हरियाणा के गुरुग्राम की 43 वर्षीया स्कूल एडमिनिस्ट्रेटर ऋतिका मेहरा को समझ ही नहीं आ रहा था कि उनके साथ हो क्या रहा है. वे आधी रात को एकाएक घबराहट के साथ उठ बैठतीं. जोड़ों में तेज दर्द रहता था और रोजमर्रा की सामान्य बातें भी समझ नहीं आती थीं. पहले तो उन्हें लगा कि इसकी वजह तनाव है.
उन्हें यह भी महसूस हो रहा था कि इसका असर उनके पीरियड्स पर पड़ा है. ताजा हेल्थ स्कैन में बोन डेंसिटी कम और कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ आया. इसलिए जब डॉक्टरों ने बताया कि असली वजह तनाव नहीं बल्कि जल्दी शुरू हुआ मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) है, तो उन्हें बड़ा झटका लगा. करीब 30 साल से जिस जैविक चक्र के साथ उनका शरीर चल रहा था, वह अब धीमा पड़ रहा था. इतनी जल्दी मेनोपॉज ने ऋतिका को उदास कर दिया.
ऋतिका जैसी ही मुश्किल अब देश में बड़े पैमाने पर महिलाओं को पेश आ रही है. भारत में मेनोपॉज की औसत उम्र 46-47 साल है, जो पश्चिमी देशों की औसत उम्र 51 साल से पहले है. पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़े इससे भी ज्यादा चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं.
बड़ी संख्या में महिलाएं अब 'अर्ली मेनोपॉज’ यानी 40 से 44 साल के बीच या 'प्रीमैच्योर मेनोपॉज’ यानी 40 साल से पहले मेनोपॉज का सामना कर रही हैं. बीमारी या जागरूकता की कमी की वजह से होने वाला सर्जिकल मेनोपॉज इसका एक कारण है.
लेकिन इसे अलग भी कर दें, तब भी 2024 में साइंटिफिक रिपोर्ट्स में छपी एक स्टडी बताती है कि भारत में 40-44 साल की 16.2 फीसदी महिलाएं प्राकृतिक रूप से जल्दी मेनोपॉज से गुजर रही हो सकती हैं. वहीं 15-39 साल की 2.2 फीसदी महिलाएं समय से पहले मेनोपॉज का सामना कर रही हो सकती हैं.
अगर इसे संख्या में तब्दील करें तो यह आंकड़ा 40-44 साल की करीब 78 लाख महिलाओं और 40 साल से कम उम्र की 64 लाख महिलाओं तक पहुंचता है. यानी कुल मिलाकर 1.4 करोड़ से ज्यादा महिलाएं इससे प्रभावित हो सकती हैं.
डॉक्टर भी अपने क्लिनिकों में यह बदलाव साफ देख रहे हैं. शारदाकेयर-हेल्थसिटी में प्रसूति और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. लिपि शर्मा बताती हैं कि अब 40 की शुरुआती उम्र या यहां तक कि 30 के आखिरी वर्षों में भी महिलाएं उसी तरह की मानसिक और शारीरिक परेशानी झेल रही हैं, जैसी ऋतिका ने महसूस की.
यह इतना बड़ा मुद्दा क्यों है? क्योंकि भारतीय महिलाएं अब पहले से ज्यादा लंबी उम्र जी रही हैं और इसका मतलब है कि वे अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा मेनोपॉज के बाद की अवस्था में बिताएंगी. 2005 में महिलाओं की औसत आयु 66.4 साल थी, जो अब बढ़कर लगभग 73.6 से 74.5 साल तक पहुंच गई है.
सूरत की स्त्री रोग विशेषज्ञ और इंडियन मेनोपॉज सोसाइटी की अध्यक्ष डॉ. अनिता जे. शाह कहती हैं, ''महिलाएं पहले से कहीं ज्यादा लंबी उम्र जी रही हैं और उनकी जिंदगी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा मेनोपॉज के बाद गुजर सकता है.’’ लेकिन न तो महिलाएं खुद इसके लिए तैयार दिखती हैं और न ही भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था.
यह इसलिए भी अहम है क्योंकि मेनोपॉज कोई एक दिन में होने वाली घटना नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाला जैविक बदलाव है. इसके लक्षण आखिरी पीरियड बंद होने से कई साल पहले शुरू हो सकते हैं और उसके बाद भी लंबे समय तक बने रह सकते हैं.
हॉट फ्लैश, रात में पसीना आना और मूड स्विंग जैसे आम लक्षणों के बारे में लोग जानते हैं, लेकिन मेनोपॉज का असर दिल की सेहत, मेटाबॉलिज्म, हड्डियों और दिमागी क्षमता पर भी पड़ता है. समय पर पहचान और इलाज न होने से शरीर के भीतर होने वाला नुक्सान धीरे-धीरे बढ़ता रहता है.
