
ईरान के चार सियासी मौसम मैंने देखे हैं. उसी के आधार पर अक्सर नई ईरानी पीढ़ी से मैं कहती हूं कि ईरान की क्रांति का आंखों-देखा इतिहास मेरे पास है जो तुम नहीं देख पाए. और यह सच है.
पहला ईरान शाह पहलवी का ईरान था जिसे मैंने एक विद्यार्थी की तरह 1976 में देखा था. खुशहाली, खूबसूरती, खुशगुफ्तारी. लौट कर लिखा था ईरान : एक ग़ज़ल.
तीन माह के प्रवास में आम और खास से मिलना हुआ. वह रमजान का माह था जब हम 13 भारतीय शाहबानो ईरान फरह दीबा से मिले थे. मैंने अपने फारसी से हिंदी-उर्दू में किए अनुवाद भेंट किए.
दूसरी शख्सियत प्रधानमंत्री हुवैदा की थी. इसके अलावा खानलरी साहब, सईदी सीरजानी जैसे फारसी भाषा-साहित्य के विद्वानों से मिलना हुआ. लगा कि ईरान हमसे भाषा और जीवन शैली में भले अलग है पर अंदर से हम एक हैं. कह सकती हूं कि ईरान मुझे चाचा या मामा के घर-सा अपनेपन से भरा लगा. पंडित नेहरू के शब्दों में कहूं तो 'एक चने की दो दाल’.

शाम में जब हम साथ बैठते तो कई तरह की बातें करते. एक दिन मैंने कहा, ''मैं भारत लौट कर ईरान पर बहुत कुछ लिखूंगी.’’ मेरी इस बात पर दिल्ली के फारसी प्राध्यापक बोले, ''अभी तक ईरान पर करंजिया के अलावा तो किसी का लिखा पढ़ा नहीं, फिर आप क्या लिखेंगी?’’
बात आई-गई हो गई. ब्लिट्ज़ टेबलॉयड के एडिटर आर.के. करंजिया ने शाह ऑफ ईरान का एक बड़ा इंटरव्यू पुस्तक के रूप में लिया था जो कई भाषाओं में शाया हुआ. उर्दू में छपी वह पुस्तक हम सब को फारसी ग्रंथों के साथ भेंट स्वरूप दी गई थी. ईरान से लौटकर मेरी पहली अनुवाद की पुस्तक किस्सा जाम के नाम से छप गई जो खुरासान की लोक-कथाओं का अनुवाद था. इस दौर से आप समझ सकते हैं कि ईरान में बड़े अधिकारियों से मिलना-जुलना और बाकी पठन-पाठन की संस्कृति कैसी रही.

