- रमाशंकर सिंह
राधावल्लभ त्रिपाठी पुल निर्माता हैं. उन्होंने प्राचीन और अर्वाचीन, संस्कृत और हिंदी एवं परंपरा और आधुनिकता के बीच पुल बनाए हैं. वे इतिहास और स्मृति को वर्तमान में खींच लाने वाले विद्वान हैं. उन्होंने संस्कृत भाषा को एक प्रवाहमान साभ्यतिक उपलब्धि के रूप में देखा है, और इसके साथ ही इसकी कमजोर जगहों पर उंगली भी रखी है. उनके ग्रंथों को पढ़ते हुए पाठक पाते हैं कि वे भारत के बौद्धिक अतीत को तीक्ष्ण लेकिन एक नरम निगाह से देखते हैं.
उन्होंने उन विद्वानों के जीवन और विचार से हमारा परिचय कराया है जो भाषा, व्याकरण, कथा, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में सक्रिय थे. अपने नवीनतम ग्रंथ भारत की सारस्वत साधना में उन्होंने ऐतरेय महीदास, पाणिनि, कौटिल्य, वात्स्यायन, भरत, भर्तृहरि, आदि शंकर, वामन, आनंदवर्धन, कुंतक, अभिनवगुप्त, पण्डितराज जगन्नाथ, गोपीनाथ कविराज, रामावतार शर्मा और रेवाप्रसाद द्विवेदी जैसे ज्ञानियों के संसार को खोलने का काम किया है.
वात्स्यायन के कामसूत्र पर चर्चा करते हुए राधावल्लभ जी औपनिषदिक ऋषि श्वेतकेतु के बारे में बताते हैं कि उन्हें महाभारत सहित कामसूत्र में किस तरह से याद किया गया. पृष्ठ 61 पर वे लिखते हैं, 'बलात्कार का मुखर व कारगर विरोध करने वाले पहले ऋषि श्वेतकेतु थे’. इस प्रसंग में स्त्री-पुरुष संबंध या विवाह को लेकर वह समकलीन नजरिया पलट जाता है जहां भारत में विवाह को एक 'पितृसत्तात्मक और पैथोलॉजिक’ माना जाता रहा है और यह भी कि स्त्रियों के पक्ष में कोई खड़ा होने वाला नहीं था.
यह किताब पढ़ते हुए हमारा वर्तमान कहीं बेहतर तरीके से समझ में आने लगता है. वात्स्यायन के कामसूत्र पर यह किताब परिवार नामक संस्था से बाहर लेकिन समाज के भीतर यौन जीवन की पड़ताल भी करती है. यह तो इस किताब का एक छोटा सा हिस्सा हुआ. जिस वजह से यह किताब पढ़ी जानी चाहिए, वह इसकी विविधता और इतिहास के प्रति एक खुला और विस्तृत रवैया है.
यह बात खुले तौर पर मान ली जानी चाहिए कि भारत में ज्ञान की सामाजिक पृष्ठभूमि आमतौर पर उच्च जातीय रही है. शुरुआत में ऐतरेय महीदास जैसे ऋषि थे जो दासीपुत्र थे लेकिन विद्वानों की इसी परंपरा में शंकराचार्य भी थे जिनके जैसा न कोई भूतो न भविष्यत हुआ.
यह किताब शंकर को एक संवाद पुरुष के रूप में पेश करते हुए भी उनकी सामाजिक दृष्टि के प्रति कुछ नहीं छुपाती खासकर जब शंकर ने एक लंबे तर्क-वितर्क के बाद स्थापित किया कि शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है. बिना किसी घोषणा के यह किताब यह सब भी उजागर करती है. ज्ञान का यह सामाजिक आधार भारत की सारस्वत परंपरा में शुरू से लेकर अंत तक फैला हुआ है.
इन पंक्तियों के लेखक ने इस किताब को नजदीक से बनते हुए देखा है, खासकर अभय कुमार दुबे के साथ काम करते हुए हमने पाया कि उपनिवेशवाद की सांस्थानिकता अभी तक कायम है और उससे निबटने के लिए वि-उपनिवेशन की एक गहन विमर्शी परंपरा स्थापित करनी होगी. इस किताब की भूमिका में अभय जी ने उसे स्पष्ट करने का जतन किया है. उन्नीस अध्यायों में विभक्त इस किताब के सभी अध्याय एक दूसरे से जुड़े हैं लेकिन पंडितों का संसार और संसार में पंडित तथा प्राच्यवाद को एक साथ पढ़ा जा सकता है.
उपनिवेशवाद ने एक भाषा और विद्या के रूप में संस्कृत को अपना ताबेदार बनाया. भारतीय पंडितों ने उसका एक प्रतिवाद रचने की कोशिश की लेकिन बहुत ही शीघ्र ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने प्राच्यविद्या को उपनिवेश की सहचरी बना लिया और उसने सत्ता के बल पर पूर्व को परिभाषित करने का उपक्रम किया.
यह किताब उपनिवेशवाद के उस बौद्धिक छद्म को खूबसूरती से अनावृत करती है. यह किताब राधावल्लभ त्रिपाठी का मास्टरपीस है और इसे सभी को पढ़ना चाहिए.
पुस्तक का कवर: भारत की सारस्वत साधना
लेखक का नाम: राधावल्लभ त्रिपाठी
पब्लिकेशन: वाणी प्रकाशन
कीमत: 595 रुपए.

