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खाकी नजर से दिखता जरूरी नजारा

उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व डायरेक्टर जनरल ओ.पी. सिंह ने अपनी किताब 'थ्रू माय आइज़—स्केचेस फ्रॉम अ कॉप्स नोटबुक' में आधी रात को विमेन होस्टल में खड़े एक स्वयंभू छात्र नेता से लेकर पंजाब में मिलिटेंसी के फर्स्ट हैंड किस्सों तक को साझा किया है

पूर्व DGP ओपी सिंह की किताब का रिव्यू
पूर्व DGP ओपी सिंह की किताब का रिव्यू
अपडेटेड 17 फ़रवरी , 2026

भाषाई अखाड़े की कुश्ती में गलत को पटखनी देने के लिए शब्द 'लोकतंत्र’ भले ही एक साथ लिखा जाता हो, लेकिन लोक और तंत्र के बीच जगह हमेशा छूटी रह जाती है. बहुत कम लोग हैं जो इस जगह को इसके ठीक-ठीक अर्थों में देख समझ पाते हैं. और ऐसे लोग गिनती के होंगे जो लोक और तंत्र के ठीक बीच खड़े होकर दोनों तरफ बराबर के जवाबदेह होते हैं. 

दुनिया के सबसे विशाल पुलिस बलों में से एक, उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया का पद इसी जवाबदेही की सतत मांग करता है. क्या हो, अगर किसी मुखिया का निजी तौर पर लिखा रोजनामचा हमारे सामने आ जाए. ऐसा पहले भी हुआ है, और पुलिस बल के मुखियाओं की आत्मकथाएं अक्सर दो अतियों का शिकार होती रही हैं.

एक, अपराध कथाओं का रोमांचक संकलन, जो पाठकों के लिए गल्प की दुनिया में लिखे जा रहे उपन्यासों की वजह से वैसे भी पहुंच के बाहर नहीं होता. दूसरा, मैं मैं मैं और सिर्फ मैं से भरपूर आत्मप्रशंसा का दमघोंटू दस्तावेज. लेकिन, उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व डायरेक्टर जनरल ओ.पी. सिंह ने थ्रू माय आइज़—स्केचेस फ्रॉम अ कॉप्स नोटबुक से इस भ्रांति को तोड़ा है कि तीसरा कोई रास्ता नहीं होता.

दोनों अतियों से पर्याप्त और बेहद जरूरी दूरी बनाकर चलती इस आत्मकथा का गद्य इतना निथरा हुआ और नीयत इतनी साफ है कि एकबारगी भरोसा नहीं होता कि हम जो पढ़ रहे हैं वो यू.पी. पुलिस के पूर्व डीजीपी का लिखा गद्य है.

कई मुख्यमंत्रियों के साथ काम कर चुके किसी भी अधिकारी के लिए बहुत आसान और मुमकिन होता चटपटे किस्से सुनाकर 'सनसनी की अनंत अपेक्षा’ को शांत करके बेस्ट सेलर हो जाना. लेकिन, ओ. पी. सिंह इस नेमड्रॉपिंग से खुद को अविश्वसनीय तरीके से बचाते हुए तंत्र पर लोक को हावी होने देते हैं. सुदूर किसी गांव के बेहद आम परिवार और प्रेम में पगी एक लड़की के पिता की मार्फत अपनी नाकामयाबी से पाठक का स्वागत करते हैं.

बल के लिए पाठकों का पूर्वाग्रह पहले चैप्टर में ही घर के बाहर उतारे जूते की तरह धरा रह जाता है. उसके बाद अदालत में अधेड़ सिपाही घूरे लाल की उतरती वर्दी, बिजली चोरी, नरेश और बीना...और जाने कितने ही अनाम अजाने किरदारों और घटनाओं की डोंगी पर बिठाकर चुपचाप ऐसे महासागर के बीच ला खड़ा करते हैं जहां सिस्टम की दैत्याकार लहरें हैं और लिए गए फैसले हैं. इनके बीच और कुछ नहीं, कोई भटकाव नहीं. सरल, स्पष्ट और सार्थक.

खाकी जेब में रखी ये डायरी जब प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में परोसे गए नाश्ते का बिल क्लियर करवाने के लिए बरसों तक चप्पलें घिसते एक हलवाई का किस्सा कहती है, तो दफ्तर-दफ्तर भटकते और नमस्कार करने के अभ्यास से झुकी पीठ पाठक के कंधे पर हाथ रखकर फुसफुसाती है—'और सुनोगे?’

एक पुलिस अधिकारी ने भाषा के इस जादू को जाने कब और कैसे साधा होगा, जैसे जरूरी सवाल के जवाब में इलाहाबाद विश्वविद्यालय और तीन नदियों के संगम से गायब तीसरी नदी दिखाई पड़ती है, जिसने इस शहर को सरस्वती का गढ़ बनाया.

बिना सादी हुए सीधी भाषा जब कल्याण सिंह, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के सैफई महोत्सव या कि योगी आदित्यनाथ के साथ कामकाजी अनुभव साझा करती है, तो हर जरूरी सवाल और शंकाओं से दो चार होने में चूकती नहीं दिखती. क्रमवार कथात्मक शैली ना होकर स्केच फॉर्म होने से पाठक को ये सुभीता सहज ही मिल जाता है कि इस जरूरी आत्मकथा का पाठ किसी भी हिस्से से शुरू किया जा सकता है.

आधी रात को विमेन होस्टल में खड़े एक स्वयंभू छात्र नेता से लेकर पंजाब में मिलिटेंसी के फर्स्ट हैंड किस्सों के सहारे ये किताब आपके सियाह सफेद में सोचने के आदी हो चुके दिमाग को व्यवस्था के उस ग्रे शेड में लाकर खड़ा करती है जहां आपको होना चाहिए. पुलिसिंग का वो धूसर इलाका जहां सच झूठ और सही गलत का फैसला इतना बारीक और निर्मम हो सकता है कि जिसके लिए किसी को बाकी बची उम्र की नींद रेहन रखनी पड़ती है.

पढ़ते-पढ़ते एक लकीर पार करते ही इस किताब के सभी काले अक्षर मिलकर किसी जागी हुई आंख का स्केच बन जाते हैं, जो हमें एक टक निहारते हुए कहती है, ''तुम्हें यहां तुक्वहारे निर्णय ही लेकर आए हैं, जिन्हें अब बदलना असंभव है!’’.

किताब का नाम: थ्रू माय आइज़
लेखक: ओ.पी. सिंह
प्रकाशन: प्रभात प्रकाशन
कीमत: 600 रुपए.

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