सिख न ईसाई, न हिंदू, न मुसलमान है तू
तेरा ईमान यह कहता है कि इंसान है तू
कुछ किताबें धीरे-धीरे हमारी रूह में उतरती हैं. अ सेलिब्रेशन ऑफ मेमोरीज खोलते ही लगता है जैसे किसी पुरानी हवेली का दरवाजा धीमे से खुल रहा है और एक बुजुर्ग धीमी आवाज में कह रहा है, आओ! तुम्हें एक ऐसा हिंदुस्तान दिखाऊं जो नक्शे पर तो है, दिलों में कम होता जा रहा है.
यह किताब कंवर मोहिंदर सिंह बेदी 'सहर’ की उर्दू में लिखी आत्मकथा का अंग्रेजी अनुवाद है. यह एक आदमी की कहानी कम, एक तहजीब की आखिरी गवाही ज्यादा है. यहां मुशायरे अदबी जलसे से ज्यादा दिलों को जोड़ने वाले पुल सरीखे हैं. यहां एक सिख शायर मोहम्मद रफी के लिए रो सकता है और कोई मुसलमान दोस्त गुरु नानक की वाणी सुनते हुए अपने भीतर उजाला महसूस कर सकता है.
आज जब हर तरफ पहचान की दीवारें ऊंची की जा रही हैं, मुल्क लड़ रहे हैं तब 'सहर’ की आवाज एक दरवेश की तरह सुनाई देती है: जंग करनी है करें हम मिल के बेकारी से जंग/ बुग़्ज़ से, कीने से, नफ़रत से, दिल-आज़ारी से जंग/ भूख से, इफ़लास से, गुरबत से, नादारी से जंग.
सच पूछिए तो यही इस किताब का केंद्रीय स्वर है. मोहिंदर सिंह बेदी अपने बारे में लिखते तो हैं पर अपना ओहदा किनारे रखकर. उनके पास एक तरफ गुरु नानक की विरासत है तो दूसरी तरफ उर्दू की नफासत. एक तरफ मुशायरे हैं, दूसरी तरफ अखाड़े. एक तरफ बड़े ओहदों के गलियारे हैं, दूसरी तरफ गरीबों के लिए खुला दरवाजा. पढ़ते हुए वे सचमुच उस हिंदुस्तान के प्रतिनिधि लगते हैं जो कई नदियों के संगम से बना है. इस आत्मकथा को नफरत के खिलाफ लिखी गई किताब के तौर पर भी पढ़ा जा सकता है.
विभाजन का दर्द यहां इतिहास की तारीख नहीं बनता बल्कि किसी बूढ़े आदमी की कांपती हुई उंगलियों में उतर आता है. इस आत्मकथा में बार-बार एक दृश्य लौटता है, लोगों का आना. कोई मदद मांगने आया है, कोई मशविरा लेने. कोई शेर सुनाने तो कोई बस बैठने. आज के समय में, जब लोग अपने घरों से ज्यादा अपने विचारों को बंद कर चुके हैं, यह खुलापन लगभग चमत्कार जैसा लगता है. कह सकते हैं असल मायनों में जीवन यही है.
उनका मिसरा है, मरना तो लाजि़म है इक दिन जी भर के अब जी लूं/ मरने से पहले मर जाना मेरे बस की बात नहीं. यह सिर्फ शायरी नहीं, जीने का एक फलसफा है जो वे आने वाली नस्लों के लिए छोड़ गए. उनके पौत्र अश्वजीत सिंह का लिखा परिचय पढ़कर लगता है कि यह किताब सिर्फ दादा की याद नहीं, एक पीढ़ी की अमानत है जो हम तक पहुंची है. कांपते हाथों से, पूरी आस्था के साथ. वहीं कामना प्रसाद का अनुवाद भाषा-परिवर्तन से ज्यादा भावों के पुनर्जन्म जैसा है. अंग्रेजी में भी उर्दू की नरमी और पंजाब की मिट्टी की गर्मी उन्होंने बनाए रखी.
आज के घोषणाओं भरे दौर में, जहां हर कोई बस बोल रहा है, तब अ सेलिब्रेशन ऑफ मेमोरीज हमें सुनना सिखाती है. धीमे. ठहरकर. मनुष्य की तरह. जमाने से ज्यादा उदार होना सिखाती है.
पुस्तक का नाम: अ सेलिब्रेशन ऑफ मेमोरीज
लेखक: कंवर मोहिंदर सिंह बेदी 'सहर’
अनुवाद: कामना प्रसाद
पब्लिकेशन: स्पीकिंग टाइगर, 899 रुपए