वजहों की लंबी सूची
जल्दी या समय से पहले आने वाले मेनोपॉज की वजहें सिर्फ जैविक नहीं हैं. इसके पीछे जीवनशैली और सामाजिक-आर्थिक कारण भी उतने ही जिम्मेदार हैं. सबसे पहले बात जेनेटिक्स की. आपकी मां को किस उम्र में मेनोपॉज हुआ था, यह काफी हद तक तय कर सकता है कि आपको कब होगा.
इसके बाद आती है मेनार्की यानी पहली माहवारी की उम्र. अगर पीरियड्स जल्दी शुरू हुए हों तो मेनोपॉज भी जल्दी आ सकता है क्योंकि ऐसे मामलों में ओवरी के रिजर्व तेजी से खत्म होते हैं. महिलाओं का प्रजनन इतिहास भी इसमें अहम भूमिका निभाता है.
गर्भावस्था के दौरान ओव्यूलेशन कुछ समय के लिए रुक जाता है, जिससे ओवरी के फॉलिकल्स सुरक्षित रहते हैं. जिन महिलाओं ने बच्चे पैदा किए हैं—खासकर सही अंतराल पर—उन्हें अपेक्षाकृत देर से मेनोपॉज हो सकता है. वहीं जिन महिलाओं के बच्चे नहीं होते, उनमें मेनोपॉज जल्दी शुरू होने का अंदेशा बढ़ सकता है.
सामाजिक और आर्थिक हालात भी इस पर असर डालते हैं, क्योंकि शिक्षा, आय और रहने की जगह से जागरूकता और पोषण दोनों तय होते हैं. कम आय, कम शिक्षा और ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली महिलाओं में कुपोषण, कम बॉडी मास इंडेक्स, एनीमिया और मेटाबॉलिक तनाव ज्यादा होता है.
ये सभी चीजें ओवरी की सेहत पर असर डाल सकती हैं. दूसरी तरफ शहरी महिलाओं की समस्या अलग है. जागरूकता ज्यादा होने के बावजूद वे तनाव, प्रदूषण, धूम्रपान, शराब और खराब खानपान जैसी आदतों की शिकार हो सकती हैं, जो जल्दी मेनोपॉज का खतरा बढ़ाती हैं.
यह समझने के लिए कि जल्दी या समय से पहले आने वाला मेनोपॉज महिला के शरीर पर क्या असर डालता है, थोड़ा जीवविज्ञान समझना जरूरी है.
मेनोपॉज वह जैविक अवस्था है जब अंडाशय अंडाणु रिलीज करना और जरूरी हार्मोन बनाना बंद कर देता है. चिकित्सकीय तौर पर इसकी पुष्टि तब मानी जाती है जब लगातार 12 महीनों तक पीरियड्स न आएं. लेकिन इसका बदलाव वाला दौर—जिसे पेरिमेनोपॉज कहा जाता है—करीब आठ साल पहले ही शुरू हो सकता है.
इसी दौरान महिलाओं को शुरुआती लक्षण महसूस होने लगते हैं. पीरियड्स अनियमित होने लगते हैं और शरीर में कई तरह की परेशानियां शुरू हो जाती हैं—जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, शारीरिक और मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन और भूलने की समस्या आदि. इनमें से कई लक्षण मेनोपॉज के दौरान भी बने रहते हैं. इसके बाद स्त्री का शरीर जीवनभर के लिए पोस्ट-मेनोपॉज अवस्था में प्रवेश कर जाता है.
लेकिन जब शरीर के भीतर का यह तूफान शांत हो जाता है, तब भी यह बदलाव अक्सर लंबे समय का नुक्सान छोड़ जाता है—जैसे कमजोर हड्डियां या दिल से जुड़ी बीमारियां. और इसकी सबसे बड़ी वजह है कि मेनोपॉज के बाद महिला के शरीर में एक बेहद अहम ताकत—एस्ट्रोजन—कम हो जाती है. इसे आम तौर पर सिर्फ 'सेक्स हॉर्मोन’ माना जाता है, लेकिन असल में एस्ट्रोजन की भूमिका इससे कहीं ज्यादा बड़ी है.
यह शरीर के मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करता है, इंसुलिन संवेदनशीलता बनाए रखने में मदद करता है, तनाव के असर को संतुलित करता है, मांसपेशियों को बचाए रखता है और हड्डियों की मजबूती बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है. इसके अलावा यह आंतों की सेहत सुधारने, शरीर में सूजन कम करने, त्वचा को स्वस्थ रखने और दिमागी कार्यक्षमता को बनाए रखने में भी मदद करता है.
