जॉर्ज ऑरवेल का कथन है कि पत्रकारिता वह है, जिसे कोई प्रकाशित नहीं होने देना चाहता; शेष सब कुछ जनसंपर्क है. भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में ऐसे बहुतेरे क्षण आए जब प्रकाशित होने का अर्थ सत्ता से लोहा लेना था. जो अप्रकाशित था, उसे प्रकाशित होना चाहिए था.
जो नहीं होना चाहिए था, उसे गाया जा रहा था. स्थितियां इस सदी में भी कमोबेश वैसी ही हैं. फिर भी आज जो बोला-लिखा जा रहा है, उसकी नींव भारत में करीब 245 साल पहले पड़ी. विजयदत्त श्रीधर की लिखी समग्र भारतीय पत्रकारिता को खंगालना उसी का अध्ययन करना है.
कागज और मुद्रण के इतिहास से आरंभ होकर भारतीय पत्रकारिता की यह यात्रा तीन खंडों में फैली है. साल 1780 से लेकर 1948 तक की लगभग 168 वर्षों की एक जीवंत, संघर्षशील और वैचारिक यात्रा. यह ऐसा कालखंड है जब भारत संघर्षों के बीच खुद को गढ़ रहा था. पश्चिम के आर्थिक-राजनीतिक अंधकार को जनता झेल रही थी और उसी अंधेरे में चेतना की मशाल जलाने का काम मौखिक और लिखित अभिव्यक्तियों ने किया.
भारतीय भाषाओं में हो रही पत्रकारिता ने सांस्कृतिक एकता का सेतु रचा. राजनेता, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी, सभी ने पत्र-पत्रिकाओं को अपना औजार बनाया और इस तरह भविष्य के भारत की वैचारिक नींव भारतीय पत्रकारिता ने रखी.
इन्हीं दुर्लभ, बिखरे और समय में दबे दस्तावेजोंं को एकत्र कर समग्र भारतीय पत्रकारिता नामक ये खंड आकार लेते हैं, जिसे विजयदत्त श्रीधर ने सप्रे संग्रहालय के सहयोग से लिखा है और वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.
प्रथम खंड (1780-1880) सौ वर्षों के उस काल को समेटता है, जब पत्रकारिता का केंद्र स्वाभाविक रूप से बंगाल था. यहीं से पत्रिका-संस्कृति का प्रस्थान होता है. राजा राममोहन राय ने बांग्ला पत्रकारिता में प्राण फूंके. 1822 में प्रकाशित जाम-ए-जहांनुमा ने उर्दू पत्रकारिता को दिशा दी. इसी वर्ष एशिया के सबसे पुराने राजनीतिक अखबार मुंबई समाचार का प्रकाशन हुआ, जिसने हाल ही में अपने दो सौ वर्ष पूरे किए.
1826 में उदंत मार्तंड के साथ हिंदी पत्रकारिता का बीज अंकुरित हुआ. इस खंड में लेखक ने टाइम्स ऑफ इंडिया के नामकरण की दिलचस्प कहानी बताई है जिसके सूत्र बॉम्बे टाइम्स, बॉम्बे स्टैंडर्ड और बॉम्बे टेलीग्राफ से जुड़ते हैं. लेखक तर्क रखते हैं कि क्यों टाइम्स ऑफ इंडिया का प्रकाशन वर्ष 1790 माना जाना चाहिए.
कर्नाटक प्रकाशिका से लेकर देश की पहली समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया तक का विवरण ऐसा है कि कई बार पाठक विस्मय में ठहर जाता है.
पहले खंड के अध्याय कविता बम और शिवशंभू की चिट्ठी में प्रकाशित व्यंग्य, तब की पत्रकारिता का अद्भुत अनुभव कराते हैं. छंदों में प्रकाशित रचनाएं सत्ता के विरुद्ध लोकभाषा की तीक्ष्ण मार थीं— नानी बोली टेसूलाल, कहती हूं सब तुझसे हाल/ मास नवम्बर कर्जन जाट, उलट चले शासन की खाट/ किया मातरम वंदे बंद और सभाएं रोकी चंद/ जोर स्वदेशी का दबवाया, जगह-जगह पर लठ चलवाया.
दूसरा खंड (1881-1920) राष्ट्रीय चेतना के उभार का काल है. लोकमान्य तिलक के संपादन में निकले केसरी का उत्कर्ष केंद्र में है. भाषा, अधिकार और जनसंपर्क पर आधारित यह खंड बताता है कि पत्रकारिता कैसे जनांदोलन बनती है.
लाहौर का ट्रिब्यून, अजमेर का देश हितैषी, असम का असम न्यूज, रीवा का भारत भ्राता, दक्षिण का मलयाला मनोरमा, जैसे पत्रों ने अखंड और अखिल भारतीय पत्रकारिता की वैचारिक भूमि तैयार की.
दूसरे खंड में बाल पत्रकारिता पर लिखा गया अध्याय विशेषरूप से उल्लेखनीय है. बालसखा जैसे प्रयास यह सिद्ध करते हैं कि स्वतंत्रता का सपना केवल बड़ों का नहीं था, बच्चों की चिंता भी भविष्य का दृश्य रचती है.
पुस्तक का तीसरा खंड (1921-1948) पत्रकारिता और नैतिकता के सहचर होने का काल है जिसे गांधी युग का नाम दिया है. कर्मवीर का दक्षिण पहुंचना पत्रकारिता को समानधर्मा बनाता है. हिंदुस्तान टाइम्स की जन्मकथा रोमांचक है. विशेषांकों को अलग अध्याय देकर लेखक ने पत्रकारिता की वैचारिक स्वतंत्रता और निर्भीकता को रेखांकित किया है.
बीसवीं सदी में जैसे-जैसे भारत स्वतंत्रता की ओर बढ़ता है, पत्रकारिता का स्वर अधिक लोकतांत्रिक, अधिक सजग और अधिक उत्तरदायी होता जाता है. आजादी का साल बहुतेरे अखबारों को जन्म देता है. उनमें से कुछ आज भी हमारी सुबह का हिस्सा हैं.
समग्र भारतीय पत्रकारिता सूचनाओं का अंबार होते हुए भी स्मृतियों का महासंग्रह है. वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय की लिखी लगभग 50 पृष्ठों की भूमिका जैसे इस विराट के सूत्रवाक्य की तरह पूरे ग्रंथ का सार अपने भीतर समेटे है. विजयदत्त श्रीधर के इस लिखत में तीन दशकों का श्रम है.
ऐसा श्रम जिसमें दो हजार से अधिक प्रकाशकों-संपादकों से जानकारी जुटाई गई, देशभर की लाइब्रेरी और आर्काइव्स खंगाले गए और तब जाकर उतारे गए भारतीय भाषाओं में निकली पत्र-पत्रिकाओं के कीर्तिमान, दुर्लभ चित्र, नवयुग का उन्मेष, बापू के संवाद और जरूरी तथ्य. भारतीय पत्रकारिता पर जानकारी का ये ऐसा दुर्लभ स्रोत है कि कहीं-कहीं वर्तनी की गलतियां भी नगण्य हो जाती हैं.
भारतीय पत्रकारिता, उसके इतिहास और संघर्षों को समझने-परखने वाला तीन खंडों का दुर्लभ काम.
किताब का नाम: समग्र भारतीय पत्रकारिता
लेखक: विजयदत्त श्रीधर
प्रकाशन: वाणी प्रकाशन
कीमत: 5500 रुपए (तीन खंड)

