मामला लीगल है वेब सीरीज का दूसरा सीजन इसी अप्रैल में आया है, पहले के ठीक दो साल बाद. 16 एपिसोड में आठ घंटे से ज्यादा की और वह भी कानूनी दांवपेचों से सनी कहानी देखने के बावजूद जिज्ञासा बनी रह जाती है.
कोर्टरूम ड्रामा तो दुनिया भर के सिनेमा में सदा से ही किस्सागोई का पसंदीदा फॉर्मेट रहा है लेकिन कचहरी की रोजमर्रा की जिंदगी, वहां के हर छोटे-बड़े किरदार और उसकी पूरी आबोहवा, उसके खट्टे-मीठेपन का अच्छे से हाल लेते हुए कोई कहानी कही गई हो, हाल के वर्षों में इसकी मिसाल, खासकर हिंदुस्तान में, दिखती नहीं.
यह किस्सा है पटपड़गंज जिला अदालत का. नितांत जगलर और एटॉर्नी जनरल बनने तक का स्वप्न संजोए एडवोकेट विशेश्वर दयाल उर्फ वीडी त्यागी (रवि किशन) तिकड़म, परिस्थिति, महत्वाकांक्षा और कुछ सहज बुद्धि के गुणा-भाग में अनायास जिला जज बन जाते हैं.
लेकिन तमाम जज्बाती उतार-चढ़ावों से गुजरते हुए दूसरे सीजन के अंतिम दृश्य में वे फिर अपने चैंबर में कदम रखते दिखाई देते हैं. कानून के लंबे हाथों से पीठ खुजाने वाले, ''घुलाम अली’’ के फैन, बातचीत में वसीम बरेलवी के शेर कोट करते वीडी के लिए त्यागी नाम नहीं एटीट्यूड भी है. और फलसफा? डरे हुए क्लाइंट को कॉन्फिडेंस दो और कॉन्फिडेंट क्लाइंट को डराओ.
हर एपिसोड में आते-जाते मुवक्किलों को छोड़ भी दें तो इस पटपड़गंज दल के करीब दर्जन भर दिलचस्प सदस्य और हैं: त्यागी के हंसोड़ यार वकील लखमीर सिंह बल्ली उर्फ मिंटू (अंजुम बत्रा); हार्वर्ड से एलएलएम करने के बाद यहां प्रैक्टिस करने उतर रहीं आदर्शवादी अनन्या श्राफ (नायला ग्रेवाल); एक केस के लिए तरसती, आंखों से डोरे डालती और काइयां लोगों की ''सुजा देने वाली’’ सुजाता दीदी (निधि बिष्ट); डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के मैनेजर विश्वास पांडे (अनंत वी. जोशी); पुलिसवालों के लिए लड़ते एडवोकेट पीपी (ब्रजेंद्र काला); सबकी चाकरी में लगा और बंदर भगाने के लिए मंकी रिपेलिंग ऑफिसर बनाया गया, लंगूरवेशधारी, खबरची शंभू (कुमार सौरभ) आदि.
होने को बार एसोसिएशन के चुनाव भी हैं, खांटी मुवक्किलों के देसी मिजाज भी और जजों के रागरंग भी. लेकिन पटपड़गंज का मॉनसून तो एक-एक केस के लिए आपस में झपटमारी करते वकीलों से ही बनता है.
मामला लीगल है देखते हुए धीरे-धीरे आपको पता चलता है कि सामने जो घट रहा है वह बस कोर्ट की रोजमर्रा की जिंदगी पर रचा गया गुदगुदाने वाला एंटरटेनमेंट भर नहीं. यह सच्चे मुकदमों को फिल्टर कर बड़े पैमाने पर लोगों को प्रभावित कर रहे मुद्दों पर ध्यान खींचने की एक संजीदा युक्ति है.
मसलन, समलैंगिकों से जुड़े संपत्ति विवाद के जरिए लोक अदालत पर बात, ''हैचबैक के रेट के जमाने में स्मार्टफोन के रेट में किडनी (एक डॉयलॉग) बेचते-खरीदते’’ अंगदान के रैकेटियर, 'गांजा खा गए चूहों’ के जरिए सबूतों को रखने के लिए थानों में पर्याप्त जगह और बजट न होने का मसला. इसी तरह दबंग मां से डरा लेकिन थाने में हिम्मत पाकर पत्नी से तलाक खत्म करता पति.
सीरीज में एक सुस्पष्ट सोच के साथ कानूनी पहलुओं-परिवेश की विस्तृत तैयारी दिखती है. इसकी लिखावट की खूबी यह है कि गंभीर और बोझिल माने जाते विषय को जैसे अपनी मुट्ठी में लेकर उसे हास्य के सांचे में ढाला गया है. मिसालें अनेक हैं: एडवोकेट पीपी जज को मुआयना कराते हुए बताते हैं: ''जनाब!
ये है कोर्ट का मालखाना. स्टीफन हाकिंग अगर पटपड़गंज आए होते तो ब्लैकहोल कब का डिस्कवर हो गया होता.’’ कोर्ट परिसर में स्कूटर को धक्का लगवाता विश्वास कहता है: ''गाड़ी तो मैं भी ले लेता लेकिन वो क्या है ना कि आदमी को अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए.’’ ऐसे संवादों पर आप ठठाकर हंसते हैं लेकिन फिर भीतर कहीं यथार्थ की नसें खिंचती हैं.
