- अच्युत सिंह
बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक अब्दुर्रहीम खानेखानां के जीवन को केंद्र में रखकर लिखा गया दीपा गुप्ता का उपन्यास हुमा का पंख ऐतिहासिक उपन्यासों की श्रेणी में एक सराहनीय हस्तक्षेप है. यह कृति अकबर के गुरु और संरक्षक बैरम खां के पतन से लेकर रहीम के अंतिम समय तक की लंबी ऐतिहासिक यात्रा को समेटे है. मुगलकालीन सत्ता-संघर्ष, दरबारी षड्यंत्रों और युद्धों के बीच एक कवि-हृदय के अंतर्द्वंद्व को प्रभावी ढंग से उकेरा गया है.
लेखिका ने रहीम को केवल एक कुशल योद्धा और राजनीतिज्ञ के रूप में ही नहीं बल्कि एक ऐसे संवेदनशील मनुष्य के रूप में चित्रित किया है जो तलवारों की धार के बीच आत्मिक शांति की तलाश में रहता है. हालांकि, नायक को पूर्णता प्रदान करने की चाहत में कई बार उनकी मानवीय कमजोरियां, निजी महत्वाकांक्षाएं और अंतर्द्वंद्व कहीं पीछे छूट गए हैं जो एक ऐतिहासिक पात्र को अधिक मांसल और विश्वसनीय बनाते हैं.
उपन्यास में कुछ दृश्य बेहद रोचक तो कुछ बेहद काल्पनिक लगते हैं. तानसेन का पहली बार दरबार आगमन, स्वामी हरिदास से अकबर की मुलाकात, जसोदा बार-बार यों भाखै पदबंध में बार-बार शब्द की व्याख्या और जन मुख निकसत नाहिं अध्याय में रहीम की तीक्ष्ण बुद्धि और दानवीरता के उद्धरणों को पढ़कर एक कौतूहल जागता है.
दूसरी ओर सीकरी में तुलसीदास की कैद और उसके बाद बंदरों और लंगूरों का उपद्रव, रहीम के बेटे 'दरार’ की रूह का नाटकीय आगमन, चांद बीबी का याचक बनकर मुगलिया खेमे में आना, वृंदावन में भगवान गोविंद देव से रहीम की मुलाकात जैसे कितने ही प्रसंग ऐतिहासिक सत्यता के बजाय कल्पना की उड़ान अधिक प्रतीत होते हैं. ऐसे कुछ दृश्य न भी होते तो भी कथा के प्रवाह पर कोई आंच न आती.
लेखिका ने प्रस्तावना में स्पष्ट किया है कि उन्होंने रहीम के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व को जानने-समझने में काफी पसीना बहाया है. यही वजह है कि घटनाओं के क्रम, उनके कालखंड और पात्र काफी हद तक विश्वसनीय लगे हैं. मगर बात जहां तत्कालीन समाज की बुनावट, खान-पान, वास्तुकला या मनसबदारी की जटिलताओं की आती है, वहां किताब एक पारंपरिक ढर्रे पर चलती नजर आती है. चूंकि यहां केंद्र में रहीम हैं इसलिए उन पाठकों को थोड़ी निराशा हाथ लग सकती है जो मुगलिया परिवेश की नई और अनछुई परतों को टटोलने की इच्छा रखते हैं
भाषा के धरातल पर उपन्यास अत्यंत सहज और प्रवाहपूर्ण है. रहीम के छंद अपनी मूल भावना के साथ आए हैं. कुछ भावनात्मक क्षण, चरित्रों की अंतर्दशा, उनकी दुविधाओं को उजागर करने में लेखिका सफल रही हैं. खासकर मानसिंह के अवसान और जहांगीर की कैद में रहते हुए रहीम के कुछ पल इसमें गिने जा सकते हैं.
लेकिन कुछ अत्यंत मार्मिक क्षणों में, जैसे बैरम खां और बीरबल की मृत्यु के बाद अकबर की मनोदशा, बेटे के कटे सिर को देखकर रहीम की मन:स्थिति, पुत्र समान फहीम, मित्र अली खां और बादशाह अकबर की मृत्यु के प्रसंग में भाषा जिस मनोवैज्ञानिक गहराई की मांग करती है, वहां वह थोड़ी आलंकारिक ही रह गई है.
उपन्यास के अध्यायों का नामकरण ज्यादातर रहीम के पदों पर करना एक उत्कृष्ट रचनात्मक प्रयोग है. इसके अलावा शीर्षक हुमा का पंख आकर्षक भी है और उपन्यास का आधार भी. बतौर लेखिका हुमा का पंख जो मुगल शहजादों के इस्तेमाल के लिए निर्धारित है उसका प्रयोग रहीम भी करते हैं.
जाहिर है इस पंख को मुकुट पर धारण करने की आज्ञा बादशाह अकबर से ही प्राप्त हो सकती है परंतु धर जड्डी अम्बर जडा अध्याय में रहीम के पास हुमा का पंख देखकर अकबर जिस तरह से आश्चर्य और प्रश्नाकुलता व्यक्त करते हैं, उसे पढ़कर शंका उठती है कि रहीम को क्या वास्तव में हुमा का पंख लगाने की इजाजत या सम्मान बादशाह अकबर से प्राप्त हुआ था!
कुल मिलाकर, यदि आप रहीम के व्यक्तित्व और उनकी महानता के बारे में एक बेहतर समझ विकसित करना चाहते हैं तो यह उपन्यास आपको जरूर पढ़ना चाहिए. हालांकि एक इतिहास प्रेमी की दृष्टि से यह मुगलकालीन समाज या प्रशासन पर कोई नई रोशनी नहीं डालता, फिर भी यह एक कवि-हृदय की वह गाथा है जो इतिहास के सूखे तथ्यों में संवेदना के रंग भरती है.
पुस्तक का नाम: हुमा का पंख
लेखक का नाम: दीपा गुप्ता
पब्लिकेशन: राजपाल
कीमत: 475 रुपए