एस्ट्रोजन की कमी से बढ़ता खतरा
शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर गिरने के साथ ही मेटाबॉलिज्म में बदलाव शुरू हो जाता है. इंसुलिन में उतार-चढ़ाव, बढ़ा हुआ कॉर्टिसोल और धीमा पड़ता मेटाबॉलिज्म, शरीर में खासकर पेट के आसपास चर्बी जमा होने लगती है. मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं. शरीर में सूजन बढ़ती है, जिससे जोड़ों में दर्द और दिमागी क्षमता से जुड़ी समस्याएं शुरू हो सकती हैं.
कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ता है, जिससे दिल की बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. पिछले दो वर्षों में हुई वैश्विक रिसर्च ने यह साफ दिखाया है कि अंडाशय की कार्यक्षमता जल्दी कम होने का संबंध लंबे समय की गंभीर बीमारियों से है. 2023 में ह्यूमन रिप्रोडक्शन जर्नल में छपी एक स्टडी में पाया गया कि जिन महिलाओं को 45 साल या उससे पहले मेनोपॉज हुआ, उनमें 46-50 साल के बीच मेनोपॉज वाली महिलाओं की तुलना में डिमेंशिया का खतरा ज्यादा था.
इसी तरह 2023 की एक समीक्षा में पाया गया कि जल्दी या समय से पहले मेनोपॉज झेलने वाली महिलाओं में हार्ट फेलियर और एट्रियल फाइब्रिलेशन का खतरा बढ़ जाता है. हड्डियों की सेहत पर भी इसका गहरा असर पड़ता है.
अज्ञानता सबसे बड़ी समस्या
जिस तरह कई समाजों—भारत, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और यहां तक कि जापान—में पहली माहवारी यानी मेनार्की का उत्सव मनाया जाता है, मेनोपॉज उसके ठीक उलट है. यह चुपचाप जिंदगी के एक कोने में धकेल दिया गया बदलाव है. यह लंबे समय तक इसलिए भी नजरअंदाज रहा क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था का ध्यान हमेशा प्रजनन क्षमता पर रहा, मध्य आयु की महिलाओं की सेहत पर नहीं.
मेनोपॉज सपोर्ट प्लेटफॉर्म मियारा हेल्थ की सह-संस्थापक डॉ. गायत्री मुतुकृष्णन का मानना है कि मेनोपॉज को लंबे समय तक 'उम्र बढ़ने की सामान्य प्रक्रिया’ मानकर टाल दिया गया. वे कहती हैं, ''लाखों महिलाएं इसके लक्षण झेलती हैं, लेकिन उन्हें न सही पहचान मिलती है और न समर्थन, क्योंकि मेनोपॉज को हमेशा ऐसी चीज माना गया जिसे महिलाओं को बस सहना चाहिए.’’
सामाजिक झिझक ने भी इस विषय पर बातचीत को रोका है. कई रुढि़वादी परिवारों में माहवारी से जुड़ी भ्रांत धारणाएं मेनोपॉज तक चली आती हैं. बड़ी दिक्कत यह होती है कि महिलाओं को अक्सर समझ ही नहीं आता कि उनके शरीर में हो क्या रहा है.
फोर्टिस ला फेम दिल्ली में स्त्री रोग विभाग की वरिष्ठ निदेशक डॉ. अनिता गुप्ता कहती हैं, ''बहुत-सी महिलाएं शुरुआती लक्षणों को तनाव या बढ़ती उम्र का असर समझ लेती हैं और डॉक्टर से सलाह लेने की बजाए दोस्तों या इंटरनेट की सलाह पर निर्भर हो जाती हैं.’’
मेनोपॉज सपोर्ट प्लेटफॉर्म मिरर में कंटेंट और कम्युनिटी हेड रीति राय भी यही बात दोहराती हैं. वे कहती हैं, ''हर महिला में अलग-अलग लक्षण दिखते हैं, इसलिए शुरुआत में कई महिलाओं को समझ ही नहीं आता कि जो वे महसूस कर रही हैं, उसका संबंध मेनोपॉज से है.’’
कई महिलाओं के लिए यह दौर उनके करिअर के सबसे अहम समय में आता है. ऐसे में उन्हें डर रहता है कि अगर उन्होंने कमजोरी या परेशानी दिखाई, तो लोग उन्हें कम सक्षम समझेंगे. दूसरी तरफ कई महिलाएं बुजुर्ग माता-पिता या परिवार की जिम्मेदारियों में इतनी उलझी रहती हैं कि अपनी सेहत की देखभाल हर मुमकिन हद तक टालती रहती हैं.