लेकिन मामला लीगल है को सही मायनों में अंजाम तक पहुंचाया है उसके अभिनेताओं ने. रवि किशन के साथ नायला, निधि, अनंत, ब्रजेंद्र ने वस्तुत: समां बांधा है. संवाद के एक-एक शब्द में भावनाएं भरकर उन्होंने ऐसी जान डाली है कि उन्हें बार-बार देखने को जी करता है. प्रस्तुति का पूरा तेवर गुड़ही सोंठ की मिठास और टाटरी की खटास जैसा है. यह ऐसी दुर्लभ हिंदी सीरीज है जिसके अगले सीजन को लेकर सहज जिज्ञासा पैदा होती है.
सीरीज में एक सुस्पष्ट सोच के साथ कानूनी पहलुओं-परिवेश की विस्तृत तैयारी दिखती है. गंभीर और बोझिल माने जाते विषय को लेखकों ने जैसे मुट्ठी में लेकर उसे भीने हास्य के सांचे में ढाला है.
सिने-सुझाव: सुमित सिंह
सुपर डीलक्स 2019
प्रेम, भोग, ऊब और सन्यास...इन्हीं भावों के गिर्द बनी यह तमिल फिल्म अपने दर्शक के मन पर आसमानी बिजली की तरह गिरती है. अतुलनीय. जो जाने सो कहे नहीं, जो कहे सो जाने ना. किसी फ्रेश डिजाइन वाले स्वेटर पर की गई महीन बुनाई जैसी आपस में बारीकी से बुनी हुई चार कहानियां. चार नौजवान एक दोस्त के घर पॉर्न फिल्म इसलिए देखने बैठे हैं ताकि पता चल सके कि इन्हीं चार में से एक लड़के की मां ने इसमें लीड रोल किया है या नहीं?
अनचाही शादी में फंसी एक लड़की अपने पुराने प्रेमी के साथ सेक्स करने को होती ही है कि, इस पूर्व प्रेमी की अचानक मौत हो जाती है. अब इस लड़की और इसके पति को मिलकर ये लाश छिपानी है, लेकिन तमाम सवाल जवाब के बीच. एक से बढ़कर एक मंझे हुए कलाकार और अभूतपूर्व कहानी मिलकर पर्दे पर ऐसा जादू रचते हैं जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती. बेहद जरूरी और असरकारी फिल्म.
कहां देखें: नेटफ्लिक्स
संभवम अध्यायम, ओन्नु 2026
कोई क्या प्रेम से भी शापित हो सकता है? यह फिल्म एक ऐसे शापित जंगल की कहानी कहती है जिसे बरसों पहले एक प्रेमी जोड़े ने शाप दिया था. अब जब एक नौजवान पुलिस अधिकारी अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़कर सुदूर जंगल के बीच बने पुलिस स्टेशन में अपनी आमद करवाता है तो यह आदमी खुद को ऐसे रहस्य और आशंकाओं के बीच पाता है जो एकबारगी अनंत दिखाई देती हैं. यहां पहेलियां हैं, लेकिन उनके जवाब जीवन मृत्यु तय करते हैं.
इस बेहद धारदार मलयालम थ्रिलर फिल्म में समय सीधी रेखा में नहीं वरन गोल चक्र में चलता है. चाहे जितना भागें, पुलिस के लापता जवान फिर-फिर लौटकर वहीं लौट आते हैं. इसी लौटने में बरसों पुरानी कई घटनाएं लौटती हैं, और लौटती हैं वो संभावनाएं जो अब समय से परे जाकर समय की स्मृति बन गई हैं. हाल ही में ओटीटी पर आई अगर कोई शानदार थ्रिलर देखनी हो तो इस फिल्म को मौका जरूर दें.
कहां देखें: जियो हॉटस्टार
बेबल 2006
चार कतई अलग तरह की जमीन से उपजी कहानियां, उनके किरदार और इनका एक दूसरे पर असर कोई बखूबी निभा पाया तो यही फिल्म थी. मोरक्को, जापान, अमेरिका और मैक्सिको में घट रही ये कहानियां मशहूर संगीतकार गुस्ताव सांताओलाला के नींद सरीखे कोमल संगीत के साथ स्क्रीन पर जब आती हैं, आत्मा का भोजन बनती हैं.
एक गैरकानूनी बंदूक से खेलते हुए दो मोरक्कन बच्चे गोली चला बैठते हैं. गोली का शिकार होती है एक बस में बैठी महिला. अब बीच रेगिस्तान इस महिला की जान बचाने से शुरू हुई कहानी उस बंदूक के चक्कर लगाते हुए हमें एक ही दिन में इतने किरदारों से मिलवाती है कि लगता नहीं आप एक फिल्म देख रहे हैं. इसे किसी भी कारण देखने से चूका नहीं जा सकता. बैकग्राउंड म्यूजिक बेमिसाल है.
कहां देखें: प्राइम वीडियो

