नाम भले इसका अक्स तमाशा हो पर, होशियार! इसमें तमाशे जैसा कुछ भी नहीं. हां, थोड़ा अटकाने वाले नाम के जरिए यह ऑडियंस को जरूर खैंच लाता है. लेकिन खुलते ही समझ आता है कि यह तो म्यूजिकल के आवरण में देह और आत्मा, कुफ्र और ईमान यानी द्वैत-अद्वैत के फलसफे की पूरे ढाई घंटे की मंजरकशी है.
नटराज, शिव, आदिदेव के बाद अर्धनारीश्वर को अंडरलाइन करता मंगलाचरण आपको कथा के कॉन्फिलक्ट का इशारा दे देता है. फिर शुरू होता है निथरी हुई कविता में स्टेज पर उतरता एक गंभीर संवाद, थोड़े हास्य के क्षेपक के साथ.
अक्स तमाशा दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की ताजातरीन प्रस्तुति है, जिसके साथ रंगमंडल के दस नाटकों के ग्रीष्मकालीन नाट्य समारोह का विद्यालय के ही अभिमंच सभागार में 8 मई को आगाज हुआ. शिवपुर के स्वर्गवासी राजा के तंदुरुस्त बछड़े-से चंचल पुत्र शिवनाथ को तमाम प्रस्तावों के बावजूद कोई कन्या पसंद नहीं आ रही.
उत्तराधिकारी के लिए बेकल-बेताब महारानी मायावती का आदेश है: हफ्ते भर में फैसला न किया तो समस्तीपुर के महाराज की बेटी शंपा से ब्याह करवा दिया जाएगा. इसी बीच एक रात राजकुमार की ''जांघों में नश्तर-सा चुभा.’’ सपनों में ज्यों खसी माल मूरति मुसकानी.
अनिंद्य सुंदरी, महल की ही दीपदान वाली मूर्ति हिली, हंसी और हौले-हौले उनींदे शिवनाथ की रूह में घुलती-पिघलती उसे साथ बहा ले गई. अब मजनूं/रांझे-सा बेसुध वह रात-रात भर दूर किसी झील किनारे बैठ, चुल्लू के पानी में उसका अक्स खोजता.
राजकुमार पंचायत में अपने को ही तलवार से दो हिस्से कर दो घड़ों में रखने, एक से खुद और दूसरे से उस सुंदरी के निकलने पर ब्याह करा देने का आदेश देता है. किस्सा-ए-मुख्तसर यह कि दूसरे घड़े से सुंदर कन्या की जगह नागराज निकलते हैं. अब ब्याहकर आई निराश-उदास शंपा प्रिय बिरह में शय्या पर पड़ी-पड़ी कड़ियां गिनती है, फिर नागराज से ही नेह लगा लेती है.
यह नाटक हमारे समय के स्वनामधन्य लेखकों में से एक, कन्नड़ के चंद्रशेखर कंबार ने यक्षगान कलाकारों के साथ प्रयोग करते हुए मूलत: सीरी संपिगे (शंपा वाला किरदार) शीर्षक से लिखा था. यानी केंद्र में स्त्री.
सपनों की चाहत तलाशता राजकुमार; पति से अंग-संग के लिए व्यग्र शंपा; बेटे-बहू की आकांक्षाओं के द्वैत में उलझी महारानी. तीसेक साल पहले भी इसे रंगमंडल के साथ कर चुके दिग्गज रंग निर्देशक भानु भारती इसे फॉर्म और स्टाइल में बहुत उलझाते नहीं. भरा-पूरा कोरस मूड के अनुरूप कुछ शब्द-ध्वनियों, आलाप और संक्षिप्त गायिकी के साथ यथासमय नैरेटिव में आता-जाता है.
अक्स तमाशा लंबा, जटिल और चैलेंजिंग है, जितना निर्देशक और कलाकारों के लिए उतना ही दर्शक के लिए. लेकिन उत्तरार्ध तक आते-आते नागराज-सा कोई हमारी नसों में सरसराने लगता है. सभा-संगतों, मुलाकातों से गुजरते हुए पसंद के चेहरे और विचार जिस तरह चोरी-चुपके हमारे भीतर सरक लेते हैं. अपने केंचुल में रहते हैं, किसी को दिखते नहीं.
कंबार के कथ्य को रामगोपाल बजाज के काव्यात्मक संवेदना भरे अनुवाद ने इसे सही मायने में दृश्य-श्रव्य काव्य बना दिया है. उत्तरार्ध के जटिल अर्थ भरे दृश्यबिंब वाले संवादों में उनका भाषा कौशल झलकता है. इसके द्वैत में आपको ओथैलो (शेक्सपियर), नागमंडल (गिरीश कारनाड) और अंधा युग (धर्मवीर भारती) जैसी झलकियां दिख सकती हैं.
यह प्रयोग उस सिलसिले की एक कड़ी है जिसके तहत 25-30 साल पुराने और अपनी मंडली के साथ खेले जा चुके नाटकों को एनएसडी रंगमंडल उन्हीं निर्देशकों/टीम से जुड़े लोगों के साथ फिर से तैयार करवा रहा है. इसके तहत पिछले दो-तीन साल में बजाज के निर्देशन में धर्मवीर भारती का अंधा युग और देवेंद्रराज अंकुर के निर्देशन में भारती का ही बंद गली का आखिरी मकान तैयार किए गए हैं.
रंगमंडल में पूर्वोत्तर की समर्थ अभिनेत्रियों की एक समृद्ध परंपरा भी इस नाटक से आगे बढ़ती दिख रही है: सीमा बिस्वास, झिलमिल हजारिका, बरनाली बोरा और पोट्शंगबम रीता के बाद अब जोरहाट की अप्सरा खान मंडली का हिस्सा हैं और इस नाटक में शंपा के किरदार में हैं.
एनएसडी रंगमंडल का यह समारोह 14 जून तक चलने वाला है.
सीमा बिस्वास से आगे बढ़ी पूर्वोत्तर की समर्थ अभिनेत्रियों की परंपरा रंगमंडल में आगे बढ़ी है. झिलमिल हजारिका, बरनाली बोरा और पोट्शंगबम रीता के बाद अब अप्सरा खान.

