ हमारी कुछ बातचीत हुई, लेकिन सब कुछ विफल हो गया. हम अपने दम पर मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ेंगे."
कांग्रेस और सपा के बनते-बिगड़ते रिश्तों का लंबा इतिहास रहा है. कांग्रेस ने सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव को 1990 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में समर्थन दिया था (जब भाजपा ने विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था और कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाया गया था). हालांकि बाद में मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस को विश्वास में लिए बगैर नए चुनाव कराने के लिए राज्य विधानसभा को भंग करने की सिफारिश की थी.
कांग्रेस ने 1993 और 2003 में भी समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में मुलायम सिंह यादव को समर्थन दिया था. यूपी में आपसी राजनैतिक समझ जाहिर करने के संकेत के रूप में सपा ने गांधी परिवार के सदस्यों- सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है. कांग्रेस ने भी कुछ हद तक इसका समर्थन किया है.
लेकिन सपा और कांग्रेस नेताओं का आपसी सम्मान 2009 में उस समय समाप्त हो गया जब कांग्रेस ने फिरोजाबाद लोकसभा सीट के उपचुनाव में सिने स्टार राज बब्बर को सपा की डिंपल यादव के खिलाफ मैदान में उतारा. डिंपल फिरोजाबाद उपचुनाव हार गईं और इससे दोनों पार्टियों के बीच कटुता पैदा हो गई. अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी के प्रयास से यह कटुता 2017 में खत्म हुई जब दोनों दलों ने साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा.
लेकिन यह प्रयोग विफल रहा और चुनाव बाद ही गठबंधन टूट गया. पिछले महीने यूपी की घोसी विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव पर कांग्रेस का सपा को समर्थन देने के बावजूद उत्तराखंड की बागेश्वर विधानसभा सीट पर उपचुनाव में सपा का उम्मीदवार खड़ा करना कांग्रेस को रास नहीं आया. घोसी में सपा की जीत के बाद बागेश्वर में हार कांग्रेस को ज्यादा चुभ रही है.
यहीं से उपजा सपा और कांग्रेस के बीच विवाद अब मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में सतह पर आ गया है. अगर इंडिया गठबंधन के इन दोनों घटक दलों के बीच आपसी दरार ज्यादा चौड़ी हुई तो वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में इसे भर पाना संभव नहीं होगा.
मध्य प्रदेश में डगमग भरी साइकिल की राह
पिछले तीन दशकों के दौरान मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में सपा के कुल 13 विधायक ही चुनाव जीत सके हैं. अपने गठन के बाद से सपा हर बार मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार उतार रही है. सपा ने 1993 के विधानसभा चुनाव में 109 सीटों पर अपने प्रत्याशी पार्टी को विस्तार देने की रणनीति से उतारे थे. चुनाव परिणाम में सभी प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई थी.
1998 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा ने 94 प्रत्याशी उतारे. इस चुनाव में सपा का पहली बार मध्य प्रदेश की विधानसभा में खाता खुला. पार्टी के चार प्रत्याशी जीते, लेकिन 84 की जमानत जब्त हो गई. मध्य प्रदेश में सपा का सबसे अच्छा प्रदर्शन 2003 के विधानसभा चुनाव में रहा. सपा के 161 उम्मीदवारों में से सात जीते और 140 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई.
2008 के विधानसभा चुनाव में सपा ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब तक सबसे ज्यादा 187 प्रत्याशियों को टिकट दिया था. इस चुनाव में सपा का केवल एक प्रत्याशी चुनाव जीत पाया, 183 की जमानत जब्त हो गई थी. गठन के बाद यह दूसरा मौका था जब 2013 के विधानसभा चुनाव में सपा का एक भी प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पाया. सपा ने 164 प्रत्याशी चुनाव में उतारे थे, जिनमें 161 की जमानत जब्त हो गई थी. 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा ने सबसे कम 52 प्रत्याशी सियासी मैदान में उतारे. इसमें 45 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई और एक चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचा जो बाद में भाजपा में शामिल हो गया.

