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बर्फ के उस पार का महादेश

संयोगवश हैरर जब तिब्बत में दाखिल हुए, उन्हें अंदाजा भी न था कि वे यहां कुछ दिन या कुछ हफ्ते नहीं, बल्कि सात साल गुजारने वाले हैं. या कि इन वर्षों में उपजी किताब आने वाली पीढ़ियों के लिए तिब्बत को समझने का सबसे अहम और ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाएगी.

तिब्बत में सात वर्ष किताब का कवर
तिब्बत में सात वर्ष किताब का कवर
अपडेटेड 16 मार्च , 2026

दुनियाभर के अधिकतर यात्रा वृत्तांत भागने से शुरू होते हैं. एक जगह से दूसरी जगह की तरफ. हाइनरिक हैरर की सेवेन इयर्स इन तिब्बत की तरह ही. ढहते कंगूरों और इंसानी हड्डियों की राख से भागता एक आलातरीन पर्वतारोही. जिसे दूसरे विश्वयुद्ध ने भगोड़ा बनाया. जंग से, कैद से और खुद से भागते हुए हैरर ने 1944 में एक असंभव रास्ता लिया.

बर्फ के घर, हिमालय का रास्ता. कई असफलताओं के बाद, हाइनरिक हैरर ब्रिटिश कैद से उतनी दूर भाग जाना चाहते थे जहां मृत्यु भी उनका अपना चुनाव बन सके. यहीं से शुरू होती है सेवेन इयर्स इन तिब्बत. साल 1952 में पहली बार छपी इस किताब का हिंदी अनुवाद मंजुल प्रकाशन से आया है, और अनुवादक हैं यामिनी रामपल्लीवार.

खून से लथपथ दुनिया में बर्फ का स्थाई पता खोजते हैरर ने किसी साहसिक अभियान की विजय कथा नहीं लिखी है. अगाध बर्फ में रास्ता टटोलते, हिमालय की तरफ बढ़ते हैरर की अंतिम कुछ सांसें ही शेष रह गई थीं, जब इस बर्फीले महादेश ने उन्हें रास्ता दिया. सामने उस दौर का तिब्बत था. दुनिया के नक्शे पर होकर भी बाहरियों के लिए अदृश्य. पहुंच और हस्तक्षेप से परे. अबूझ लगते नियमों पर खड़ा ल्हासा और दरवाजे पर एक ठेठ अजनबी. तमाम शक-शुबहों और सवालों के ठीक बीच खड़े हैरर ने बुद्ध के सम को मानने वाली इस धरती से केवल एक मांग की: समय.

संयोगवश हैरर जब तिब्बत में दाखिल हुए, उन्हें अंदाजा भी न था कि वे यहां कुछ दिन या कुछ हफ्ते नहीं, बल्कि सात साल गुजारने वाले हैं. या कि इन वर्षों में उपजी किताब आने वाली पीढ़ियों के लिए तिब्बत को समझने का सबसे अहम और ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाएगी.

किताब में हैरर ने तिब्बत को किसी जादुई जगह की तरह नहीं बरता है. भाषा और रिवाज सीखने के क्रम में हैरर रत्ती भर कसर न रखते हुए तिब्बतियों के स्वप्नों तक को कुरेदते हैं. नतीजतन जब तिब्बत का समाज अपने धर्म, सत्ता, भय और बदलाव को लेकर असमंजस के साथ इस किताब में दर्ज होता है तो यह हैरर का सुविधाजनक बर्ड आइ व्यू नहीं, बल्कि तिब्बत का अपना बयान होता है.

आगे चलकर दलाई लामा होने वाले बच्चे से जब हैरर की मुलाकात होती है, इस हिस्से से आध्यात्मिक चमत्कार गायब है. यूरोप से आया युद्ध का साक्षी और दुनिया भर की खबरें जानने को लालायित पूजनीय बालक. पूरे तिब्बत के भविष्य का बोझ अपनी भृकुटियों पर रखे यह बालक जब हैरर से बात करते हुए छुप कर खिलखिलाता है, तो यह खनक शब्दों की सामर्थ्य के पार चली जाती है.

शायद, यही वजह रही होगी कि 1997 में इस किताब पर ब्रैड पिट को लेकर सेवेन इयर्स इन तिब्बत फिल्म बनाई गई. भव्य तिब्बत, सुंदर पहाड़, भावुक संगीत और अच्छी अदाकारी के बावजूद फिल्म इस किताब का सिनेमाई तर्जुमा करने में बहुत कामयाब नहीं हो सकी. ठहरने के इस विशाल कैनवस पर शायद कैमरा अपनी जल्दबाजी के कारण अपेक्षित समय नहीं दे सका, जो कि जाहिर तौर पर सिनेमा की बाध्यता रही होगी.

एक सिनेमा प्रोजेक्टर को ठीक करते हुए पूरी सर्दियां गुजारते दलाई लामा और उनके शिक्षक के तौर पर नियुक्त हैरर के बीच घटते जादू के उन्माद को सिनेमा सिर्फ इसीलिए पकड़ पाने से रह जाता है, क्योंकि वह उन्माद का जादू दिखाना चाहता है. जबकि, यही किस्से इस किताब में आपके सामने बिल्कुल ही अलग अर्थों में प्रकट होने की संभावना से लबालब भरे हुए हैं.

सदी के कुछ सबसे असरदार यात्रा वृत्तांतों में से एक को हिंदी में तिब्बत में सात वर्ष  शीर्षक के साथ पेश किया गया है, जो कि बिना दो राय स्वागत योग्य कार्य है. कुछ जगहों को छोड़ दें तो यामिनी रामपल्लीवार के अनुवाद ने अंत तक हैरर की किस्सागोई को साधे रखा है. बोलचाल के शब्द निरर्थक भारीपन से बचाते हैं और पाठक का सुर कहीं चिंहुकता नहीं, यही इस अनुवाद की सफलता है. 

हिंदी की खिड़की से इस ऐतिहासिक दस्तावेज को देखना और सुंदर हो सकता था, अगर प्रू्रफ अच्छी तरह देखे गए होते. चार पेज की प्रस्तावना में आठ प्रूफ की गलतियां! प्रकाशन को अगले संस्करण में प्रूफ पर ध्यान देना चाहिए. ऐसी सरस पढ़ाई में इन कंकड़ों से बचते हुए इस प्रयास को निश्चित ही मूल किताब के बर-अक्स प्रभावी बनाया जा सकता है. धीमा, सटीक और टिकाऊ. 

हैरर अचानक तिब्बत में दाखिल हुए और उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि वे यहां कुछ दिन नहीं बल्कि सात साल बिताने वाले हैं.

पुस्तक का नाम: तिब्बत में सात वर्ष
लेखक: हाइनरिक हैरर 
अनुवाद: यामिनी रामपल्लीवर
प्रकाशन: मंजुल पब्लिशिंग हाउस
कीमत: 499 रुपए.

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