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तानाशाहों के क्रूर चेहरे

किताब ऐसे आठ तानाशाहों की कहानियां कहती है, जिन्होंने बेहद आम परिवारों और परिवेश से आकर न सिर्फ देश, बल्कि दुनिया का इतिहास बदल दिया.

डिक्टेटर्स किताब का कवर
डिक्टेटर्स किताब का कवर
अपडेटेड 2 अप्रैल , 2026

युद्ध और अस्थिरता से जूझ रहा ईरान आज से 47 बरस पहले भी एक राजनीतिक उठापटक के बीच था जब अयातुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी की आमद हुई. ऐसा क्यों हुआ कि मोहम्मद रेजा, जो ईरान को शहरी, आधुनिक और महिलाओं के लिए एक आजाद देश बनाने की ओर निकला था, को देशवासियों ने 1979 में सिंहासन से उठा फेंका? दुनिया के तमाम देशों में तानाशाह किस तरह पनपते रहे और किन परिस्थितियों में आम लोगों ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया, यह प्रिया नारायणन की किताब डिक्टेटर्स: द वल्डर्स मोस्ट नोटोरियस टायरेंट्स  बताती है. 

किताब ऐसे आठ तानाशाहों की कहानियां कहती है, जिन्होंने बेहद आम परिवारों और परिवेश से आकर न सिर्फ देश, बल्कि दुनिया का इतिहास बदल दिया. रूहोल्लाह खुमैनी के अलावा, किताब में अडॉल्फ हिटलर, जोसेफ स्टालिन, ईदी अमीन, पोल पॉट, निकोलाए चाउशेस्कूल, किम इल-सुंग और फ्रांस्वा डुवालिए के जीवन और राजनीति पर पाठ मिलते हैं. 

अलग-अलग कालखंडों, संस्कृतियों और राजनीतिक रुझानों वाले इन तानाशाहों में ऐसी कई समानताएं हैं जो उन्हें जोड़ती हैं. यह समानताएं न सिर्फ उनके शासन के तौर-तरीकों में दिखती हैं, बल्कि इस बात में भी कि वे जनमानस में अपनी पैठ बानाने में किस तरह सफल हुए. 

इन तानाशाहों का अभावों, ग्रामीण या कस्बाई परिवेश में पला होना उन्हें आम लोगों से जोड़ता है फिर चाहे वह खुमैनी की एक आम धार्मिक अध्येता की छवि हो, डुवालिए का एक ग्रामीण डॉक्टर होना हो, पोल पॉट का किसी आम किसान की तरह कपड़े पहनना हो या ईदी अमीन का अक्सर आम लोगों के साथ नाचना-गाना हो.

वक्त के साथ ये अपने बारे में ऐसी चमत्कारी बातें फैलाने में समर्थ होते हैं कि जनता इन्हें अपना राजा मान लेती है, मसलन वे ईश्वर के दूत या मसीहा हैं, भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त हैं या वे देश की जिम्मेदारी वैसे उठा रहे हैं जैसे एक पिता अपने परिवार को पालता है. 

नारायणन का अध्ययन जोर देता है कि भले ही ये किसी भी कारण से सत्ता में आए हों पर लगभग सभी अपने शासन में स्टेट सर्विलांस, हिंसा, टॉर्चर और मनमाने कानूनों का इस्तेमाल कर अपना वर्चस्व स्थापित करते हैं. 

लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की नाजुकता की ओर भी इशारा करती नारायणन यह याद दिलाती हैं कि तानाशाहों का उदय केवल इतिहास की घटना नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के लिए लगातार बना रहने वाला खतरा भी है. साथ ही यह तर्क भी पेश करती हैं कि आज के समय में भी नागरिकों का सतर्क रहना जरूरी है ताकि कोई निरंकुश शासक दोबारा न उभर सके.

किताब का नाम: डिक्टेटर्स
द वल्ड‍्रर्स मोस्ट नोटोरियस टायरेंट्स
लेखिका: प्रिया नारायणन
प्रकाशन: रूपा पब्लिकेशंस
कीमत: 395 रुपए.

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