क्रांति की आहट
अपने खर्चे पर 1978 में दोबारा ईरान गई. इरादा था रुस्तम के किरदार को बच्चों के लिए कॉमिक्स की तरह लाने का. दो वर्ष के बीच ईरान बदल चुका था. शाह ईरान के साथ शाहनामा के प्रति भी एक विद्रोह की भावना को पनपते देखा और सड़कों पर 80,000 लोगों को टैंक और मशीनगन के सामने बैठे. पहली पंक्ति में मौलवी थे, दूसरी में औरतें और मर्द. पहली बार महसूस हुआ कि ईरान की प्रकृति ज्यादा हसीन है या वहां के लोग? क्रांति की शुरुआत हो गई और मैंने लौटकर लिखा ज्वालामुखी का निहत्था उद्गार!
जब 1979 में मैं तीसरी बार वहां गई तो ईरान का मौसम बदल चुका था. शाह की तस्वीरें और मूर्तियां हटाई जा रही थीं और उनकी जगह आयतुल्लाह खुमैनी के पोस्टर नजर आने लगे. मेरे पूछने पर कि यह कौन हैं? लोगों ने कोई तसल्लीबख्श जवाब नहीं दिया. धीरे-धीरे बाजार और आम आदमी के मुंह पर आयतुल्लाह खुमैनी का नाम आ गया और फिर शाह का जाना और आयतुल्लाह खुमैनी का ईरान में एक लंबे अरसे बाद आना हुआ.
शाह के विरोध में आवाज उठाने की उन्हें सजा मिली थी और वे इराक में रहे. मैंने कुछ नेताओं, मौलवियों का इंटरव्यू लेना शुरू किया. इस बीच आयतुल्लाह खुमैनी इमाम की पदवी पर आसीन हो गए और उनकी लोकप्रियता विश्व स्तर पर झंडे गाड़ने लगी. सत्ता की रस्साकशी चल पड़ी. साम्यवादी, मुजाहिद्दीन और हिजबुल्लाह के बीच. बड़े पैमाने पर जेल भर गए, हत्याएं हुईं इत्यादि.
खुमैनी-खामेनेई से मुलाकात
एक बार फिर 1980-1981 में मेरा ईरान जाना हुआ और इस बार मैंने ऐड़ी चोटी का जोर लगा कर इमाम खुमैनी से इंटरव्यू लेना चाहा और कामयाब हुई. उनसे बातचीत हुई लेकिन कुछ सवाल पूछने की इजाजत नहीं मिली. वे सवाल मैंने राष्ट्रपति खामेनेई से पूछे, जो बाद में इमाम खुमैनी की जगह इमाम बनाए गए.
अपने मामूली-से घर और लिबास में इमाम खुमैनी जितने बुजुर्ग और सादा लगे थे, उसके बरअक्स राष्ट्रपति खामेनेई जवान और मौलवी के लिबास में नजर आए. उनके लिए यह मशहूर था कि वे अपने इरादों और विचारों में बहुत पुख्ता और हार्ड-लाइनर हैं. उन्होंने इमाम खुमैनी की तरह न मुझसे व्यक्तिगत सवाल किए और न ही कोई सुन्नी-शिया एकता का पैगाम भारतीयों के लिए दिया.

उन्होंने सवालों के बहुत सहजता से जवाब दिए. जहां उन्होंने इंटरव्यू दिया वह जगह बहुत सादी और बिना किसी तामझाम वाली थी. सफेद चादर पड़ी चौकी थी जिस पर मुझे एक तरफ बैठाया गया और सामने पड़ी खाली कुर्सी पर वे धीरे-धीरे चलते हुए आकर बैठ गए. किसी तरह की न पहरेदारी थी, न माहौल में कोई तनाव! इस इंटरव्यू के बाद मेरा फिर जाना नहीं हुआ.
साल 2017 में 35 वर्ष बाद मुझे ईरान के एक एनजीओ से बुलावा आया. यह ईरान इमाम खामेनेई का ईरान था जहां न साम्यवादी, न मुजाहिद्दीन का कोई आंदोलन और न ही उस तरह की टकराहटें. जो ईरान मैं देख रही थी वह आधुनिक इमारतों से सजा था जहां हिजाब और स्कार्फ पहने औरतें, लड़कियां हर क्षेत्र में नजर आ रही थीं लेकिन इसके बावजूद हुकूमत के विरोध में भी आवाजें उठती रहीं और उन्हें दबाया भी गया.

राष्ट्रपति खामेनेई ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि हम विद्रोहियों को और शत्रु को और हत्यारों को सजा देते हैं. ईरान के लिए इमाम खामेनेई शहीद हो गए. मुज्तबा खामेनेई ने उनकी जगह संभाली. इमाम खुमैनी का यह मशहूर जुमला था, ''हमने अमेरिका का मुंह जमीन पर रगड़ दिया है.’’ इसकी सही तस्वीर 47 वर्ष बाद राष्ट्रपति ट्रंप के रूप में सामने है और इज्राएल को भी अच्छा सबक मिल गया है. इमाम खामेनेई की लोकप्रियता का हाल हमारे सामने है.
- नासिरा शर्मा रुहुल्लाह खुमैनी और अली खामेनेई दोनों का इंटरव्यू करने वाली अकेली दक्षिण एशियाई स्वतंत्र महिला पत्रकार हैं.

