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समय की कोख में दबे स्त्री-स्वर 

मुकुल कुमार एक प्रशासनिक अधिकारी हैं जो अपनी पुुस्तक 'विमेन इन द वूम्ब ऑफ टाइम' में स्त्री-अस्तित्व, नारीवाद और पितृसत्ता की जटिल परंपराओं की खोज करते हैं

विमेन इन द बूम्ब ऑफ टाइम पुस्तक का कवर
विमेन इन द बूम्ब ऑफ टाइम पुस्तक का कवर
अपडेटेड 29 मई , 2026

चीन भारत का इतिहास केवल साम्राज्यों, युद्धों और ऋषियों का इतिहास नहीं है. उसकी अंधेरी तहों में उन स्त्रियों की अनकही उपस्थिति भी है, जिसे विमेन इन द वूम्ब ऑफ टाइम प्रकाशित करती है.

लेखक मुकुल कुमार एक प्रशासनिक अधिकारी हैं जो प्राचीन भारत में स्त्री-अस्तित्व, नारीवाद और पितृसत्ता की जटिल परंपराओं की खोज करते हैं.

इसके लिए वे प्राचीन भारत का साहित्यिक और पुरातात्विक अध्ययन करते हैं जो अपने आप में एक असामान्य और साहसिक उपक्रम है. एक सरल-से दिखने वाले प्रश्न से बात आरंभ होती है: फेमिनिज्म ही क्यों, मैस्कुलिनिज्म क्यों नहीं? और फिर इस प्रश्न को ऋग्वैदिक ऋचाओं, स्मृतियों, शास्त्रों, अभिलेखों, सिक्कों और मिथकों के भीतर गहराई तक उतार दिया जाता है.

यह पुस्तक न तो प्राचीन भारत को स्त्रियों के लिए किसी स्वर्णयुग की तरह देखती है, न केवल दमन या वंचना का इतिहास बनाकर छोड़ देती है. यह जटिलताओं को बचाए रखती है. बार-बार रेखांकित करती कि प्राचीन भारत की स्त्रियां कोई समान सामाजिक श्रेणी में नहीं थीं. कहीं वे वैदिक ऋचाओं में देवियों की तरह प्रतिष्ठित हैं तो कहीं गृहस्थ व्यवस्था की कठोर सीमाओं में बांध दी गई हैं.

अलग अलग ग्रंथों के बीच जब लेखक कामसूत्र पर आते हैं तो उसे लोकप्रिय, सतही और कामोत्तेजक छवि से इतर एक गंभीर सामाजिक दस्तावेज की तरह पढ़ते हैं. गणिकाओं से लेकर गृहिणियों तक की इच्छाओं, उनकी आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक उपस्थिति को ग्रंथ में री-रीड करना बहुत आसान काम नहीं है.

यही वजह है कि महाकाव्यों की स्त्रियां इस पुस्तक में करुणा की मूर्तियां भर नहीं रह जातीं. मुकुल उनके भीतर की राजनीतिक चेतना, प्रतिरोध और नैतिक जटिलता को सामने लाते हैं. वे इन पात्रों को पितृसत्तात्मक व्याख्याओं की धूल से बाहर निकालकर पुन: पढ़ते हैं.

इसी तरह अभिलेखों और मुद्राओं के माध्यम से स्त्रियों की उपस्थिति दर्ज करना पुस्तक को अलग ऊंचाई देता है. स्त्रियों के नाम वाले सिक्के, उनके किए या करवाए दान, निर्माण और प्रशासनिक हस्तक्षेप, ये सब इतिहास के हाशिए पर छूटे वे प्रमाण हैं जिन्हें साहित्यिक परंपराओं ने अक्सर गौण बना दिया. लेखक इन बिखरे हुए चिह्नों को जोड़कर एक ऐसा स्त्री-इतिहास रचते हैं जो आधिकारिक आख्यानों के बरक्स खड़ा होता है.

हां, पुस्तक कुछ जगहों पर ठिठकती भी है. कहीं भाषा अकादमिक हो जाती है, कहीं कुछ अंशों में शोध रिपोर्ट की तरह सूखी जबकि विषय अपने भीतर कहीं अधिक साहित्यिक ताप और भावात्मक विस्तार की मांग करता है.

फिर भी, कुल दस पाठ वाली इस पुस्तक को शोध की गंभीरता और ईमानदारी के लिए पढ़ा जाना चाहिए. मुकुल कुमार अतीत का रोमानीकरण नहीं करते. वे उसके भीतर दबे हुए स्त्री-स्वरों को सुनने की कोशिश करते हैं. उनका आग्रह रहता है कि भारतीय नारीवाद की जड़ें केवल आयातित विचारधाराओं में नहीं बल्कि इसी भूमि की स्मृतियों, संघर्षों और परंपराओं में भी मौजूद हैं. जटिल, विरोधाभासी लेकिन उज्ज्वल.

पुस्तक का नाम: विमेन इन द
बूम्ब ऑफ टाइम
लेखक: मुकुल कुमार
प्रकाशन: ब्लूवन इंक
कीमत: 799 रुपए.

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