बढ़ती जागरूकता
कुछ समय पहले तक मेनोपॉज के इलाज का मतलब सिर्फ अलग-अलग लक्षणों—जैसे नींद की कमी, मूड में बदलाव या जोड़ों के दर्द—का इलाज करना था. लेकिन अब यह सोच बदल रही है. देश के कई बड़े अस्पताल समूह अब मेनोपॉज के लिए समर्पित और व्यापक सेवाएं शुरू कर रहे हैं.
फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने 2024 में अपना मैत्री मेनोपॉज क्लिनिक शुरू किया, जहां मल्टीडिसिप्लिनरी कंसल्टेशन के साथ हॉर्मोन जांच, बोन डेंसिटी स्क्रीनिंग और मेटाबॉलिक रिस्क असेसमेंट जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं. दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल और हैदराबाद के फर्नांडीज हॉस्पिटल जैसे अस्पतालों ने भी महिला स्वास्थ्य विभागों के भीतर मेनोपॉज कंसल्टेशन सेवाएं शुरू की हैं.
इंडियन मेनोपॉज सोसाइटी देशभर में अपनी 64 से ज्यादा शाखाओं और 6,500 से ज्यादा सदस्यों के जरिए मेडिकल शिक्षा कार्यक्रम, वेबिनार और जनजागरूकता अभियान चलाती है. सोसाइटी की अध्यक्ष डॉ. अनिता जे. शाह कहती हैं, ''हमारा मूल विचार बहुत सरल है: महिलाएं 40 की उम्र में फिट रहें, 60 में मजबूत रहें और 80 की उम्र में भी आत्मनिर्भर रहें.’’
डिजिटल प्लेटफॉर्म भी अब उन महिलाओं के लिए अहम सहारा बनते जा रहे हैं, जिन्हें यह समझ नहीं आता कि उनके लक्षण मेनोपॉज से जुड़े हैं या नहीं. फेमटेक कंपनियां अब सिम्पटम ट्रैकिंग, टेलीकंसल्टेशन और विशेषज्ञों के नेतृत्व वाले जागरूकता कार्यक्रम जैसी सेवाएं दे रही हैं.
मिरर मेनोपॉज पर केंद्रित कम्युनिटी चलाता है, जहां महिलाएं अपने अनुभव साझा करती हैं और नींद तथा हॉर्मोनल सेहत जैसे विषयों पर सत्रों में हिस्सा लेती हैं. दूसरे स्टार्टअप भी अब व्यवस्थित क्लिनिकल मॉडल तैयार कर रहे हैं. मियारा हेल्थ 35 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं के लिए डिजिटल साथी की तरह काम करता है, जो नींद, मूड और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी हॉर्मोनल सेहत को ट्रैक करने में मदद करता है और उन्हें विशेषज्ञों से जोड़ता है.
सबसे अहम बदलाव यह है कि महिलाएं अब मेनोपॉज पर खुलकर बात करने लगी हैं.सोहा अली खान, ट्विंकल खन्ना और लीजा रे जैसी बॉलीवुड हस्तियां भी इस मुद्दे को खुलकर सामने ला रही हैं. जिस तरह अक्षय कुमार की फिल्म पैड मैन ने माहवारी को मुख्यधारा की चर्चा का हिस्सा बनाया था, उसी तरह बॉलीवुड मी नो पॉज वी प्ले जैसी भावनात्मक फिल्म के जरिए मेनोपॉज को पर्दे पर लाया. यह फिल्म तीन महिलाओं की कहानी है, जो मेनोपॉज की परेशानियों के बावजूद मैराथन दौडऩे का सपना नहीं छोड़तीं.
सबके लिए देखभाल
ये सारे बदलाव मिलकर उस मेनोपॉज केयर सिस्टम की शुरुआत का संकेत देते हैं, जिसकी भारत में लंबे समय से कमी थी. लेकिन इसकी पहुंच अब भी बराबर नहीं है. अधिकांश सेवाएं बड़े शहरों तक सीमित हैं. इसके अलावा विशेषज्ञ सलाह और जरूरी जांचें अब भी महंगी हैं और ज्यादातर मामलों में बीमा के दायरे से बाहर रहती हैं.
फिर भी जागरूकता बढ़ी है और महिलाओं को पहले से ज्यादा मदद मिल रही है. उनके लिए इसका मतलब सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि वह फर्क है जो उलझन और तकलीफ में गुजरने वाले वर्षों और अच्छी सेहत के साथ जी गई जिंदगी के बीच होता है.

